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क्या हम पत्नियों के वेश में महिमापूर्ण नौकरानियां हैं

अपने वैवाहिक अनुभव के स्पष्ट पुनःकथन में देवलीना गांगुली कहती हैं।
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लोग कहते हैं कि प्यार अंधा होता है। मित्रों और परिवार से चेतावनियों के बावजूद, मैंने स्पष्ट प्रकट होने वाले संकेतों को अनदेखा करने का निर्णय लिया, और आगे बढ़ते हुए 24 फरवरी 2011 को अपने पति से विवाह कर लिया।

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मेरी हमेशा से एक उदारवादी परवरिश रही, एक ऐसे परिवार में जन्म हुआ जहाँ लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। मेरे माता-पिता के विवाह के 10 वर्षों बाद मेरा जन्म हुआ, मैं एक बिगड़ी हुई लड़की थी, जिसे कभी भी घर के काम की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं थी। मेरे माता-पिता ने मुझे कभी भी ‘आदर्श’ पत्नि या बहू बनने के लिए प्रशिक्षित नहीं किया था, उन्होंने मुझे आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना सिखाया था और मुझे एक आत्मनिर्भर एवं आत्म सम्मानित व्यक्ति बनाया था।

मेरे लिए विवाह का अर्थ संगति, दो मन का मिलन और दो शरीरों का साझा होना था। मेरे पूर्व पति मेरे परम मित्र थे (ज़ाहिर है विवाह से पहले) और मैं मानती थी कि हम दोनों उन समकालिक दंपत्तियों में से एक हो सकते हैं जो लिंगों की पारंपरिक भूमिकाओं पर विश्वास नहीं करते।

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तब मैं भारत के सबसे बड़े मीडिया हाउस में वरीष्ठ संपादक के रूप में कार्य कर रही थी। मेरा व्यवासायिक जीवन बहुत व्यस्त था। मेरे पति खुदरा व्यवसाय में कार्य करते थे और मुझे लगता था कि वे मेरे कार्य की माँगों को समझेंगे क्योंकि वे स्वयं भी एक उच्च दबाव वाले व्यवसाय से हैं।

विवाह के बाद बड़ी जल्दी ही मोहभंग की शुरूआत हो गई।

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पहला झटका मुझे तब लगा जब मेरी सास ने बाहर जाते समय सर पर पल्लू ढंकने को कहा, कम से कम शादी के एक सप्ताह बाद तक। क्या मैं सास बहू वाले धारावाहिकों की समानांतर दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी?

मैं कभी भी सुबह जल्दी जागने वाली व्यक्ति नहीं रही; हालांकि मुझसे यह अपेक्षित था कि मैं जाग कर, नहा कर मेरे ससुर जी को उनके ऑफिस जाने से पहले खाना परोसूं। क्या मेरे उस घर में आने से पहले वे ऑफिस नहीं जाते थे? क्या उन्हें खाना नहीं परोसा जाता था? ऐसे कार्य मुझे क्यों सौंपना? मैं ऐसे परिवार से आई हूँ जहां मेरे पिता हम तीनों के लिए सुबह की चाय बनाते थे, वे घर के पुरूष थे, इस तथ्य ने भी उन्हें ऐसा करने से रोका नहीं।

मेरे ससुर जी अब भी कार्यरत थे, हमारे घर में एक नौकरानी आधे समय के लिए थी और एक पूरे समय के लिए। इसके अलावा एक और नौकरानी थी जिसे घर की सफाई के लिए समय-समय पर बुलाया जाता था। तो ऐसा नहीं था कि मेरा सास को यह सब खुद करना होगा यदि उनकी दुष्ट बहु (आपकी अपनी) आराम करेगी और अपनी बौद्धिक गतिविधियों को पूरा करेगी (पुस्तकें पढ़ना आदि को मेरे ससुराल वालों द्वारा नीची दृष्टि से देखा जाता था)।

2011 के विश्वकप के दौरान, मेरे पति और उसका कज़िन टीवी से चिपके हुए थे, अपना साथ देने के लिए बीयर की बोतलों के साथ। जबकि मैं, जो क्रिकेट की प्रशंसक है, उनके लिए फिश फिंगर्स और चिकन पकोड़ा तलने के लिए रसोई में रवाना कर दी गई थी।

