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भगवान कृष्ण ने साबित किया है कि संबंध में अभिमान और ईर्ष्या की कोई जगह नहीं है

अगर शुरूआत में ही इसे रोक ना लिया जाए तो एक संबंध में अहंकार अपरिवर्तनीय क्षति का कारण बन सकता है।

अहंकार मनुष्यों के लिए एक नई अवधारणा नहीं है। हममें हमेशा से वह सहज भावना रही है जो अभिमान, ईर्ष्या और कई अन्य भावनाओं का मूल कारण रही है जिन्हें नकारात्मक माना जाता है और अतिरिक्त मात्रा में उनका होना हानिकारक माना जाता है।

यह अहंकार संबंधों को नुकसान पहुंचा सकता है। यह दोनों पक्षों के बीच घर्षण का कारण बन सकता है अगर वे अपने अहंकारों को नियंत्रित करने में असफल होते हैं। और यह विफलता ही असुरक्षा, ईर्ष्या आदि का कारण बनती है जो अंततः रिश्ते को समाप्त कर देती है। अगर इसे शुरू में ही रोक दिया जाए, तो अधिकांश रिश्ते तुरंत सुधर सकते हैं।

हमारी विशाल पौराणिक कथाओं में से एक कहानी वैवाहिक संबंध में अहंकार और ईर्ष्या से संबंधित है। हममें से कई जानते हैं कि भगवान कृष्ण के पास लगभग 160008 पत्नियां थीं। भगवान विष्णु के अवतार द्वारा नर्कासुर का वध करने के बाद उन्होंने नर्कासुर की कालकोठरी में से 16000 पत्नियों को बचाया था। अन्य आठ पत्नियां रूक्मणी, जाम्बवंती, कालिंदी, सत्यभामा, नग्नजीति, मित्रविंदा, भद्रा और लक्ष्मणा थीं। हालांकि, उनकी मुख्य पत्नी रूक्मणी थीं, जिन्हें देवी लक्ष्मी का अवतार माना जाता है।

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सत्यभामा काफी सुंदर थी और वह कृष्ण को बहुत प्यार करती थी और उनका बहुत सम्मान करती थी। ऐसी अफवाह थी कि वह भौतिकवादी थी और उसे अपनी सुंदरता पर घमंड था। लेकिन उसे हमेशा लगता था कि रूक्मणी उसकी सारी महिमा चुरा लेती थी। उसके दंभ ने उसका अहंकार बढ़ा दिया और इस प्रकार उसके मन में रूक्मणी के प्रति ईर्ष्या की आग दहकने लगी।

एक दिन ऐसा हुआ कि सत्यभामा ने कृष्ण के मन में उसके प्रति प्यार का दावा किया। यह कोई संयोग नहीं कि तभी नारद मुनी उसके कमरे के बाहर से गुज़रे और उन्होंने उसकी बात सुन ली। उन्होंने यह कह कर उसका विरोध किया कि कृष्ण उसे सबसे ज़्यादा प्यार नहीं करते हैं और उसका प्यार सिर्फ एक भ्रम है। उन्होंने यह भी कहा कि वास्तव में कृष्ण रूक्मणी से सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं और उसी की परवाह करते हैं। इस पर, सत्यभामा क्रोधित हो गई और उसने मांग की कि नारद जो कुछ भी कह रहे हैं उसे साबित करे। हमेशा की तरह, स्वर्ग के चतुर तपस्वी नारद ने उसे एक व्रत करने के लिए मना लिया जिसमें उसे कृष्ण को नारद को दान में देना था और फिर अगर वह उसे वापस प्राप्त करना चाहे तो वह उसे कृष्ण के वज़न के बराबर धन देकर उसे पुनः प्राप्त कर सकती थी। यह रिवाज़ तुलाभ्रम के नाम से जाना जाने लगा। जब सत्यभामा हिचकिचाई (ज़ाहिर है जिस पुरूष से वह प्यार करती है उसे दान में देने के बारे में वह सोच भी नहीं सकती थी) तब नारद मुनी ने यह कहकर उसके अहंकार को उकसाया कि उसकी सारी संपत्ति कृष्ण के वज़न के बराबर नहीं हो सकती है। रूक्मणी को पीछे छ़ोड़ने के लिए (नारद ऋषि ने उसे बताया था कि यह अनुष्ठान करने से उसके प्रति कृष्ण का प्यार दस गुना बढ़ जाएगा) और यह साबित करने के लिए कि उसकी संपत्ति अथाह है, सत्यभामा राज़ी हो गई और हंसने लगी कि कृष्ण से अधिक वज़न होना उसके बायें हाथ का खेल है। लेकिन तब नारद ने उसे चेतावनी दी कि अगर वह कृष्ण के वज़न से मेल खाने में विफल रहती है तो कृष्ण उनके दास बन जाएंगे और उनकी आज्ञा का पालन करेंगे।

सत्यभामा ने स्वीकार कर लिया जिससे दूसरी पत्नियां डर गईं और उन्होंने विरोध किया लेकिन असफल रही। कृष्ण ने नम्रता से रिवाज़ के लिए हामी भर दी। फिर सत्यभामा ने एक विशाल तराजू की व्यवस्था की और अपनी सारी संपत्ति उस पर रख दी। तराजू डिगा नहीं। स्वर्ग के ऋषि ने उसके प्रयासों का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया और चिल्लाने लगे की अब कृष्ण की निलामी कर दी जाएगी। उन्माद में आकर उसने अन्य पत्नियों से मदद मांगी। उन्होंने कृष्ण के प्रति अपने प्यार के लिए अपने सारे आभूषण डाल दिए।

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रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

फिर भी, प्रयास व्यर्थ साबित हुआ।

कृष्ण चुप रहे; उसे पुनः प्राप्त करने के लिए अपनी पत्नियों की व्यग्रता और विफलता देखकर उन्होंने कहा कि अब वह ऋषि के दास बन चुके हैं और उन्हें अपनी प्रिय पत्नियों से अलग होना होगा।

सत्यभामा ने अपने प्रिय कृष्ण को वापस जीतने के लिए जवाबों की तलाश शुरू कर दी। जब नारद ने उसे सुझाव दिया कि रूक्मणी उसे इस समस्या से बाहर निकाल सकती है, तो उसने अहंकार निगल लिया और मुख्य पत्नी से अपील की।

फिर रूक्मणी ने पूरी तराजू खाली कर दी और उस पर एक तुलसी का पत्ता रखा। तराजू का पलड़ा तुरंत नीचे आ गया और कृष्ण के वज़न के बराबर आ गया।

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फिर कृष्ण खड़े हो गए और कहा कि जीवन साथी की भक्ति ही एकमात्र चीज़ है जो किसी के लिए प्यार की मात्रा निर्धारित करती है। इसमें गर्व, अहंकार, ईर्ष्या का कोई स्थान नहीं है।

जैसा कि आपने देखा, रूक्मणी को हराने की सत्यभामा की इच्छा उसके लिए ही एक सबक बन गई। अहंकार एक जटिल भावना है। हम वास्तव में इसे समाप्त नहीं कर सकते हैं। लेकिन हम इसे नियंत्रित कर सकते हैं, इसे सीमित कर सकते हैं ताकि यह अन्य लोगों के साथ हमारे संबंध को बधित ना करे।

संबंध में होने पर हर अहंकार मिटा दें। सिर्फ प्यार ही संबंध को उंचा उठा सकता है; अहंकार तो उसे नीचे गिरा देगा।

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