5 झूठ जो जोड़े कभी ना कभी एक दूसरे को बोलते हैं

Unmesh Uttaraa Nandkumar
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सफेद झूठ हर सबंध का हिस्सा हैं

ईमानदारी एक स्थिर संबंध का आधार है। यह विश्वभर में जोड़ों द्वारा व्यापक रूप से स्वीकृत किया गया है। हालांकि कितनी ईमानदारी बहुत ज़्यादा है?

हर वक्त सच्चाई का सामना करते समय हम इंसान हमेशा अच्छा प्रदर्शन नहीं करते। हमें अपने अहं और भावनाओं को संरक्षित करना पसंद है। कठोर सत्यता हमेशा सबसे ज़्यादा उत्साहजनक बात नहीं होती और और आप शायद हमेशा अपने साथी से यह नहीं चाहेंगे।

आपका प्रेमी आपका पहला और सबसे बड़ा चीयरलीडर होता है। वह आपका सहारा होता है और तब आपको प्रोत्साहित करता है जब और कोई नहीं करता। यहां पर कोई भी अंधविश्वास की वकालत करने की कोशिश नहीं कर रहा, लेकिन आपके बेहतर निर्णय के विरूद्ध कभी-कभी आपको अपने साथी को सहयोग देना होता है। ऐसे मामलों में, जो ‘झूठ’ आप अपने साथी से कहते हैं वे ज़्यादातर सफेद झूठ होते हैं, वास्तविकता में थोड़ा सा बदलाव जो आप प्यार से प्रदान करते हैं।

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1. तुमने जो पहना है वह मुझे बहुत पसंद है।

पुरूष, स्त्री, अन्य लिंग, हम सभी इस से वाकिफ हैं। यह वास्तव में तर्कसंगत है, भले ही आपके साथी ने कुछ भी पहना हो, चाहे वह लेडी गागा जैसा परिधान हो या पैंट हो, जब वे आपसे पूछते हैं ‘मेरे कपड़े/कोट/एसेसरी कैसी है?’ उत्तर हमेशा हां होता है। यदि आप जानते हैं कि आपके लिए क्या अच्छा है, तो आप उन्हें नहीं बताते हैं कि वे अजीब या विचित्र दिख रहे हैं। अगर उनके कपड़े में एक दाग या चीर है, तो आप निश्चित रूप से उसपर ध्यान दिलाते हैं और दूसरे कपड़े चुनने में उनकी मदद करते हैं। लेकिन अगर वह वस्तु केवल भद्दी है और अन्यथा फटी हुई नहीं है तो आप बेझिझक झूठ बोल सकते हैं। संभावना है कि कोई बेवकूफ उन्हें सच बता देगा और फिर आपको क्रोध झेलना पड़ेगा कि आपने उन्हें बताया क्यों नहीं, लेकिन बताने वाला बेवकूफ बनने से कहीं बेहतर यह है।

2. मुझे तुम्हारी याद आती है

यह दिल दुखाने वाला प्रतीत हो सकता हे लेकिन यह सच है। हम हमेशा अपने साथियों को याद नहीं करते, है ना? ऐसा नहीं है कि आप जानबूझकर उन्हें अनदेखा कर रहे हैं, लेकिन काम, जीवन, चीज़ें बीच में आ जाते हैं और वाक्यांश जैसे ‘तुम मेरे मन में छाए हुए हो’ या ‘तुम्हारी याद आ रही है’, ‘मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा था’ मीठी बातें बन जाती हैं जो हम आदतवश एक-दूसरे को बोल देते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि हम झूठ बोल रहे हैं लेकिन हमेशा यह ऐसा कथन नहीं होता जिसे सच कहा जा सकता है।

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3. आपके मित्र/परिवार श्रेष्ठ है

