7 बॉलिवुड फिल्में जिन्होंने एलजीबीटी समुदाय को संवेदनशील रूप से चित्रित किया है

Team Bonobology
kapoor and sons

बॉलिवुड को बहुत होमोफोबिया है

दोस्ताना फिल्म से ‘मा दा लाडला’ गीत याद है? उसकी माँ इस तथ्य से कैसे निपटती है कि उसके बेटे को वास्तव में दूसरा पुरूष पसंद है? गीत सबकुछ चित्रित कर देता है। लेकिन सबसे बुरा हिस्सा है गलत चित्रण। सबसे बुरी बात यह है कि क्यूअर समुदाय के लोगों को पूरी तरह से बेवकूफों की तरह बर्ताव करते देखकर लोगों को बहुत मज़ा आता है। जैसे कि रैंडम स्थानों पर बिल्कुल सही तरह से सिंक्रोनाइज़ किए गए तात्कालिक डांस वाले गाने काफी नहीं थे जो अब ये लोग इतने गिर चुके हैं कि संवेदनशील समुदाय के लोगों को भी नीचा दिखा रहे हैं।

सदियों से, फिल्मों में होमोसेक्सुआलिटी हास्य का हिस्सा थी। होमोसेक्सुअल पुरूषों का हाल सबसे बुरा था – उन्हें ऐसे लोगों के रूप में दर्शाया जाता था जो किसी को भी लाइन मारने लगते थे जो उन्हें आकर्षक लगता था; कभी-कभी वे कुछ ज़्यादा ही हॉर्नी पुरूष होते थे जो फिल्म के नायक से थोड़ी तवज्जो चाहते थे और कभी-कभी वे बस साधारण अधेड़ पुरूष होते थे जो बेतुके स्त्री जैसे ढंग से बर्ताव करते थे, क्योंकि नारीत्व तो हमेशा हास्यास्पद होता है, है ना? और वे किस अजीब ढंग से बोलते और चलते थे? सभी समलैंगिक पुरूष हाथों के इशारों से बातें नहीं करते हैं और ना ही कूल्हे मटकाते हुए चलते हैं। साथ ही, जब भी वे बात करते हैं वे हमेशा डिक जोक्स नहीं सुनाते हैं। अंत में, वे सभी लोग मल्टी कलर वाले हवाइन या गुलाबी शर्ट नहीं पहनते हैं। बॉलिवुड ने उन्हें अधिकांश फिल्मों में एक भौंडे और हास्यास्पद तरीके से चित्रित किया है; उन चरित्रों की तरह जिनमें कुछ वास्तविकता नहीं होती।

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लेकिन शुक्र है, दोस्ताना के बाद से बॉलिवुड विकसित हुआ है। कई अग्रणी, आँखें खोलने वाली फिल्में रही हैं जो इस समुदाय के बारे में सच्चाई को चित्रित करती है। एक दशक या उससे भी ज़्यादा की अवधि में, ऐसी फिल्में बनाई गई हैं जो इस समुदाय के सामने आने वाली दुविधा, कठिनाइयों का उचित प्रतिनिधित्व करती हैं, और यह भी बताती हैं कि उन्हें खुद के एक भाग को दूर करने के लिए मजबूर किया जाता है।

यहाँ कुछ ऐसी फिल्में हैं जो समुदाय को अपने वास्तविक रूप में कैप्चर करती हैं:

1. मार्गरीटा विथ ए स्ट्रॉ

कल्कि कोचलिन ने सेलिब्रल पाल्सी की इस मरीज की भूमिका शानदार ढंग से निभाई है, जो न्यू यॉर्क चली जाती है और एक सम्मोहक स्त्री से मिलती है जिससे उसे प्यार हो जाता है। यह फिल्म श्रेष्ठ है क्योंकि यह अक्षमता और बाइसेक्सुआलिटी को उसके सबसे विशुद्ध रूप में चित्रित करती है। प्यार किसी सीमा, किसी शर्त, किसी लिंग को नहीं जानता – यह फिल्म यही दर्शाती है और यह एक सच्ची भावना है।

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2. ऑरएक्टा प्रेमेर गोल्पो (जस्ट अनादर लव स्टोरी)

