और फिर उसने मुझे कस कर थप्पड़ मारा

Sampurna Majumder
Woman-Giving-Ring

(पहचान सुरक्षित रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)
मैं कक्षा में भोले और मधुरभाषी छात्रों में से एक थी। भले ही लोग मेरी सुंदरता को लेकर टिप्पणियां करते थे लेकिन मैंने कभी महसूस नहीं किया कि मैं सुंदर हूँ। सभी कहते थे कि मेरी बड़ी, काली, अभिव्यंजक आँखे थीं। लेकिन मैं सोचती हूँ कि क्या मैं कभी भी उनके द्वारा कुछ व्यक्त कर सकती हूँ।

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एक दशक से अधिक समय तक एक सह शिक्षा संस्थान में पढ़ाई करने के बावजूद, मैं एक या दो मित्रों को छोड़कर विपरीत सेक्स के साथ कभी तालमेल नहीं बना सकी, प्रेम संबंध में शामिल होने का तो प्रश्न ही नहीं। मैं मेरी कक्षा की लड़कियों को उनके हाल ही के प्रस्तावों के बारे में बात करते हुए देखती थी और यह कि उन्होंने किसे ठुकराया और किसे स्वीकार किया। मैं चुपचाप सुनती थी और आह भरती थी।

अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद, जब मैंने व्यवसायिक दुनिया में कदम रखा, मेरे माता-पिता ने विवाह का सुझाव दिया। मैंने आसानी से सहमति दे दी। लगभग 10 माह की लंबी खोज के बाद, हमने एक विशेष व्यक्ति का चयन कर लिया। उसका नाम अरूण था।

अरूण ने मेरी तस्वीर देखकर मुझे पसंद किया था और मैंने भी। दोनों परिवारों के सहमत होने के बाद, मैंने और अरूण ने बातचीत शुरू की। विवाह की संभावना थी। और मैं उससे प्रेम करने से खुद को रोक ना सकी।

वह शब्द के पारंपरिक अर्थ में ‘टॉल, डार्क और हैंडसम’ नहीं था। हालांकि उसका खुद का एक आकर्षण था। उसकी बातचीत और सब कुछ का मुझपर एक जादूई प्रभाव पड़ता था। वह सुशिक्षित था और उसने काफी भ्रमण भी किया था। मैं उसकी कहानियों द्वारा मंत्रमुग्ध हो जाया करती थी।

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हालांकि, कई बार वह थोड़ा उत्तेजित हो जाता था और कभी-कभी मुझ पर क्रोधित हो उठता था। लेकिन मैंने कभी उसे गंभीरता से नहीं लिया। मैंने इसे इस तरह लिया कि वह थोड़ा अधिकार जताने वाली प्रवृत्ति का था।

छः महीने के साथ के बाद हमारा विवाह हो गया और हम बैंगलोर चले गए। शुरूआती 2-3 महीनें आसानी से चले गए हालांकि अरूण गुस्से और चिड़चिड़ेपन में कभी उसका ‘अधिकार जताना’ नहीं भूलता था। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, उसका क्रोध बढ़ता गया और धीरे धीरे मैं उससे डरने लगी।

फिर भी, एक दिन मैंने साहस इकट्ठा किया और काम करने की अपनी इच्छा व्यक्त की, क्योंकि मैं घर पर बोरीयत महसूस कर रही थी। उसने तुरंत ना कह दिया। मुझसे यह अपेक्षा थी कि मैं दिन भर घर पर रहूँ और उसका ध्यान रखूं। मैं आश्चर्यचकित रह गई और अपने कानों पर भरोसा नहीं कर पाई। यह वही अरूण था जिसकी मैंने हमारी मुलाकातों के दौरान प्रशंसा की थी और यह वही व्यक्ति था जिसने मेरा आत्मीय मित्र बनने का, हर अच्छे और बुरे समय में मेरा साथ देने का, और तन-मन से मुझे प्यार करने का वादा किया था।

क्या प्यार इस तरह के प्रतिबंध लगाता है?

मैं दुःखी थी, लेकिन उसके आदेशों को स्वीकार कर लिया और घर एवं घर के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित कर दिया। हालांकि मैं कभी खाना पकाने की शौकीन नहीं रही थी, लेकिन मैंने अपने विवाह और ‘नए घर’ की खातिर प्रयास किया। मैंने खाना बनाना और नए व्यंजन बनाकर देखना शुरू कर दिया। लेकिन किसी से भी वह खुश नहीं हुआ। मैं जो भी पकाती थी, वह मेरे पाक कौशल की तुलना उसकी माँ से करता था। मैं पूरी तरह अपमानित और दुःखी महसूस करती थी।

हम विवाह के तुरंत बाद हनीमून पर भी नहीं गए थे। लगभग 5 महीने बीतने के बाद, एक दिन अरूण खुशी-खुशी काम से घर वापस लौटा। उसने कहा कि हम लंबे साप्ताहंत के लिए कूर्ग जा रहे हैं। मैंने सोचा कि भाग्य ने एक नया मोड़ लिया है और अब स्थितियां बेहतर हो जाएंगी। लेकिन यह हनीमून मेरा सबसे भयानक दुःस्वप्न साबित हुआ।

एक रात को होटल में, अरूण ने मेरे साथ जबरदस्ती की। मैं इतनी अवाक् रह गई थी कि विरोध भी ना कर सकी। अगर प्यार इतना हिंसक होता है- तो मैं नहीं चाहती कि कोई भी मुझे कभी ‘‘प्यार करे”। मैं किसी को भी इसके बारे में नहीं बता सकी। अपनी माँ को भी नहीं।
लेकिन स्थितियों ने बड़ा मोड़ तब लिया जब अरूण ने शारीरिक रूप से मेरे साथ दुर्व्यवहाय किया। एक दिन मैं अपने एक पुरूष मित्र के साथ व्हाट्सएप पर चैटिंग कर रही थी (विद्यालय के समय से जो मेरे एक या दो मित्र रहे थे) जब अचानक अरूण आ गया। जैसे ही उसे पता चला कि वह एक पुरूष मित्र था, उसने फोन छीन लिया, उसे फर्श पर पटक दिया और मुझे कस कर थप्पड़ मारा।

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वह अंत था। मैंने पहल की और एक दिन जब वह नहीं था तो अपने माता-पिता के घर भाग गई।

एक वर्ष बाद मैं तलाक प्राप्त करने में सक्षम हुई थी। आज मैं मुक्त हूँ, कार्य कर रही हूँ और अपने बीमार माता-पिता की देखभाल कर रही हूँ। मैं कहना चाहूँगी कि जहां मैं अपने आस-पास के लोगों को विवाह करते हुए देखकर खुश होती हूँ, वहीं कहीं ना कहीं संबंधों पर से मेरा विश्वास उठ गया है।

(जैसा कि संपूर्णा मजूमदार को बताया गया)

हमारे कानूनी सलाहकार, वकील नंदीश ठाकर यह सलाह देते हैं:

जब इस तरह की स्थिति का सामना हो, जब आपका जीवनसाथी शारीरिक या मानसिक रूप से आपका शोषण करे, तो भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत एफआईआर (प्राथमिकी) दर्ज कराना एक उपाय है। यदि आपके शरीर पर कोई भी स्पष्ट चोट है, तो चोटों के आधार पर आईपीसी की धारा 323,324 या 326 भी लागू हो सकती हैं।

तलाक और पृथक्करण सलाहकार तथा वकील। 2012 से कानून के विभिन्न क्षेत्रों में एक वकील के रूप में प्रैक्टिस कर रहे हैं।

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