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भाभी-देवर के संबंध में बदलाव कब आया

कोमल सोनी एक भाभी और उसके देवर के बीच संवेदनशील संबंधों की उत्पत्ति, और वर्तमान समय में इसके यौन संबंधों में परिवर्तित होने का पता लगाती है।
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मैं भारतीय टीवी धारावाहिकों की प्रशंसक नहीं हूँ, लेकिन एक धारावाहिक जिसमें मैं वास्तव में रूचि रखती थी वह था ज़िंदगी चैनल पर अजय सिन्हा का आधे अधूरे। इसने एक भाभी और उसके देवर (पति का छोटा भाई) के बीच यौन संबंध का मोटे तौर पर जिक्र किया था। यह रवैये में खेदहीन, उपयोग में संवेदनशील और सौम्य था, और भले ही अपनी साहसी सामग्री के लिए इसने प्रशंसा प्राप्त की, लेकिन विरोध करने वाले भी पीछे नहीं थे, और चार महीनों में इसका प्रसारण बंद कर दिया गया।

भारत में भाभी देवर संबंध

भारत में देवर भाभी का संबंध कई मसालेदार कथाओं के लिए एक सामग्री रहा है। इसके हमेशा बदलने वाले, पेचीदा मैट्रिक्स ने आकर्षण और अधिक बढ़ा दिया हैः एक माँ समान स्त्री होने, विश्वासपात्र व्यक्ति होने से लेकर, कुछ उदाहरणों में, परिवार में रहने वाली पहली अजनबी स्त्री होने के कारण देवर के लिए अव्यक्त इच्छा की वस्तु बनने तक।

80 के दशक की समीक्षकों द्वारा प्रशंसित एक फीचर फिल्म ‘एक चादर मैली सी’ में, एक भाभी को उसके देवर के साथ शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है। इसी नाम के रविंदर सिंह बेदी के उपन्यास पर आधारित, यह फिल्म पंजाब के एक छोटे शहर की कहानी थी जिसमें ऋषि कपूर ने हेमा मालिनी के देवर की भूमिका अदा की थी। फिल्म तब नाटकीय मोड़ ले लेती है जब बड़े भाई की हत्या हो जाती है और युवा ऋषि को दस वर्ष बड़ी हेमा से शादी करने का कहा जाता है, जो दो बच्चों की माँ है।

पिछले वर्षों में देवर भाभी का संबंध

चादर डालने की परंपरा में एक विधवा अपने देवर के सिर पर चादर डालती है, जिससे उनका विवाह संपन्न होता है, ताकि विधवा और बच्चों की देखभाल की जा सके। इससे मृत पति की संपत्ति भी उसके छोटे भाई को मिल जाती है और संपत्ति परिवार में ही रहती है।

चादर डालने की परंपरा की उत्पत्ति नियोग प्रथा से हुई है, जिसका सबसे पहला वर्णन ऋग वेद में हुआ था। उस समय, स्त्रियां मृत पति की जलती चिता में कूद कर अपनी जान देते हुए सति प्रथा का पालन किया करती थी। नियोग, जिसका अर्थ है प्रतिनिधि मंडल, विधवा को पुर्नविवाह की अनुमित देता था, आमतौर पर पति के भाई के साथ। ऋग वेद में उल्लेख है कि एक विधवा को जलती चिता में से उसके देवर द्वारा निकाल लिया गया था, निश्चित रूप से उससे शादी करने के लिए।

बीते ज़माने में इस प्रथा का पालन किए जाने का अन्य कारण यह था कि संतान रहित विधवा परिवार के लिए एक वारिस पैदा कर सके -और यह काम पति के भाई से बेहतर कौन कर सकता है। इसे व्यभिचार नहीं समझा जाता था।

नियोग का विकास और मूल अवधारणा दि इवोल्यूशन एंड दि बेसिक कॉन्सेप्ट ऑफ नियोग में, लेखक करन कुमार कहते हैं कि यौन आनंद की बजाए यह भाई (या अन्य पुरूष संबंधी) का धर्म या कर्तव्य होता था कि सुनिश्चित करे कि परिवार की विरासत आगे बढ़े।

