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ऐसा दामाद जिसे सिर आँखों पर नहीं बैठाया गया

उसकी पत्नी एक नारीवादी थी और सास भी अपरंपरागत थी, इसलिए यह उसका पहला और एकमात्र जमाई शष्ठी समारोह और उत्सव था। हालांकि यह वैसा नहीं हुआ जैसा सोचा था...
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देखिए, यह सब हमारे विवाह के पहले वर्ष में शुरू हुआ जब मुझे अहसास हुआ कि मेरे पति को जमाई शष्ठी पर बुरी तरह नज़रंदाज़ किया जा रहा है, वह दिन जब पूर्वी भारत में, विशेष रूप से बंगाल में, जमाई अपने ससुराल वालों से हर तरह की तवज्जो प्राप्त करता है, उस पर उपहारों की बौछार होती है, और उसे लाड़ प्यार से शाही दावत दी जाती है।

मैंने अपने पिता को ठेठ जमाई के रूप में कभी नहीं देखा था। लेकिन जहां मेरे पति के विवाहित भाई-बहन और कज़िन इस दिन को धूम-धाम और ठाठ-बाट के साथ मनाते थे, मैं सोचती हूँ कि क्या मेरे प्रिय पति अपनी पहली जमाई शष्ठी पर उपेक्षित महसूस कर रहे थे।

मुझे पता था कि मेरी माँ इस तरह के अवसरों को प्यार नहीं बल्कि पैसे का निर्लज्ज दिखावा मानती थी और उसे ऐसे दिन पर न्यौता तक देने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, उसे उपहार देना या घर पर बुलाना तो दूर की बात है। मेरे लिए भी, एक शांत प्यार भरी बातचीत अधिक महत्त्वपूर्ण थी।

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