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मेरी पत्नी के सपने

क्या पत्नी के लिए उसके सपनों को पहचानने के लिए बहुत देर हो चुकी है जो उसने एक युवा दुल्हन के रूप में देखे थे?
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नहीं, कृपया शीर्षक पर ना जाएं। मैं अपनी पत्नी की कामुक कल्पनाएं बयान नहीं कर रहा हूँ। यह उसकी उम्मीदों के बारे में है जब वह मेरे घर आई थी।

अफसोस की बात है कि यह कहानी विवाह के 22 वर्षों बाद अब मेरे सामने आई है। हो सकता है कि वह अब अधिक आत्मविश्वासी और मुखर है! शायद यह अहसास उसे हाल ही के वर्षों में हमारे विवाह में उत्पन्न दरारों और सुराखों से हुआ हो। शयद हमारा विवाह इतना ही सहन कर सकता है, इससे अधिक नहीं!

कारण चाहे जो भी हों, यह मेरी पत्नी ने हमारे एक हाल ही के झगड़े के दौरान कहा, जो आजकल अपवाद की बजाए नियमित हैं; मैं सटीक वाक्य और उसके बाद की पूरी बातचीत का अनुमान पहले ही लगा सकता हूँ।

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हमारी लंबी घुमावदार बहसें लगभग एक यौन कृत्य की तरह बन गई हैं – फोरप्ले, उन्माद, परमानंद, चरमोत्कर्ष, वापसी – लेकिन सेक्स नहीं है। बिल्कुल भी नहीं। कुछ भी नहीं। कुछ नहीं।

विवाह के बाद एक स्त्री जो चाहती है वह है उसका स्वयं का घर। हमारे मामले में, उसे वह उसके ससुराल वालों के साथ बांटना था जो इतने सुखद नहीं थे। उसने सोचा था कि उसके हमारी दहलीज में प्रवेश करते ही ‘परिवार’ की आभासी कुंजी उसे उत्सुकता और प्रसन्नता के साथ सौंप दी जाएगी।

खैर! शायद मेरी माँ ने यह भाँप लिया और रसोई के झगड़े शुरू हो गए। तब से अब तक 22 वर्ष हो चुके हैं। तब मेरी पत्नी की आवाज़ बहुत नम्र थी। वह रात को, हमारे सोने के समय के क्रियाकलापों से पहले मुझसे उसकी असुविधाओं, उसके घर की यादों, उसके सपनों के बारे में कहा करती थी। वे लोग जो अब झगड़े के दौरान उसकी ऊंची ककर्श आवाज़ सुनते हैं वे विश्वास नहीं करेंगे कि एक हाथ से भी कम की दूरी पर मुझे उसकी आवाज़ सुनने के लिए पूरा ध्यान जुटाना पड़ता था।

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मैं निश्चित रूप से पूरी तरह कायर था कि मैंने उसका पक्ष नहीं लिया नहीं तो मेरा ‘परिवार’ टूट जाता। कायरता कमज़ोर और अयोग्य के प्रति हिंसा का रूप ले लेती है जैसा कि मेरी कायरता ने किया। मौखिक और शारीरिक दोनों रूपों की बौछार परिवार के सभी सदस्यों पर की गई, जाहिर तौर पर उन्हें कारण दिखाने के लिए। कोई नहीं समझा; किसी को इसका वजह समझ नहीं आई। और मेरी पत्नी को सहना पड़ा।