भारतीय महाकाव्य और पॉप संस्कृति में भाभी-देवर संबंध

महाभारत में, जब रानी सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई और वह अपने पीछे दो विधवा अंबिका और अंबालिका को छोड़ गया, तो सत्यवती ने अपने दूसरे पुत्र, ऋषि व्यास (दोनों स्त्रियों के देवर) को उनके साथ नियोग करने को कहा। इसी के परिणामस्वरूप धृतराष्ट्र और पांडु (जो कौरवों और पांडवों के पिता थे) का जन्म हुआ।

लेकिन अन्य पुराने काव्य रामायण में, राजकुमार लक्ष्मण ने अपने बड़े भाई राम की पत्नी की देखभाल एक माँ के रूप में की। ‘‘मैं उनके कंगन या झुमके नहीं पहचानता, लेकिन हर दिन मैं उनके पैर स्पर्श करता था इसलिए मैं उनकी पायल को पहचानता हूँ” यह उन्होंने तब कहा जब रावण द्वारा सीता का अपहरण किए जाने के बाद राम जंगल में सीता के छूटे हुए गहनो की पहचान कर रहे थे। अर्थात यह कि उनके पैरों के अलावा उसने संभवतः सम्मानवश उनके शरीर के अन्य किसी अंग पर कभी गौर नहीं किया ।

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उसके बाद, 20वीं शताब्दी में, कहा जाता है कि महान कवि, लेखक, कलाकार और नोबेल पुरस्कार विजेता रबिन्द्रनाथ टैगोर अपनी भाभी कादंबरी देवी को अपनी प्रेरणा मानते थे। उनकी भाभी ने कविताओं से लेकर चित्रों तक उनके कई मास्टरपीस को प्रेरित किया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की इतिहास की सहयोगी प्रोफेसर, चारू गुप्ता, मॉडर्न एशियन स्टडीज़ पत्रिका में अपने लेख (इम) पॉसिबल लव एंड सेक्सुअल प्लेज़र में लिखती हैं, ‘‘देवर और भाभी के संबंध में और किसी चीज़ से ज़्यादा हल्के फुल्के मज़ाक और मस्ती के आदान प्रदान का तत्व, आनंद का उत्साहपूर्ण और अनौपचारिक अर्थ और थोड़ी भावनात्मक निर्भरता होती थी। यह उस संयमित संबंध से अलग था जो स्त्री अपने पति के साथ साझा करती थी।”

किस प्रकार सेक्स और व्यभिचार ने देवर भाभी के संबंध में प्रवेश किया और इसे गंदा बना दिया

अगले कुछ वर्षों में, औद्योगिकीकरण ने नियोग की अवधारणा को बदल दिया। चूंकि पूरे देश के युवा पुरूषों ने जीवित रहने के लिए शहरों में पलायन करना शुरू कर दिया और वे अपने पीछे अकेली पत्नियाँ छोड़ गए, जिन्होंने संतुष्टि के लिए युवा देवर की ओर रूख किया; देवर केवल दोपहरों में अपने पति का स्थान लेने के लिए आतुर होते थे। देवर अब भी अपनी भाभियों के बारे में कामुक कल्पना करते हैं; खासतौर पर भारत के छोटे शहरों में, जहां लाखों पुरूष आकर्षक, कामुक, एनिमेटेड चरित्र सविता भाभी को पसंद करते हैं।

यह कहने की ज़रूरत नहीं कि सभी देवर भाभी संबंध व्यभिचार या फिर माँ-बेटे के संबंध की तरह नहीं होते हैं। सभी संबंधों की तरह, वे विभिन्न रंगों में आते हैं और इनमें से एक का चित्रण करने पर एक टीवी धारावाहिक का प्रसारण बंद नहीं कर देना चाहिए।

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