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बिमारी और दर्द में हम साथ हैं

जिस दिन हेमंत भाई को कैंसर मुक्त घोषित किया गया था उसी दिन तारूलता बेन ने अपने परिवार को उनकी मुंह की गांठ के बारे में बताया था
Sickness

“मुझे उस दिन के बाद पहली बार कैंसर मुक्त घोषित किया गया था जब मेरी जीभ ने एक अजीब सी चीज़ को छुआ था और मुझे लगा था वो मेरे मुंह में छोटी सी गठान थी। नौ साल पहले!’’ हेमंत भाई ने अपना वर्णन पूरा किया जो कई सर्जरी, कीमो और अन्य उपचारों सहित लगभग एक दशक तक चला था, जिसके लिए अक्सर अस्पताल में भर्ती होने की ज़रूरत पड़ती थी। लेकिन उनकी आवाज़ ना तो प्रसन्न थी और ना ही उत्साहित। उन्होंने अपनी पत्नी तारूलता बेन को देखा और तारूलता बेन ने आश्वस्त करते हुए उनका हाथ दबाया। हम तीनों जानते थे कि अब क्या होने वाला है।

“क्या हम तारूलता बेन की बात शुरू करने से पहले एक ब्रेक ले सकते हैं?’’ मैंने पूछा और फिर हम आराम से बैठ गए और अनौपचारिक बातचीत शुरू कर दी।

दंपति, हेमंत भाई और तारूलता बेन, अहमदाबाद कैंसर फाउंडेशन द्वारा सिर और गर्दन के कैंसर के सर्वाइवर और उनकी अजय भावना के लिए एक श्रद्धांजली के रूप में वित्त पोषित टेन ऑन टेन किताब के लिए दसवें कथावाचक थे। यह पहला ऐसा जोड़ा था जिसमें दोनों साथी एक दूसरे के प्राथमिक देखभाल करने वाले थे। और जानते हैं, जिस दिन हेमंत भाई को कैंसर मुकत घोषित किया गया था उसी दिन तारूलता बेन ने अपने परिवार को उसकी मुंह की गांठ के बारे में बताया था! हाँ, यह कैंसर था। उन्हें कुछ समय तक संदेह था। जब मैंने पूछा कि क्या यह सोचना अति नहीं हो जाएगी की उनके मुंह की गठान भी कैंसरस है, तो उन्होंने कहा, ‘‘मैंने यह मेरे पति में देखा है और यह चीज़ मुझे भयावह रूप से परिचित लग रही है।’’

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हम अपनी चाय और कॉफी के साथ बैठ गए। मैंने वॉइस रिकॉर्डर शुरू किया और तारूलता बेन को देखा, मैं उनके शुरू होने का इंतज़ार कर रही थी। उन्होंने मुझे देखा। शायद उन्हें शुरू करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे। चुप्पी हेमंत भाई ने तोड़ी।

“हमने दो महत्त्वपूर्ण महीने खो दिए थे। मेरी पत्नी हमें उसकी अक्ल दाढ़ के पीछे गठान के बारे में बताने के लिए मुझे क्लीन चिट मिलने का इंतज़ार कर रही थी। साठ दिनों तक वह दर्द और बेचैनी झेल रही थी क्योंकि मेरा डॉक्टर अब भी मुझपर कुछ जांच कर रहा था। अंततः मुझे कैंसर मुक्त घोषित कर दिया गया और उसने हमें उसके मुंह में छोटी गठान के बारे में बता दिया।

“अगली सुबह हम डॉक्टर के पास गए जिन्होंने हमें बायोप्सी के लिए भेज दिया। परिणाम आने के पहले के दो दिन प्रार्थना में बीते। रिपोर्ट ‘पॉज़िटिव’ आई। कैंसर कोशिकाओं के लिए पॉज़िटिव। यह सोचकर हमारे दिल बैठ गए कि क्या यह भगवान का एक क्रूर मज़ाक था। मुझे याद हैं कि हम ड्रॉइंग रूम में कागज लिए पूर्ण चुप्पी में थे। तारूलता को छोड़ कर हर कोई रो रहा था। वह अब भी इस राहत में थी कि मैं ठीक था और उसके बारे में जो घोषणा की गई थी उसके बारे में ज़्यादा नहीं सोच रही थी। ‘तुम्हें अपने पिता की ज़रूरत है, वे यहीं होंगे। मैंने अपने कर्तव्य पूरे कर लिए हैं। मैंने अपने पोतों के साथ खेल लिया है, भगवान ने तुम्हारे पिता को ठीक कर दिया है, हो सकता है भगवान ने तय कर लिया हो कि अब मेरे जाने का समय आ चुका है।’ उसने हम सबसे यह कहा। जब हेमंत भाई उस दिन की बात बता रहे थे तब उनकी आवाज़ कांप रही थी।

