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5 फिल्में जिन्होंने प्यार को अलग तरह से दर्शाया है

फिल्में प्यार के बारे में हमारे विचारों को बहुत प्रभावित करती हैं। यहां कुछ अपरंपरागत प्रेम कहानियां हैं, जिनके पास प्यार पर हमारे विचारों को चुनौती देने की शक्ति थी।
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फिल्में प्यार के बारे में हमारे विचारों को आकार देती हैं

भले ही हम इसे स्वीकार करना चाहें या नहीं लेकिन हमारे जीवन पर सामान्य रूप से बॉलीवुड और सिनेमा का बहुत बड़ा प्रभाव होता है। सिखाई जाने वाली चीज़ें उचित हैं या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है, लेकिन हमारे जीवन में उनकी भूमिका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। जब फिल्मों के आधार पर प्यार पर हमारे कई विचारों को आकार दिया जाता है, तो हमें जांच करनी चाहिए कि हम स्क्रीन पर किस प्रकार की प्रेम कहानियाँ देख रहे हैं। क्या यह लड़के और लड़की के मिलने की आम कहानी है? क्या यह ऐसा कुछ है जो हमारे लिए प्यार का विचार बदल देता है? क्या ये प्रेम कहानियां हमारे जीवन में होने वाले सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित हैं? जब हम ये प्रश्न पूछते हैं, तो शायद हमारे सामने ऐसी कुछ फिल्में आ सकती हैं जिन्होंने प्यार को एक अलग नज़रिए से दर्शाया है। यहां ऐसी कुछ फिल्में हैं जो आपने देखी होंगी या शायद यह पढ़ने के बाद आप देखना चाहेंगे।

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प्यार, दुर्व्यवहार और धोखाधड़ी पर असली कहानियां
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एक शानदार विज्ञापन फिल्म निर्माता आर बाल्की ने एक युवा स्त्री को बहुत बड़ी उम्र के पुरूष के साथ प्यार में पड़ते दिखाया और हमने प्यार को पूरी तरह से नए नज़रिए ये देखा। तब्बू एक 34 वर्षीय टैकी नीना की भूमिका निभाती है जिसे लंदन स्थित शेफ बुद्धदेव से प्यार हो जाता है जिसकी भूमिका अमिताभ बच्चन ने निभाई थी। इस फिल्म में उन दोनों का संघर्ष दिखाया गया है जो शादी के लिए नीना के पिता (परेश रावल) को मनाने की कोशिश करते हैं, और वे चाहते हैं वह इस विचार को स्वीकार कर ले कि उनकी बेटी ऐसे पुरूष को डेट कर रही है जो उनसे भी छः साल बड़ा है। परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाले डार्क ह्यूमर के साथ, हमें दो लोगों के बीच एक प्यारी प्रेम कहानी देखने को मिलती है जो उनकी उम्र से परे है।

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बर्फी

अनुराग बसु की यह उत्कृष्ट कृति रणबीर कपूर और प्रियंका चोपड़ा के शानदार प्रदर्शन से युक्त है और फिल्म एक प्रेम कहानी से कहीं ज़्यादा है। यह एक गोट क्राइम और मिस्ट्री है और यह स्वयं को जीवन के रस की कथा के रूप में भी प्रस्तुत करती है। हालांकि, इसका सबसे महत्त्वपूर्ण भाग यह है कि आप एक ऑटिस्टिक लड़की और मूक बधिर लड़के की दुर्घटनाओं को देखते हैं। यह फिल्म प्यार के सभी रंग दिखाती है और देखने का एक मज़ेदार अनुभव देती है।

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ओ कादल कन्मनी

मणिरत्नम की इस फिल्म को हिंदी में ओके जानू के नाम से दुबारा बनाया गया (या इसकी धज्जियां उड़ाई गई थी)। मूल तमिल फिल्म समकालीन प्यार के बारे में बात करके तत्काल क्लासिक बन गई। प्यार में पड़ने के बाद आदी और तारा एक साथ रहने लगते हैं लेकिन शादी नहीं करना चाहते। उनके मकान मालिक गणपति और उनकी पत्नी भवानी एक विवाहित जोड़ा है जिन्हें सिर्फ ‘कूल’ के रूप में वर्णित किया जा सकता है। पूरी कहानी में, आप देखते हैं कि ये दोनों प्रेम कहानियाँ प्यार के विभिन्न रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। गणपति भवानी का खयाल रख रहा है जो अल्ज़ाइमर की रोगी है। वे आदी और तारा के लिए एक प्रेरणा के रूप में काम करते हैं जो एक साथ तो रहना चाहते हैं लेकिन अपने करियर को नुकसान पहुंचाना नहीं चाहते। फिल्म इसी बारे में है कि वे अपने भविष्य को कैसे नेविगेट करते हैं जो उन्हें दो अलग-अलग स्थानों पर ले जाने वाला है और फिर भी सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं कि उनका प्यार बरकरार रहे। ओके कन्मनी शहरी युवाओं के प्यार और विचार और बदलते समय के साथ उत्पन्न होने वाली नई समस्याओं का प्रतिबिंब थी।

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अलीगढ़

यह दो लोगों के बीच एक प्रेम कहानी नहीं है। वेल, ये उस तरह की प्रेम कहानी नहीं है जिसे देखने के हम आदी हैं। अलीगढ़ भारत में एलजीबीटी प्यार के बारे में बात करने वाली पहली फिल्म नहीं है, हालांकि, यह अब तक की सबसे ज़्यादा सेलिब्रेटेड फिल्म है। मनोज बाजपेयी ने अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया है और सहायक भूमिका में राजकुमार राव ने इसे एक श्रेष्ठ अनुभव बना दिया है। जब आप ऐसे समाज के कारण एक अधूरे जीवन की दिल टूटने वाली कहानी देखते हैं, जिसने प्यार को पहचाना नहीं है, तो यह बात फिल्म को एक और भी सार्थक अनुभव बना देती है। यह फिल्म आपको एक रोमांटिक संबंध को इस तरह विकसित होते हुए नहीं दिखाती है जिस तरह हम इसे आमतौर पर देखते हैं। यह प्यार की प्रकृति के बारे में बात करती है और फिल्म देखकर आप समृद्ध और मूव्ड महसूस करते हैं।

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इजाज़त

इजाज़त के बारे में मैं कहां से शुरू करूं? बेवफाई या अतीत के संबंधों के बारे में बात करने वाली यह पहली या सबसे अच्छी फिल्म नहीं थी। फिर भी इजाज़त सदाबहार है। यह फिल्म एक ऐसे जोड़े की कहानी बताती है जो अलग हो जाते हैं और एक रेल्वे स्टेशन वेटिंग रूम में अकस्मात रूप से मिलते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे के जीवन के बारे में कुछ सच पता चलते हैं। आपको सभी का परिप्रेक्ष्य देखना मिलता है। यह फिल्म अपने दृष्टिकोण में विस्तारपूर्ण है, अपने रूख और कहानी में उपन्यास जैसी है और भले ही यह अनिवार्य रूप से ब्रेकअप के बारे में है, यह आपको वार्म और रूंआसा महसूस करवाती है।

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1 Comment

  1. ये अत्यंत उम्दा लेख है , Quora हिंदी से इसका लिंक प्राप्त हुआ , कृप्या वहां अपनी प्रोफाइल का लिंक दें

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