अभिमान नहीं स्वाभिमान…

Priyanka Chauhan
अभिमान नहीं स्वाभिमान

“जहां दिल खुश ना हो
वहां से चले जाना
अभिमान नहीं स्वाभिमान होता है।”

हमनें सबको कहते हुए सुना है अभिमान और स्वाभिमान में बड़ा बारीक सा फर्क है और सब उस फर्क को अपनी-अपनी परिभाषा में परिभाषित करते हैं।

स्वाभिमान:– मेरा सम्मान हो यह मेरी अपेक्षा नहीं है लेकिन कोई मेरा अपमान ना करें यह मैं जरूर सुनिश्चित करता हूं/ करती हूं।
अभिमान:– मैं स्वयं सक्षम हूं और यह मुकाम मैंने हासिल कियाा है तो मेरा सम्मान होना चाहिए यह मेरा हक है।

अभिमान और स्वाभिमान की जंग बहुत पुरानी है और निरंतर चलती रही है लेकिन जब औरतों के स्वाभिमान की बात आती है तो यह और भी पेचीदा और उलझन भरी हो जाती है, यह उलझन अनादि काल से है। यहां महाभारत को ही उदाहरण के तौर पर ले लीजिए कितने ही लोगों को यह कहते और समझाते हुए सुना है कि महाभारत का युद्ध द्रोपदी के प्रतिशोध की वजह से हुआ है, वह एक अभिमानी स्त्री थी, वह चाहती तो यह युद्ध टाल सकता था ।

लेकिन अगर आपको सच में अभिमान और स्वाभिमान के बीच का अंतर ज्ञात है तो आप यही कहेंगे की यह उसके स्वाभिमान की लड़ाई थी, उसनेे अपने अपमान हो चुपचाप सहन नहीं किया और होना भी यही चाहिए। जब स्त्रियों के स्वाभिमान की बात आती है तो बहुत सारी भ्रांतियां, रीति-रिवाज, प्रथाएं आकर खड़ी हो जाती हैं जैसे कि समाज के इस खोखले ढांचे को चलाने की सारी जिम्मेदारी तो केवल स्त्रियों ने ही अपने कंधों पर उठा रखी है।

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अभी फिलहाल में एक फिल्म आई है थप्पड़। बहुत लोगों ने देखी भी होगी, सभी की अपनी-अपनी प्रतिक्रिया भी है उस फिल्म पर जैसे कि नाम से ही ज्ञात हो जाता है, मुद्दा एक थप्पड़ का है जो पति ने अपनी पत्नी को मारा है।

“बस एक थप्पड़ ही तो है ! क्याा करूं ? हो गया ना…”
“रिश्ते बनाने में इतनी effort नहीं लगती जितनी निभाने में लगती हैं।”
“थोड़ी बहुत मार-पीट तो expression of love ही है ना सर… ”
“उसनेेे मुझे मारा ; पहली बार, नहीं मार सकता बस इतनी सी बात है।”
“Just a slap पर मार नहीं सकता…”

ये सभी डायलॉग अपने आप में पूरी कहानी बयान करते हैं।

हां, एक थप्पड़ ही तो है लेकिन मार नहीं सकता… यह पंक्ति अपने आप में सक्षम है यह बताने के लिए कि किसी भी रिश्ते में हाथ उठाना और मारना न्याय संगत नहीं है और यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो वह सामने वाले का अपमान कर रहा है और यह उसके स्वाभिमान पर चोट है।