वर्ष बीत गए। हमारे बेटे का जन्म हुआ था और वह बड़ा हो रहा था। कोई सैर, कोई भ्रमण, कोई आलिंगन नहीं थे, ऐसी कोई वस्तु नहीं थी जो संबंधों को मधुर, यादगार बनाती है। हम कड़वाहट इकट्ठी करते थे और परिवार के सदस्यों में उसे उदारता के साथ बांट देते थे। शक्ति के इस खेल में, मेरी पत्नी को वह कभी हासिल नहीं हुआ जो वह चाहती थी। उसका एकमात्र उद्देश्य, अपने बेटे को इस तरह बड़ा करना था ताकि वह उस पर हुए अन्याय को साबित कर सके, व्यर्थ गया था। इंजीनियरिंग या मेडिकल की मध्यम वर्गीय सीमाओं में हमारे बेटे की सफलता उसका लक्ष्य था। हुआ इसके विपरीत। पारंपरिक विषयों में उसकी रूचि नहीं थी और उसने स्वयं का मार्ग तैयार किया।

मेरी पत्नी का सपनों का महल टूट गया। तीखापन नज़र आने लगा। तुच्छता के बारे में हो रहे झगड़े दो दशकों के बारे में अफसोस पर समाप्त होते थे। घर घटना जिसने उसे दुख पहुंचाया को याद रखने के मामले में उसकी याद्दाश्त से कोई पुरालेखकर्ता (आर्काइविस्ट) भी मुकाबला नहीं कर सकता। वह उत्तर की आशा रखती थी। उसका रोना था कि ‘‘वह ही क्यों?’’ जो भी कुछ उसके और उसके बेटे के साथ हुआ उसके लिए अब वह मुझे ही सारा दोष देती है। ‘‘यह सब तुम्हारी वजह से है,’’ मैं इस आक्षेप का आदी और वास्तव में थोड़ा बेपरवाह भी हो चुका हूँ।

फिर उसे अहसास हुआ कि मुझे कोई अंदाज़ा नहीं है कि एक महिला के विवाहित होने और एक नए घर में प्रवेश करने के बाद उसे किस तरह खुश रखा जाता है। वह ‘उसका’ घर चाहती है। वह चाहती है कि परदों से लेकर कालीन तक उसकी पसंद के हों, जिस व्यंजन की विधि गड़बड़ हो वह उसकी हो, उसका पति उसका पुरूष हो – उसे किसी के साथ बांटना ना हो -और भी अधिक।

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वह चाहती है कि वह घर जिसे उसने सजाया है, वे बच्चे जिन्हें उसने पाला है, उसकी पहचान बनें- यदि कोई पूछे तो हर नुक्कड़ और कोना यह चीख चीख कर कहे – हम उसकी रचना हैं, केवल उसकी! उसे वह नहीं मिला। वह दूसरी, कई बार तीसरी भूमिका निभाने के लिए मजबूर थी।

जब तक कि उसके उत्पीड़क बूढ़े और उसके विरोधी कमज़ोर ना हो गए। उसके बाद उसके भीतर की शेरनी बाहर आ गई। उसने ताकत हथिया ली और इससे पहले कि आप ‘परिवार’ पुकारते, वह उसकी प्रभारी बन चुकी थी। लेकिन उसकी सबसे बड़ी संपत्ति, उसका गौरव, उसका बेटा उसके स्वयं द्वारा अनुभव किए गए अलगाव को प्यार की कमी समझते हुए उसके खिलाफ हो गया था। वह उसे फोन करती है, वह उत्तर नहीं देता। वह उसे घर बुलाती है, वह नए-नए बहाने बना देता है। उसका मन बैठता जाता है और वह कुछ नहीं कर सकती।

तो, अब मुझे क्या करना चाहिए? मैं उन दिनों को वापस कैसे प्राप्त करूं? पुनः आरंभ कैसे करूं? मैं उसके रास्ते में आए काँटों को भूलने में उसकी सहायता कैसे करूं? अब मैं उसकी आँखों में देखकर कैसे कहूँ, ‘‘सब ठीक हो जाएगा?’’ मुझे नहीं पता कि अब क्या होने वाला है। मैं इस कहानी के अंत का पूर्वानुमान लगाना नहीं चाहता, हालांकि यह मेरे मन के पूर्वाभास में अक्सर गूंजता रहता है।

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