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जब आपका जीवनसाथी आपका परम मित्र ना हो

पाँच पति होने के बावजूद द्रौपदी का परम मित्र एक छटा पुरूष था, कृष्ण। चित्रा बैनर्जी दिवाकरूणी द्वारा लिखी गई पैलेस ऑफ इल्यूजन्स की समीक्षा
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विश्व के सभी प्रिय महाकाव्यों के पुनर्कथन हैं। पौराणिक महाकाव्य उनके रूप एवं उनकी सामग्री को असंख्य व्याख्याओं के लिए श्रेष्ठ तरह से प्रस्तुत करते हैं।

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वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत ऐसा ही एक महाकाव्य है जिसने अनगिनत पुनर्कथन और व्याख्याएं देखी हैं ना केवल उसकी उत्पत्ति के देश में बल्कि विश्वभर में। सबसे नवीन संस्करण चित्रा बैनर्जी दिवाकरूणी का ‘‘दि पैलेस ऑफ इल्यूजन्स” है, महाकाव्य का नारीवादी पुनर्कथन, जिसका वर्णन स्वयं द्रौपदी द्वारा किया गया है।

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द्रौपदीः अपने पिता की प्रतिशोध की अग्नि द्वारा उत्पन्न। इतनी विलक्षण सुंदरता से युक्त कि उसे प्राप्त करने; उसका प्रतिकार करने के लिए पुरूष कुछ भी कर देंगे। वह, पाँच पतियों वाली, फिर भी उसके सबसे कमज़ोर क्षणों में इतनी अकेली और अरक्षित। वह, जिसे रक्त और और विनाश की लालसा थी। उसने वह प्राप्त किया। और उसका मूल्य भी चुकाया।

मैं पुस्तक की शिल्पकारिता में बहुत अधिक गहराई में नहीं जाऊंगी। यह दिवाकरूणी द्वारा है। वह एक प्रतिभावान कथावाचक हैं इसमें कोई संदेह, कोई शंका नहीं है।

एक पुस्तक, एक कहानी के तौर पर महाभारत ने मेरी कल्पना को तब से ग्रहण कर लिया था जब मैं एक छोटी बच्ची थी और मैंने यह पुस्तक पहली बार पढ़ी थी। मेरे लिए यह, बगैर किसी संदेह के अब तक कही गई कथाओं में से महानतम है और मैंने कई सारे संस्करण पढ़े हैं। बी आर चोपड़ा के महानाटक ने इस प्रेम को और अधिक सुदृढ़ किया। और यही प्रेम था जिसने मुझे दिवाकरूणी के प्रतिपादन की ओर प्रेरित किया।
द्रौपदी ने हमेशा से मुझे आकर्षित किया है। उसके जन्म की परिस्थियों से लेकर उसके स्वयंवर, उसके बहुपति विवाह, उसके अपमान और प्रतिशोध की तृष्णा सहित उसके बारे में प्रत्येक बात। किस प्रकार एक रानी जंगल में रही और उसके बाद एक दूसरी रानी की दासी के रूप में। उसने सबसे अधिक प्रेम किससे किया? उसे कैसे पता चला कि उसके बच्चों का पिता कौन था? उसने यह सब कैसे सहन किया? उसे शक्ति कहां से प्राप्त हुई? क्या अंत में प्रतिशोध लेना उसके योग्य था?

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वर्षों पूर्व, मैं सौभाग्यवश थियेटर की प्रमुख सदस्या साओली मित्रा के अंतिम प्रदर्शनों में से एक प्रशंसित ‘नटबोटी अनटबोटी’ देख सकी जो द्रौपदी की आवाज़ में द्रौपदी के जीवन का एक नाटकीय वृत्तांत था। उसके बाद मैंने कभी भी भीम या अर्जुन को पहले जैसे दृष्टिकोण से नहीं देखा।

और इस पुस्तक के कारण मैं कभी भी द्रौपदी और कृष्ण के बीच के संबंध को उस तरह से नहीं देखूंगी जैसे मैं देखा करती थी; स्पष्ट रूप से कहूँ तो, संरक्षक और ‘संरक्षण किए जाने वाले’ के रूप में

