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आपके बच्चे आपकी एकमात्र पहचान नहीं हैं

डॉ रीमा मुखर्जी एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम के एक चरम मामले के बारे में बोनोबोलॉजी से चर्चा कर रही हैं और बताती हैं कि कैसे इससे उबरने में उन्होंने एक स्त्री की मदद की।
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(जैसा आरती पाठक को बताया गया)

Dr.Rima Mukherji डॉ रीमा मुखर्जी, एमबीबीएस, डीपीएम, एमआरसी मनोवैज्ञानिक (लंदन), ब्रिटेन में 7 साल का अनुभव पाने के बाद, डॉ मुखर्जी ने कोलकाता में एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रसिद्ध क्रिस्टल माइंड्स की स्थापना की (सभी आयु वर्गों के लिए मनोरोग और मनोवैज्ञानिक सेवाओं की व्यापक श्रेणी प्रदान करती एक बहुआयामी टीम के साथ)

एक दिन कलकत्ता उपनगर की एक महिला को उसका परिवार मेरे पास लाया और मुझे बताया गया कि जब से उसका बेटा कॉलेज के लिए घर से चला गया है, तब से वह गंभीर अवसाद से पीड़ित है। वह एक सामान्य मध्यम वर्गीय परिवार था।

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उसके सत्र शुरू होने के बाद, उसकी समस्या की जड़ें स्पष्ट हो गईं। उसके दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। लिंग पक्षपात स्पष्ट था। माँ को बेटे से बहुत ज़्यादा लगाव था और वह इसी बोध के साथ जी रही थी कि उसके बेटे को उसकी ज़रूरत है। उसे अपना मान्यकरण इसी के द्वारा मिला, यही उसकी पहचान थी, और इसने संबंध को सह निर्भर बना दिया।

एक पारस्परिक निर्भरता

बेटी को जल्द ही पता लग गया था कि अगर वह अपनी ज़िंदगी में कहीं पहुंचना चाहती है तो उसे अपने लिए खुद जुगाड़ करना होगा। परिवार द्वारा प्रदान किए गए भोजन और आश्रय के अलावा उसे और कोई भी मातृत्व भरी देखभाल नहीं मिल रही थी। हर तरह के प्यार पर केवल पुत्र का अधिकार था। जिसके परिणामस्वरूप वह माँ पर और अधिक निर्भर हो गया।

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बेटा हर रात माता-पिता के कमरे में सोया करता था। जब तक वह छोटा बच्चा था तब तक तो सब ठीक रहा लेकिन जब वह बड़ा हो गया और सामान्य डबल बेड तीन लोगों के लिए पर्याप्त नहीं था, तब भी, माता-पिता ने उसे बाहर जाने के लिए नहीं कहा। इसकी बजाए, पिता अपने बेटे के लिए जगह बनाने के लिए एक दूसरे बिस्तर पर सोने लगा। एक बच्चा कभी नहीं कहेगा कि मैं मेरे कमरे में सोना चाहता हूँ। यह परिवर्तन माता-पिता द्वारा किया जाना होता है। और अधिकांश माता-पिता इससे सहमत होंगे कि जब तक बच्चों को यह समझ ना आ जाए कि उन्हें अपने कमरे में, अपने बिस्तर पर सोना होगा, तब तक माता-पिता को बच्चों को रात दर रात अपने कमरे से बाहर निकालना होगा। जब इन माता-पिता ने ऐसा नहीं किया, तब बड़े हो चुके बेटे ने अपनी माँ के पास ही सोना जारी रखा। यह माँ के लिए भी अच्छा ही था।

फिर बेटा घर से चला गया

सौभाग्य से, यह लड़का बुद्धिमान था और उसे आईआईटी में प्रवेश मिल गया, लेकिन इससे उसकी माँ को कोई खुशी नहीं मिली, क्योंकि उसे ऐसा लगने लगा था कि वह अपने जीने की वजह, अपने बेटे को खो देगी और उसके जाने के बाद समस्या और बदतर हो गई।

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माँ अवसाद में चली गई, उसने खाना बंद कर दिया और बेटे को ब्लैकमेल करने लगी। माँ ने उसे छोड़कर जाने, स्वार्थी होने और माँ से ज़्यादा महत्त्व कैरियर को देने के लिए दोषी ठहराया। वह जीवन जीने का हर उद्देश्य खो बैठी। जब बेटा कॉलेज में होता था, तब वह अक्सर अपने बेटे को फोन करके रोया करती थी और उसे दोषी ठहराती थी। लड़का अपराधबोध से भरा जीवन जीने लगा और वह भी निरंतर अपनी माँ के लिए चिंतित रहता था। पति, जो अपने बेटे के आईआईटी में चयन के लिए रोमांचित था, वह अपनी पत्नी के तर्कहीन व्यवहार से क्रोधित था और इससे उनकी शादी में एक दरार उत्पन्न हो गई। तब उसे मेरे पास लाया गया।

हमने उसका इलाज कैसे किया

सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ सबसे पहले। हमने उसके अवसाद का इलाज करते हुए शुरूआत की। इसके बाद हमने पति के साथ सत्र किए और हमने उसे समझाया कि अपनी पत्नी के साथ इतना गंभीर रवैया ना अपनाए और उसका भावनात्मक सहयोग पत्नी को जल्दी ठीक करने में मदद करेगा। उसके बाद हम उसकी समस्या के मूल कारण पर गए। उसकी अपनी पहचान की कोई अवधारणा नहीं थी। उसे बदला जाना था। हमने उसे कहा कि उसे अपने बेटे के लिए खुश होना चाहिए और ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि उसने तुम्हे त्याग दिया है।

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दूसरा, उसे सिखाया जाना था कि उसे अपने जीवन का आनंद लेने का और वह काम करने का अधिकार है जो करना उसे पसंद है। शादी से पहले वह रबिन्द्र संगीत सीखा करती थी। हमारे साथ कुछ सत्रों के बाद, उसने अपने संगीत सत्र फिर से शुरू कर दिए और उससे उसकी उपचार प्रक्रिया शुरू हो गई। वह फिर से यह महसूस करने लगी कि उसके जीवन का भी अर्थ है। उसका पति भी अब उससे पहले जितना नाराज़ नहीं था।

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और हम बेटी को कैसे भूल सकते हैं? हमने माँ से पूछा, क्या तुम जानती हो कि घर में तुम्हारा एक और बच्चा है, और शायद उसे भी तुम्हारे प्यार की ज़रूरत हो सकती है? तुम्हें क्या लगता है कि यह पक्षपात उसे दिखाई नहीं देता? अभी तो वह भली भांति संभाल रही है, लेकिन अगर आपने उसके अस्तित्व को अनदेखा करना जारी रखा और उसे वह प्यार और देखभाल नहीं दी जिसके वह योग्य है, तो फिर उसमें भी जीवनभर के लिए मनोवैज्ञानिक समस्याएं उत्पन्न हो जाएंगी। कुछ समय में, वह अपनी बेटी के बारे में भी सोचने लगी।

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आज, वह और परिवार काफी बेहतर हैं और उपचार की प्रक्रिया उन सभी के लिए अब भी जारी है। उन्होंने परामर्श प्राप्त करने का ठोस निर्णय लिया और ऐन वक्त पर अपने परिवार को बचा लिया।

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