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भारत में वैवाहिक बलात्कार की गंभीर सच्चाई

भारत में वैवाहिक बलात्कार की गंभीर वास्तविकता और पीड़ितों के लिए न्याय के विकल्प
Marital-Rape-in-India

जब मैंने सुषमा (बदला हुआ नाम) का अपने घर में स्वागत करने के लिए दरवाज़ा खोला, मैंने उसके बाँयी आँख के नीचे पड़े भयानक घाव को देखा। मैंने उसके लिए एक कप चाय बनाई और उसे अपने पास सोफे पर बैठने को कहा। उसने ट्रे से कप लिया और अनिच्छा से बैठ गई। ‘‘क्या यह उसने किया?’’ मैंने उससे पूछा।

“दो दिन पहले” उसने कहा। ‘‘वह कुछ दिनों के लिए गाँव गया है। इसीलिए मैं यहाँ आ पायी।” सुषमा एक परिचित की रिश्तेदार है, जिसे मैंने यूहीं बता दिया था कि मैं वैवाहिक बलात्कार पर एक लेख पर काम कर रही हूँ। उसने आग्रह किया कि मुझे सुषमा से बात करनी चाहिए।

“क्या हुआ?’’

“वही हमेशा की कहानी, वह देर रात को नशे में धुत्त घर आया। मैं और बच्चे ज़मीन पर सो रहे थे। जैसे ही वह घर में आया, उसने बच्चों को लात मारी। मैं शोरगुल से जाग गयी। मुझे पता था कि क्या होने वाला है। इसलिए मैंने तुरंत बच्चों को बाहर भेज दिया। इससे पहले कि मैं दरवाज़ा बंद कर पाती, वह पैंट उतार चुका था। मैंने भागने की कोशिश की लेकिन उसने मुझे मुक्का मार दिया। बस फिर सब खत्म हो गया। जब मैं बच्चां को वापस बुलाने के लिए बाहर गई, वे एक कोने में भीगे, दुबके बैठे थे। बहुत ज़ोरों की बारिश हो रही, और मेरे पास इतना वक्त भी नहीं था कि मैं उन्हें छतरी दे सकूं।” वह रो पड़ी।

“आप पुलिस के पास नहीं गईं?’’

“मैं गई थी। लगभग एक साल पहले वे उसे स्टेशन ले गए और उसे धमकी दी। और फिर उसे छोड़ दिया। उस रात वह इतने गुस्से में घर आया कि उसने मुझे बुरी तरह पीटा। मैं एक हफ्ते तक बिस्तर पर से नहीं उठ सकी। पुलिस के पास जाने का कोई फायदा नहीं है। वे उसे वहाँ नहीं रखने वाले हैं। मेरे पास केवल एक रास्ता है…’’

“क्या?’’

“मैं उसे तलाक दे सकती हूँ। मैंने इस बारे में एक वकील से बात की। उन्होंने मुझे बताया कि मैं बलात्कार के बारे में कुछ नहीं बता सकती। इसलिए केवल पीटने की ही बात की जा सकेगी। मुझे एलीमोनी (निर्वाह धन) बच्चों की कस्टड़ी और बाकी सब चीज़ों के लिए लड़ना होगा। अगर मैं उसे छोड़ देती हूँ तो मुझे शुरूआत से शुरू करना होगा। दो बच्चों के साथ यह डरावना है।”

“तो, अब आप क्या करोगी? मैंने पूछा।

“मुझे नहीं पता”

अगर एक ही घर में महिला अपने पति के साथ रहती है तो वैवाहिक बलात्कार के लिए भारतीय कानूनी व्यवस्था में उसके लिए कोई उपाय नहीं है। यह दावा करने के लिए कि वह वैवाहिक बलात्कार की शिकार है, वह या तो एक नाबालिग होनी चाहिए या अपने पति से अलग। सुषमा जैसी महिलाएँ केवल घरेलू हिंसा अधिनियम (डीवी अधिनियम) के तहत संरक्षण प्राप्त कर सकती हैं, जो कि एक नागरिक कानून है। डीवी अधिनियम के तहत भी, सुषमा संरक्षण आदेश, मौद्रिक राहत, कस्टडी आदेश, निवास आदेश, मुआवज़े का आदेश, या ऐसे एक से अधिक आदेश प्राप्त कर सकती है, लेकिन उसका पति बिना सज़ा के छूट जाएगा। उसे अदालत में पेश या कानून द्वारा दंडित नहीं किया जाएगा।