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मेरे ससुराल वालों ने बहुत शातिर खेल खेला। वे खुले तौर पर मेरी आलोचना नहीं करते थे (हालांकि मुझ पर उनकी निराशा साफ ज़ाहिर होती थी), वे उनके बेटे के मुंह से ये बुलवाते थे जिसने विवाह के केवल 3 महीनें बाद ये बोल दिया था कि मुझे पूरी तरह बदलना पड़ेगा अन्यथा ये विवाह समाप्त हो जाएगा।

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जिससे उसका मतलब था, मुझे जल्दी जागना होगा, घर के कामों में सक्रिय रूप से संलग्न होना होगा और माता-पिता का दिल भी जितना होगा वैसी बहु बनकर जैसी वे चाहते हैं। असल में वह, जो काम से तुरंत वापस आएगी और घर की नौकरानी बन कर तुरंत अपनी पहचान बदल देगी। इस तथ्य के बावजूद की हफ्तां तक मैं काम से रात को 1 बजे वापस आती थी और मैं थायरोइड से भी ग्रस्त थी जो मेरी पूरी ऊर्जा समाप्त कर देता था।

वे केवल पुरानी अवधारणा में विश्वास करते थे कि एक बहू, चाहे वह कितनी भी शिक्षित हो अथवा कितना भी अच्छा कार्य करती हो, उसे उसकी ‘घरेलू’ भूमिकाएं निभाना होगा। भले ही बहू ने बेहतर शिक्षा प्राप्त की हो (मेरे पति के पास स्नातक की डिग्री थी, जबकि मेरे पास स्नातकोत्तर की), पति चाहे उस संगठन में कार्य करता हो जो पत्नि के संगठन से कम प्रचलित है, लेकिन आखिरकार वह पुरूष था।

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जब अमेरिका से उसके रिश्तेदार मिलने आए, मुझे मेरी सास द्वारा कठोरता पूर्वक दंड दिया गया था इसलिए क्योंकि मैंने देखा नहीं था कि उनके चाचा के गद्ये बदले गए हैं अथवा नहीं। मुझसे यह अपेक्षा की जाती थी कि मैं उन्हें उनके जागते ही तुरंत चाय दूँ, जो कि सुबह काफी जल्दी होता था (मैंने कुछ दिन कोशिश की फिर हार मान ली)। उसकी चाची ने टिप्पणियां दी कि किस तरह मेरे पास कभी-कभी कुछ रूचिकर व्यंजन बनाने के अलावा खाना पकाने के लिए समय नहीं था।

अंतिम समस्या सितंबर 2012 में आई जब एक अवसर पर मेरे ससुर ने सभी सीमाएं पार कर दीं और कहा कि वे मेरे परिवार की ‘प्रतिष्ठा’ से नफरत करते हैं, कि मेरे पिता के मरने के बाद मैं घुटनों पर गिर जाऊंगी और मेरा सारा दंभ दुर्भाग्य में बदल जाएगा। मैं चली गई, अपने पति को यह कहते हुए कि मैं उस घर में नहीं रह सकती और हमारा अपना स्वयं का घर होना चाहिए। उन्होंने यह निर्णय लेने में केवल एक दिन का समय लिया कि वह तलाक चाहते हैं। एक ऐसा निर्णय जो उन्होंने नहीं बदला।

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अलगाव के बाद शुरूआत में मैंने अपराधबोध का सामना किया, कई बार स्वयं को दोष देते हुए, यह सोचकर कि मैं बिल्कुल भी परिवर्तनशील नहीं थी, यह कि अगर मैं थोड़ा झुक जाती, अपना रूख बदल लेती, तो मैं अपना विवाह बचा सकती थी। लेकिन आज मैं जानती हूँ कि वे जो चाहते थे वह पूरी तरह से गलत था। वे दुनिया को दिखाने के लिए एक आर्थिक रूप से स्वतंत्र, व्यवसायिक तौर पर सफल बहू चाहते थे। यह दिखावा करने के लिए कि वे ‘आधुनिक’ थे जबकि उनके मन में वे मानते थे कि विवाह होने के बाद एक लड़की का प्राथमिक दायित्व घर के कामों में खुद को न्यौछावर करना और उनकी सेवा करना है। स्पष्ट रूप से कहें तो एक ‘गौरवान्वित’ नौकरानी। तलाक ‘छद्मवेश’ में एक वरदान था। मैं अपना जीवन पितृसत्ता की ज़ंजीरों से निर्बाध होकर जीती हूँ जो दुर्भाग्य से अब भी हमारे समाज को बांधती हैं, ऐसी वस्तु जिसे बदलने में अब भी कई वर्ष लगेंगे।

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