कृष्ण। शाश्वत प्रेमी। शाश्वत रक्षक। शाश्वत मार्गदर्शक, रक्षक और संरक्षक। शाश्वत मित्र। चिरोसखा

वह द्रौपदी की सच्ची दिशा था। उसका मार्गदर्शक तारा, उसका साथी, उसका नैतिक दिशासूचक। वह उसका सच्चा श्रोता और सहारा देने वाला कंधा था। वह सीधे और सरल कथन में, आधुनिक शब्दों में उसका परम मित्र था। परम मित्र हमेशा के लिए (बीएफएफ)।

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“जब मैंने स्वयं को परित्यक्त महसूस किया, वह मुझे सहारा देने में व्यस्त था -लेकिन इतनी सहजता से कि मैंने कई बार ध्यान भी नहीं दिया। उसने मुझसे तब भी प्रेम किया जब मैंने सबसे अप्रिय तरह से बर्ताव किया। और उसका प्रेम मेरे जीवन के हर प्रेम से बिल्कुल भिन्न था। उनके विपरीत, उसने मुझसे अपेक्षा नहीं की कि मैं एक निश्चित तरह से बर्ताव करूं। यदि मैं अनुपालन नहीं करती थी तो उसका प्रेम नाराज़गी, क्रोध या घृणा में नहीं बदलता था। वह मेरे घाव भरता था…कृष्ण का प्रेम एक मरहम था, एक सूखे हुए परिदृष्य पर चांदनी।”

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जहां इस मित्रता का विचार मेरे लिए सुंदर और बहुत ही प्रशंसनीय है, यह बहुत दुःखद भी है।

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यह दुःखद है कि किस प्रकार एक महिला जिसके पाँच पति थे, उनमें से किसी के भी साथ पति-पत्नी के परे कोई संबंध नहीं बना सकती थी। उनके संबंध विवाह के नियमों द्वारा निर्धारित और शासित किए गए थे। खैर, हम सब के साथ ऐसा ही है। वरमाला, अंगुठियों, पंडितों, मौलवियों के बाद; पवित्र अग्नि, साक्षियों, घोषणाओं के बाद; सजीली और पहली रात के बाद…फिर यह केवल दो व्यक्तियों के मध्य रह जाता है (मानते हैं, कि द्रौपदी के मामले में यह थोड़ा अधिक जटिल था) लेकिन मेरा तर्क यह है कि अनुष्ठानों और आदेशों के बाद, आप आपके विवाह के साथ क्या करते हैं यह आप पर और आपके साथी पर निर्भर करता है। यदि प्रारंभ से ही उच्च और निम्न प्रतिष्ठा के मध्य मुटभेड़ हो, तो शुरूआत से ही एक व्यक्ति उच्च स्थिति में होगा। यदि शुरू से ही भावना ऐसी हो, ‘‘देखो, हमने यह हमारे माता-पिता के लिए किया, शायद हम इसे अच्छी तरह निभा सकेंगे”, तो विवाह पूरे जीवनकाल तक एक प्रेमहीन, निराश स्थिति में रहेगा। लेकिन यदि विवाह समान व्यक्तियों के मध्य हो, तो जो आनंद वह देगा वे हैं- अंतरंगता, सहचारिता, चंचलता और मित्रता। द्रौपदी जिसके पाँच पति थे, उसके साथ ऐसा नहीं था।

draupadi and krishna
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सभी को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जिसे वह आपातकाल में बुला सके। कौन जानता है कि कभी वोडका वह कार्य ना कर पाए जो मिल्क चॉकलेट का एक बड़ा बार कर दे। जिससे आप अपने सबसे गहरे अंतर्मन को प्रकट कर सकें। जो आवश्यकता पड़ने पर आपको थप्पड़ भी मार सके लेकिन जब पूरा विश्व आपके विरूद्ध हो फिर भी आपका साथ दे।

हर कोई यह नहीं कह सकता कि उनका साथी ‘‘उनका” व्यक्ति, उनका परम मित्र है। लेकिन इससे यह सच्चाई दूर नहीं होती की हम सबको इसकी आवश्यकता है।

द्रौपदी के लिए वह कृष्ण था।

काश हम सब इतने भाग्यशाली हों।

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