अच्छे के लिए दबाव

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सुषमा की कहानी ने मुझे हक्का-बक्का छोड़ दिया। जवाब ढूँढने के लिए मैं रेड एलीफेंट फाउंडेशन के पास गई। ‘‘भारत में, एक महिला की किसी अनजान व्यक्ति की तुलना में अपने पति द्वारा बलात्कार किए जाने की 40 प्रतिशत अधिक संभावना है,’’ वंदना मोरारका ने मुझे बताया। वंदना मोरारका रेड एलिफेंट फाउंडेशन में कानूनी शोधकर्ता है। कीर्ति जयकुमार के साथ, वंदिता, वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण के लिए प्रचार करने में लगे मुख्य दल का हिस्सा थीं।

एक तरफ, महिला और बाल विकास मंत्री, सुश्री मेनका गाँधी ने कहा है कि वैवाहिक बलात्कार का शब्द ‘भारतीय संदर्भ में लागू नहीं किया जा सकता है’, दूसरी ओर हम लिंग आधारित हिंसा से गुज़रे लोगों लिए ‘साहस’ एैप की संस्थापक कीर्ति जयकुमार जैसी विचारशील आवाज़ें सुनते हैं कि ‘‘बलात्कार बलात्कार होता है, चाहे वह कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में हुआ हो।”

समाज के लिए एक संकट

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हाल ही में, अदालत में यह तर्क थे कि वैवाहिक बलात्कार के खिलाफ कानून, विवाह की संस्था को ही खतरे में डाल सकता है। वन फ्यूचर की संस्थापक और सीईओ, वंदिता मोरारका, इस विचार का मज़बूती से विरोध करती हैं। ‘‘इस तर्क का उपयोग करते हुए कि वैवाहिक बलात्कार विवाह की संस्था को खतरे में डाल सकता है, हम वैवाहिक बलात्कार को, जो अंततः बलात्कार/ यौन हिंसा का ही एक रूप है, इस संस्था का ही मुख्य घटक बना रहे हैं। क्या हम चाहते हैं कि हर पीढ़ी विवाह के इसी विचार के साथ बड़ी हो? हमें विवाह की हमारी समझ को निरंकुश और पुरूष प्रभुत्व के संदर्भ से उस विचार में बदलने की ज़रूरत है जो विवाह को समान लोगों की भागीदारी समझता हो, केवल सहमति के आधार पर।”

सुषमा सहमत हैं। ‘‘मैंने अपने पिता को मेरी माँ को पीटते देखा है। शायद इसी लिए मैं दब्बू हूँ जो उसकी हरकतें सहन करती हूँ। मैं अपने बच्चों के लिए डरती हूँ। मैं चाहती हूँ कि वे प्यार और सम्मान देना और लेना सीखें। यह अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचना चाहिए।”

“मुझे आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि दहेज कानूनों के साथ क्या हुआ। अगर हम वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण करते हैं, तो भी ऐसा ही होगा। जो महिला अपने पति से परेशान है या बोर हो गई है, वह झूठा नाटक करेगी” अनामिकता के भीतर छुपकर बांबे हाइकोर्ट के एक वकील ने कहा।

एक बार फिर, कीर्ति ने विवेकशील बात कही। ‘‘ये आशंकाएँ मुझे उस वाक्यांश की याद दिलाती हैं ‘‘फालतू चीज़ों के साथ काम की चीज़ भी फेंक देना” दुनिया में हर चीज़ का गलत इस्तमाल किया जा सकता हैः आप चाकू से एक फल भी काट सकते हैं और हत्या भी कर सकते हैं। तो क्या हम चाकू पर रोक लगा सकते हैं? नहीं। हर वैधानिक साधन का दुरूपयोग किया जा सकता है। तथ्य यह है कि हितों की रक्षा करने वाले कानून को बचाने में एक बड़ा उद्देश्य पूरा हो रहा है। दुरूपयोग से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि इसे प्रयुक्त, निष्पादित, समझने, और लागू करने के तरीकों के संबंध में सुरक्षा उपाय स्थापित किए जाएँ। इसीलिए हमारे पास उचित प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय और जांच प्रकियाएँ होनी चाहिए जो संवेदनशील और उपयुक्त हों।”

