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कैसे उन्होंने अपने निःसंतान होने को जोड़ा गणित से!!

एक गणितज्ञ का अनूठा मगर मज़ेदार समीकरण सामाजिक राय साहबों को समर्प्रित
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“क्या आप शादीशुदा हैं?”

“जी हाँ”

“कितने बच्चे हैं आपके?”

“जी, हमारे बच्चे नहीं हैं”

“ओह्ह ! शादी को कितने साल हो गए आपकी?”

“जैसा की आपने इशारा किया, काफी साल हो गए हैं हमारी शादी को!”

“कई साल और बच्चे नहीं! किसी डॉक्टर से मश्वरा किया?”
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“जी, ज़रा समझाइयेगा. आपका मतलब है की डॉक्टर हमें बच्चा देगा?”

“नहीं, नहीं. मेरा मतलब है इतने साल हो गए और बच्चे नहीं तो इसलिए…”

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बातचीत के इस मोड़ तक मेरे अंदर का अलसाया गणितज्ञ अब नींद से जागने लगा था.

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मेरे मन में कई सवाल उठने लगे.

क्या सचमुच शादीशुदा होना एक अनिवार्य शर्त है बच्चा पैदा करने के लिए?

और इसका विपरीत? क्या वो भी उतना ही सही है? यानी क्या बिना शादी के बच्चा होना मुमकिन नहीं है?

और अंत में वह प्रश्न जो हमारे संपूर्ण जैविक अस्तित्व को ही कटघरे में ला खड़ा कर देता हैं — —

क्या यह तर्क सही है की अगर आपके बच्चे नहीं हैं तो शादी भी बेमानी मानी जाएगी?

मैंने आनन् फानन एक कोरा कागज़ लिया और वेंन आरेख आंकने लगा.

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मुझसे अब तक वार्तालाप करते वो महाशय अब अचानक अपनी किस्मत को कोस रहे थे मगर मैंने भी पीछे हटना कहाँ सीखा था. मैंने आज ठान लिया था की मेरे आस पास के पूरे समाज को पता चले की मैं गणित के तर्क को भूले लोगों के साथ कैसे पेश आता हूँ.

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मैं चाहता तो बहुत ही कम शब्दों में उन महोदय को समझा सकता था की शादी के पहले ही मैंने और मेरी होने वाली धर्मपत्नी ने आपसी सहमति से तय किया था की हम खुद की संतान नहीं करेंगे. बच्चों से हम दोनों को ही बहोत स्नेह है तो यह तय किया था की दुनिया मैं जो कई बच्चे हैं, उनमे ही अपना प्यार बाटेंगे. मैंने अपना यह पक्ष नहीं रखा क्योंकि पुराने तज़ुर्बे से जानता था की इन महाशय के सवाल ख़त्म नहीं होंगे. शायद मुझसे फिर पूछे, ” तो फिर आप दोनों ने शादी ही क्यों की?”

इस सवाल के जवाब में मैंने जब लोगों को यह बताया है की विवाहित दम्पति को मिलने वाला हॉस्टल कुवारों से सस्ता होता है, तो मुझे हैय, आश्चर्य और ना जाने कैसी कैसी नज़रों से देखा गया है.

आगे का वार्तालाप कुछ ऐसा हुआ:

“तो आप दोनो साथ रहते हैं?”

“जी बिलकुल. दो लोग जब एक दुसरे से प्यार करते हैं, तो साथ ही तो रहते हैं न? क्यों, क्या आप और आपके पति साथ नहीं रहते?”

एक खीज वाली मुस्कान और यह मेरी शह और मात.

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मैं लोगों को अक्सर यह बात समझाता हूँ की यूं तो अक्सर शादी मैं आने वाली सबसे बड़ी अड़चन आर्थिक परिस्थिति होती है, हमारे मामले में शादी होने का कारण हमारी चरमराई आर्थिक स्तिथि थी. जब हम दो कॉलेज के छात्रों को यह समझ आया की शादी करके हमें २५०० रुपया के बदले १०० रुपए से भी काम कमरे का किराया देना होगा, हमारी शादी करने की तिथि खुद ही नज़दीक आ गयी. आखिर टूशन्स कर अपने गुज़ारा करने वाले हम दो प्रेमीयो के लिए यह बहुत बड़ी बचत थी.

कई उल्लाहनो ने भी हमारे दृढ़ निश्चय को नहीं बदला और हम शादी के एक कारगार बंधन में बांध गए. मगर इस बंधन में बांध कर भी यह तो ज़रूरी नहीं की शादी एक समीकरण बन जाए जिसमे माता पिता गुणक हों और बच्चे वेरिएबल्स.

स्वामित्व किसे चाहिए अगर उद्देश्य मात्र अभिगम हो?

अर्थात मुझे अपने बच्चों क्यों चाहिए अगर उनके बिना ही हमारे आस पास बच्चे हों. आखिर हम दोनों ही अध्यापक है और प्लेस्कूल से लेकर बाहरवीं तक के बच्चों के बीच में ही हम अक्सर पाए जाते हैं.

इन तर्कों के बाद भी अगर कुछ लोग हैं जो मानते हैं की हमें जन्मदाता बनना चाहिए तो उनको लिए मेरे पास एक सुझाव है. क्यों नहीं हमारे हिस्से के बच्चे वही जन्म दे देते.

आज के ज़माने में जब चल निधि की इतनी किल्लत है, यह एक काफी उपयुक्त भेट लगती है. कम से कम मुझे किसी एटीएम की शाखा के आगे लम्बी सी लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतज़ार तो नहीं करना होगा.

जय हो अनामंत्रित राय साहबों की! जय हो उनकी उत्सुकता की!
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उसे आघात पहुंचा था और वह सेक्स से डरता था, लेकिन उसने ठीक होने में उसकी सहायता की

मैं समझता था कि मेरी पत्नी एक दूसरे पुरूष से प्यार करती थी

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