भाई और मैं उसकी शादी के बाद दूर होते गए

Anish A R
sid and fawad in kapoor and sons

पत्नी के आते ही बाकी का परिवार छूट गया?

कहते है की बेटियां तो ज़िन्दगी भर बेटियां ही रहती हैं मगर बेटे बस शादी तक ही बेटे रहते हैं. ये बात असल में भाइयों पर भी लागू हो सकती है. दो भाई अक्सर दो गहरे दोस्त जैसे होते है, एक साथ बड़े होते हैं, एक दुसरे की मदद करते हैं, लड़ते झगड़ते भी हैं मगर दोनों के बीच असीम प्यार भी होता है, मगर बस तब तक जब तक की उनकी शादियां नहीं हुई होती. जैसे ही किसी की पत्नी ज़िन्दगी में आती है, दोनों के बीच के सारे सम्बन्ध बिलकुल बदल जाते हैं और अक्सर वो बेहतर के तरफ नहीं बदलते है.

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जब मैं और मेरे भाई बड़े हो रहे थे तब हम दोनों के बीच ज़्यादा कुछ अंतर नहीं था. हम सबसे अच्छे दोस्त नहीं थे मगर हम दुश्मन भी नहीं थे. हम दोनों के बीच पांच साल का अंतर था और इसलिए हम दोनों में ज़्यादा कुछ कॉमन रूचि भी नहीं थी. हम दोनों ही ये जानते थे की कभी भी ज़रुरत पड़ने  हम दोनों एक दुसरे के लिए हमेशा खड़े होंगे. हम दोनों ही जैसे जैसे बड़े हुए, एक दुसरे से अलग होते गए मगर हमारे रिश्ते में कभी कोई खटास नहीं थी.

जब मेरा भाई २२ का था और मैं सत्रह का, तब उसने शादी कर ली. उसकी शादी के कुछ दिनों बाद ही मैं अगले चार सालों के लिए आगे की पढ़ाई करने विदेश चला गया. जब मैं वापस आया, चीज़ें बदलने लगीं.

उसकी ज़िन्दगी के  मायने बदल रहे थे

ये तो साफ़ था की उसकी ज़िन्दगी में  महत्ता बदल रही थी. वो अब एक बहुत ही केयरिंग पति था और दो प्यारी लड़कियों का पिता था और वो अपनी ज़िम्मेदारियाँ इतनी बखूबी निभा रहा था की कोई विश्वास ही नहीं कर सकता था. मगर सिर्फ इसलिए की उसकी ज़िन्दगी के मायने बदल गए थे, मेरे लिए भी सब कुछ बदल जाए ऐसा मुमकिन नहीं था. मैं अब भी कुंवारा था और अपने माता पिता के साथ ही रहता था. कई बार ऐसे भी मौके आये की माँ की तबियत काफी ख़राब हुई और उन्हें हस्पताल ले जाने की नौबत पड़ी, मैं ही हमेशा अपनी माँ के पास रुका जबकि मेरा भाई पत्नी के पास घर चला जाता था. मुझे लगने लगा की मेरी शादी नहीं होने के कारण काफी कुछ करना पड़ रहा है.

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मैं ये मानता हूँ की बीवी और बच्चे होने के बाद इंसान की प्रिऑरिटीज़ बदल जाती हैं मगर ये किसी और ज़िम्मेदारी को ताक पर रख कर नहीं होना चाहिए.

मैं ये मानता हूँ की बीवी और बच्चे होने के बाद इंसान की प्रिऑरिटीज़ बदल जाती हैं मगर ये किसी और ज़िम्मेदारी को ताक पर रख कर नहीं होना चाहिए.

मेरे भाई की सास काफी दखलंदाज़ी करती हैं

अपनी पत्नी की सास से अच्छे सम्बन्ध होना ज़रूरी है. मगर कभी कभी वो एक महिला दो भाइयों के बीच काफी परेशानियां खड़ी कर सकती हैं. मेरे भाई के मामले में उसकी सास के हाथ में ही उसकी पूरी ज़िन्दगी की डोर थी. उसके कपड़ों से लेकर उसकी काम वाली बाई तक, और यहाँ तक की उन्हें माँ बाप कब बनना चाहिए, सब कुछ का फैसला वो अकेली औरत ही करती थी. वो अपने दामाद को उस पुश्तैनी प्रॉपर्टी से अलग कैसे कर सकती थी जो हम दोनों भाइयों के बराबरी की हिस्से का था. वो सब कुछ अपनी बेटी को देना चाहती थी और मेरे आधे हिस्से का तो उन्हें ध्यान ही नहीं था. उन्होंने अपने कपटी दिमाग से मेरे भाई को इस तरह बहका लिया की उसे मेरे हिस्से की जायदाद भी हड़पने में कुछ बुरा नहीं लग रहा था. दुःख की बात थी की मेरा भाई उसकी बातों को कभी गलत नहीं ठहरा रहा था और इसलिए वो वक़्त के साथ अपने इरादों में और पक्की होती चली गई.

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मेरी भाभी ने मुश्किलें खड़ी करनी शुरू कर दी

घर की महिलाओं ने पूरा वातावरण ज़हरीला कर दिया. चीज़ें इतनी बिगड़ गई की हम दो भाई जो कभी दोस्त थे, अब एक दुसरे से नफरत करने लगे. मेरी भाभी  ने अपने दिमाग की धूर्तता से मुझे परिवार के व्यवसाय से बेदखल करवा दिया और मुझे शहर छोड़ने को भी मजबूर कर दिया. जब हमारा पारिवारिक व्यवसाय ठीक नहीं चल रहा था, मेरी भाभी ने भाई को समझाया की वो मेरी तनख्वाह से कार ख़रीदे. जैसे जैसे मैं बड़ा हुआ, मैं और मेहनत करने लगा ताकि मुझे हमारे बिज़नेस में मेरा हिस्सा तो मिल ही जाए मगर क्योंकि भाई शादीशुदा था और मैं नहीं, हमेशा यही माना गया की उसकी ज़रूरतें मुझसे ज़्यादा है. ऐसा लगता  लगता था की भाई का शादीशुदा होना उसे मुझे अपने ही घर में लूटने का हक़ देता था.

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आज सात साल बाद हम दोनों भाई दुश्मनों जैसे हो गए हैं. मैं बैंगलोर में हूँ और वो पुणे में. हम यूँ तो बात ही नहीं करते हैं और अगर करते भी है, तो सिर्फ झगड़ने. अजीब लगता है की कैसे एक समझदार व्यस्क व्यक्ति सिर्फ इसलिए गलत फैसले लेता है क्योंकि वो शादीशुदा है. क्यों नहीं वो अपने दिमाग का इस्तेमाल करता है और अपनी पत्नी और सास की राय को आंकता है.

कभी कभी सोचता हूँ की क्या मेरी भाभी की वजह से ही भाई मुझसे दूर हुआ या हम दोनों का रिश्ता यूँ कमजोर ही था.

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