आईपीसी के अनुच्छेद 377 के डीक्रिमिनलाइज़ होने के बाद बनी कुछ शुरूआती फिल्मों में से एक। इसमें लैजेन्ड्री रितुपोर्णो घोष और इंद्रनील सेनगुप्ता हैं। यह एक ट्रान्सजेंडर निर्देशक के एक बाइसेक्सुअल सिनेमेटोग्राफर के साथ ओब्सेशन के बारे में है। बंगाली में बनी यह फिल्म प्यार की सुंदरता को एक सुंदर तरीके से अवशोषित करती है।

3. कपूर एंड सन्स

जब भी इस फिल्म का उल्लेख किया जाता है, हमारे दिमाग में फवाद खान आता है। और आए भी क्यों ना? वह ईमानदार, परफेक्ट बेटा है, जिसे उसके माता-पिता ने बहुत प्यार किया है। यह फिल्म फवाद, सिद्धार्थ और आलिया की भूमिकाओं के बीच एक प्रेम त्रिकोण लगता है लेकिन ऐसा है नहीं। फिल्म के अंत में सुखी कपूर परिवार एक तरह से बिखर और टूट जाता है। फवाद विदेश में दोहरा जीवन जी रहा है – वह एक गे है और क्लोस्टेड गे है। इस फिल्म के बारे में विशेष रूप से अच्छी बात होमोसेक्सुआलिटी का उत्तम चित्रण है; वह बस एक सरल सा अर्जुन है, जो एक बार फिर साबित करता है कि सभी होमोसेक्सुअल पुरूषों को लोगों पर लाइन मारने की या फिर हवाइन शर्ट पहनने की ज़रूरत नहीं है।

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4. बॉम्बे टॉकिज़

इसमें रणदीप हुड्डा हैं और खूबसूरत रानी मुखर्जी हैं। फिल्म उस दृश्य के साथ शुरू होती है जिसमें एक लड़का अपने पिता के कमरे से यह चिल्लाते हुए बाहर आता है ‘‘मैं छक्का नहीं हूँ! मैं होमोसेक्सुअल हूँ! ना छक्का होना गलत है, ना होमोसेक्सुअल!’’ यह एक अलग अनुभव है। यह फिल्म भारत के चार अलग-अलग निर्देशकों द्वारा बनाई गई एक एन्थालॉजी है। ‘अजीब दास्तान’ करण जौहर द्वारा निर्देशित है जिसमें एक क्लोज़्टेड होमोसेक्सुअल पुरूष की शादी एक स्त्री से होती है लेकिन दूसरे पुरूष के साथ उसका अंतरंग संबंध है। जब पत्नी को अपने पति की कामुकता के बारे में पता चलता है तो घर की शांति भंग हो जाती है।

5. माय ब्रदर निखिल

माय ब्रदर निखिल में डोमिनिक डिसूज़ा का किरदार निभाने से शीर्ष के अभिनेताओं ने इनकार कर दिया था, लेकिन फिर भी यह उन चंद फिल्मों में से एक है जो गे समुदाय का प्रतिनिधित्व सही ढंग से करती है। गोआ में सेट यह फिल्म होमोसेक्सुआलिटी को एक मज़ाक या बिमारी के रूप में चित्रित नहीं करती है। यह इस समुदाय के लोगों द्वारा सामना की जाने वाली कठिनाइयों और एड्स के बारे में भी बात करती है।

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6. फायर

शबाना आज़मी और नंदिता दास की यह अत्यंत सुंदर फिल्म। दीपा मेहता की इस ग्राउंड ब्रेकिंग फिल्म ने बॉलिवुड के लिए समलैंगिकता और प्यार को उनके सबसे विशुद्ध रंगों में चित्रित करने के लिए मार्ग प्रशस्त किया। फिल्म की कहानी दो महिलाओं के बारे में है जो अपने पतियों द्वारा असहाय किए जाने के बाद एक दूसरे में सुकून पाती हैं।

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7. अलीगढ़

डॉ श्रीनिवास रामचंद्र सिरास की एक विवादास्पद वास्तविक जीवन की कहानी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक उच्च प्रोफेसर द्वारा सामना किए जाने वाले पूर्वाग्रह, अपमान और अनावश्यक कानूनी बाधाओं को हंसल मेहता द्वारा प्रकाश में लाया गया है। यह परफोर्मेंस और भारतीय समाज के बारे में मेहता का सच मुखर है और फिल्म बताती है कि इस समय और युग में भी होमोसेक्सुआलिटी किस तरह एक प्रतिबंधित विषय है और इस देश में होमोसेक्सुअल पुरूषों को किस तरह बहिष्कृत किया जाता है।

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