एक संबंध में प्रवेश करना एक शून्य में की गई गतिविधि नहीं है। आप किसी अन्य व्यक्ति के जीवन में प्रवेश करते हैं और आपको स्वयं को उन सबसे परिचित करना होता है जो उनके साथ हैं। आप हमेशा इन लोगों को पसंद नहीं कर सकते लेकिन आपको उन्हें अपने जीवन के एक भाग के रूप में स्वीकार करना होता है। हालांकि, अपने साथी के सामने यह प्रकट करना हमेशा काम नही करता। ये वे लोग हैं जो उनके जीवन में आपके आने से पहले थे और आप अपने साथी से यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि इन लोगों के प्रति आपकी नापसंदगी को हल्के में लें। यह विवाद का मुद्दा बन सकता है और इससे बचने के लिए हम उन्हें पसंद करने का दिखावा करते हैं और अपने साथी को ऐसा कहते हैं। यह बेईमानी हो सकती है लेकिन यह एक समझौता है जो लोग अक्सर करते हैं।

4. तुम बहुत मज़ाकिया हो

यदि वे नहीं भी हों, हम अपने साथियों के बेतुके चुटकुलों पर हंसते हुए उन्हें हास्यप्रद बनाते हैं। जहां विनोदपूर्णता सभी को आकर्षक लगती है, यह हमेशा उपलब्ध नहीं होती। जैसे जैसे समय के साथ संबंधों का विकास होता है, लोग अपने साथी के चुटकुलों के प्रति अपनी राय के संबंध में अधिक ईमानदार होने लगते हैं। संबंध की शुरूआत में, हालांकि, वे अपने साथी की गैर-मज़ेदार टिप्पणियों की प्रशंसा करते हैं और यहां तक कि उसपर हंसते भी हैं। यह अक्सर लोगों के लिए अजीब और भ्रामक बन जाता है क्योंकि कई बार हम गुलाबी हनीमून चरण में इतने अंधे हो जाते हैं कि हम अनुचित और अरूचिकर चुटकुलों को भी अनदेखा कर देते हैं और जब बाद में इन चुटकुलों को एक समस्या के रूप में संबोधित किया जाता है, तो जिस साथी ने यह चुटकुले सुनाए थे वह अपमानित महसूस करता है। अरूचिकर हास्य के बारे में बताना हमेशा एक अच्छा विचार है, चाहे संबंध नया हो या पुराना।

5. मैं ठीक हूँ

इस वाक्यांश का बहुत उपयोग किया गया है। हज़ारों मीम्स और चुटकुले हैं (आमतौर पर सेक्सिस्ट रूप में) जो इस बारे में बताते हैं कि किस प्रकार लोग अपने साथी को नहीं बताते हैं कि वे परेशान हैं और कहते हैं ‘मैं ठीक हूँ’ जबकि वे अपेक्षा करते हैं कि उनका साथी समझ जाए कि वह नहीं है। ज़ाहिर है ये मीम्स आंशिक रूप से वास्तविकता पर आधारित हैं।

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लोगों को यह स्वीकार करना बहुत कठिन लगता है कि वे परेशान हैं। हम खुश होने पर इतना अधिक केंद्रित होते हैं कि जब हम नहीं होते तो हम स्वयं की आलोचना करने लगते हैं। यही आलोचना कारण बनती है कि हम हमारी भावनाओं को अस्वीकार करें और ‘ठीक’ होने का दिखावा करें। हालांकि भावनाएं हमारी सनक को नहीं सुनती हैं, अस्वीकार करने पर वे और अधिक दृढ़ हो जाती है। जोड़े भी एक-दूसरे से अपेक्षा करते हैं कि वे तालमेल में हों ताकि वे एक-दूसरे की भावनाओं का अनुमान लगा सकें। जहां हम एक साथी के परेशान होने पर भावनाओं में बदलाव को देख सकते हैं, हम वजह नहीं जान सकते। इस तरह हम एक प्रकार की रस्साकशी पर जा पहुंचते हैं जहां एक साथी अपनी भावनाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और दूसरा यह समझने की कोशिश कर रहा है कि क्या हो रहा है।

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