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लिंग भेदभाव

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भारतीय समाज पितृसत्ता(patriarchy)व पित्रतंत्र पर कार्य करता है, जिसके चलते विवाह के बाद स्त्री पति के घर का हिस्सा होती है और उसका उपनाम अपने नाम के साथ लगाती है, यह अनादि काल से होता आ रहा है, जिसके चलते हमारी जड़ों में समा चुका है और इसी के साथ यह धारणा भी समा चुकी है कि पति या पिता ही घर का मुखिया होता है उसी के हिसाब से चीजें चलनी चाहिए या चलती है। थप्पड़ फिल्म उसी पित्रतंत्र के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है, यह प्रश्नचिन्ह लगती है रिश्तो में पुरुष श्रेष्ठता की हकदारी पर, यह प्रश्नन उठाती हैं उस लिंग भेदभाव(gender discrimination) केे ऊपर जो बचपन से पालन-पोषण(upbringing) में है और यह सिर्फ पुरुषों द्वारा नहीं है ये औरतों के द्वारा भी है क्योंकि शुरू से देेेखा ही वही है। जैसे “थोड़ा बर्दाश्त करना सीखना चाहिए औरतों को…” क्यों भाई क्यों सीखना चाहिए और अगर सीखना ही चाहिए तो फिर स्त्री-पुरुष दोनों को सीखना चाहिए, कोई नियम है तो दोनों के लिए समान क्यों नहीं। मुद्दा यह ही है कि कितनी ही चीजें होती हैं रोजमर्रा कि जिंदगी में जहां पर लोग बिना सोचे समझे स्त्रियों पर टिप्पणियां कर देते हैं और उनको एहसास भी नहीं होता कि वह अपने आपको श्रेष्ठता का अधिकार दे रहे हैं।

“यार ! जब गाड़ी चलानी नहीं आती तो लेकर निकलती क्यों हैं…”

यह सबसे ज्यादा प्रयोग में आने वाली पंक्ति है क्योंकि दिमाग में कहीं ना कहीं यह बैठा हुआ है ‘औरतें अच्छी गाड़ी नहीं चलाती है।’

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कहा तो यह जाता है, स्त्री और पुरुष बराबर हैं, एक गाड़ी के दो पहिए हैं, एक के बिना दूसरे का निर्वाह नहीं है। यदि यह सब बातें सही है तो पुरुषों को स्त्रियों पर हावी होने का अधिकार कहां से मिलता है और कौन देता है ?? यहां सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हक या अधिकार स्त्रियां स्वयं ही जाने – अनजाने देती रहती हैं और उनको इसका एहसास तक नहीं होता यदि किसी को एहसास हो जाए तो यह कहा जाता है,
“यार वह तो जरा सी बात का बतंगड़ बना देती है, ऐसा तो घर संसार में लगा ही रहता है…”

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल
नहीं ! ऐसे घर संसार नहीं चलते हैं और यदि कोई स्त्री अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होती है तो वह गलत या अभिमानी नहींं है।बस वह वो सब देख कर चुपचाप सहन नहीं करना चाहती, वह सबको दृढ़ता से बताना चाहती है कि यह गलत है और यदि सामने वाले को अपनी गलती का एहसास नहीं है तो यह एहसास दिलाना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि वह उस श्रंखला को तोड़ना चाहती है जो पितृसत्ता केे चलते पुरुषों के अंदर जड़ कर चुकी है कि…

उनको हाथ उठाकर अपना आक्रोश दिखाने का, अपनी बात को बलपूर्वक मनवाने का, अपनी मनचाही मांगों को पूरा कराने का अधिकार है। ऐसा कोई अधिकार होता ही नहीं है और यदि आप इस तरह के किसी भी रिश्ते के अंदर है तो अपनी सोच को जागृत कीजिए क्योंकि आप कहीं ना कहीं उस श्रंखला को पानी दे रहे हैं, जो हमारे समाज को खोखला कर रही है। आप एक लड़की को, जो आपके घर में हैं, अपना स्वाभिमान दबाना सिखा रहे हैं। अनजाने में ही आप अपने घर के लड़के को यह बता रहे हैं कि… यह तो आम बात है लड़के या आदमी ऐसे ही व्यवहार करते हैं। यह आपके लिए और हमारे समाज के लिए अच्छा नहीं है।

जहां आपकी और आपके रिश्तो की कदर ना हो वहां खड़े होने से अकेले खड़े रहना अच्छा है, यह अभिमान नहीं स्वाभिमान है…।

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