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मैं आपको जाने नहीं दूंगा

फिर तारूलता बेन ने कथन संभाला। ‘‘हेमंत अपनी सीट से उठ गए और अपने आंसू पोछकर मुझसे बोले ‘तुमने एक दशक तक इस घिनौनी चीज़ से निपटने में मेरी मदद की है, क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें जाने दूंगा? नहीं, तुम हमारे लिए इससे लड़ोगी, जैसे मैं तुम सब के लिए इससे लड़ा था।” तारूलता बेन की आवाज़ भर्रा गई और फिर से हेमंत भाई ने प्रभार संभाल लिया।

‘‘अगले दिन हम अपने अपॉइन्टमेंट के समय डॉक्टर के पास गए। जिस क्षण हमने उनके केबिन में प्रवेश किया, डॉक्टर ने मज़ाक किया कि हम फैमेली पैकेज के लिए योग्य हो रहे थे। हम हंसे। उन्होंने पहले ही रिपोर्ट पढ़ ली थी और हमें बताया था कि कैंसर पूरी तरह से इलाज योग्य है, लेकिन प्रभावित टीशूज़ को हटाने के लिए तारूलता को सर्जरी की ज़रूरत होगी। हमें राहत महसूस हुई। लेकिन दिवाली समीप थी और तारूलता इसे घर में मनाना चाहती थी। डॉक्टर ने हमें थोड़ी गुंजाइश दी और सर्जरी दिवाली के बाद वाले दिन रखी। दिवाली के दिन हमने दीए लगाए और उनके साथ हर नकारात्मकता और दर्द जला दिया। हम सभी ने साथ में आरती  की।”

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एक बार फिर तारूलता ने बताना शुरू किया। ‘‘सर्जरी के बाद मैंने कीमो और रेडिएशन शुरू कर दिया।

हेमंत जानते थे कि मेरा शरीर किस तरह की प्रतिक्रिया देगा और राह में हर कदम पर वे मेरे साथ थे, खाने और सोने में मेरी मदद करने से लेकर ऐसे अक्रामक उपचार के साथ आने वाली चिढ़ को संभालने तक में।

मैंने इन सबका सामना किया, जैसे की उन्होंने किया था –

कमज़ोरी, भूख की कमी, निरंतर मतली का अहसास। उन्होंने एक भी बार गुस्सा किए बिना इन सबसे निपटने में मेरी मदद की, मैं तो कितना गुस्सा करती थी! मैं उन्हें खाना खिलाने के लिए जो तरकीब अपनाती थी उन्होंने भी वही किए। उपचार के दौरान मैंने उन्हें एक बार पूछा, ‘‘तुम्हारे बिना मैं क्या करती?’’ उन्होंने कहा, ‘ वास्तव में यह बस जैसे को तैसा है, अब तुम पर हुकुम चलाने की बारी मेरी है, जैसा तब तुम किया करती थी!’ ऐसे कई हल्के फुल्के क्षणों के कारण उपचार के दर्द से निपटना आसान हो गया।”

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जब मैंने हेमंत भाई से पूछा कि वे मेरे पाठकों के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे, तो उन्होंने कहा कि हमारे समाज में, महिलाएं अपने घर परिवार की छोटी बड़ी समस्याएं सुलझाने के लिए खुद की सेहत को नज़रंदाज़ करती हैं। लेकिन घर की लक्ष्मी वह कड़ी है जो पूरे घर को जोड़े रखती है। उसका स्वास्थ्य किसी से भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा, ‘‘हमारे समाज के पुरूषों के लिए, मैं कहना चाहूंगा, ‘कृपया खुद के स्वास्थ को हल्के में लेने के महिलाओं के इस स्वभाव के बारे में जागरूक रहें, यहीं पर हमें प्रभार लेना चाहिए और उसी गंभीरता के साथ इसका सामना करना चाहिए जो हमारा जीवन साथी डिज़र्व करता है।

मैं किताब के लॉन्च में फिर से उस जोड़े से मिली और देखा कि खाना खाते हुए वे बारी-बारी से प्लेट पकड़ रहे थे।

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