जब तक कि भारतीय विधि निर्माता इसे आवश्यक नहीं समझते, मैंने सुषमा से पूछा कि वह क्या बदलाव चाहती है। ‘‘पहली चीज़ जिसकी ज़रूरत भारतीय महिलाओं को है वह ‘चयन की स्वतंत्रता’ है। हमें पढ़ाई, शादी, संतान, सेक्स के विषय में निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपनी बेटी को यह स्वतंत्रता दूँगी,’’ आंखो में उम्मीद की चमक के साथ उसने कहा।

Vandita-Pic

वंदिता मोरारका रेड एलीफेंट फाउंउेशन में एक कानूनी शोधकर्ता हैं, जहाँ वह वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण की ओर अपने अभियान का प्रचार करने में शामिल मुख्य दल का हिस्सा थीं। वह वन फ्यूचर कलेक्टिव की संस्थापक और सीइओ और सुरक्षितता के लिए नीति, कानूनी और संयुक्त राष्ट्र की संपर्क अधिकारी (रेड डॉट फाउंडेशन) भी हैं। उन्होंने सरकारी निकायों, अंतराष्ट्रीय और राष्ट्रीय एनएफपी और लोकोपकारियों के याथ बड़े पैमाने पर काम किया है, ताकि नागरिक कार्यवाही, लिंग न्याय, न्याय तक पहुंच और युवा नेतृत्व के मुद्दे को आगे बढ़ाया जा सके; वैवाहिक बलात्कार और हिंसा के पहलुओं सहित, सामाजिक नेतृत्व में 500+ युवाओं को तथा लिंग, यौन हिंसा और कानून के पहलुओं में 10,000+ व्यक्तियों को प्रशिक्षित करते हुए।

Kirthi-Pic

कीर्ति जयकुमार एक भारतीय महिला अधिकार कार्यकर्ता, सामाजिक उद्यमी, शांति कार्यकर्ता, कलाकार, वकील और लेखक हैं। वे रेड एलीफेंट फाउंडेशन और लिंग आधारित हिंसा से गुज़रे लोगों के लिए एक ऐप ‘साहस’, की संस्थापक हैं। उन्होंने 2011 में अमेरिकी राष्ट्रपति सेवा पदक और 2012 और 2013 में संयुक्त राष्ट्र के दो ऑनलाइन स्वयंसेवा पुरूस्कार प्राप्त किए।

 

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1 Comment

  1. Those who want to criminalise so called marital rape just because ‘consent is required in marriage too’, I want to ask one question to them. If consent is required in marriage too then why only in sexual matters? It should be required in each and every matter. Like, a wife must ask for consent of husband before entering into his house and should leave his house the moment he withdraws his consent for same, else it should be treated as marital house trespassing. How many supporters of criminalisation of marital rape will support it? How about removing the legal compulsion on husband to maintain his wife lifetime and put it fully under will and consent of husband which can be revoked anytime and violation of that consent by wife be made criminal offence??
    And if so called marital rape will be criminalised, will husband be given choice of sex outside marriage without being guilty of adultary and paying hefty alimony to wife in case of divorce because of it?? If anyone advocated ‘freedom of choice’ then remember that a man should also have freedom to choose his sex partner irrespective of marital satus, freedom to have sex with consensual partner irrespective of relationship at anytime, freedom to choose to spend his income and wealth on anyone or not on anyone, even on his own wife and children without being accused of commiting economic violence.
    Just as there is 40% probability of suffering sexual violence by husband for a woman, there is 100% probability of a man suffering economic violence by his wife in the form of compulsory maintence irrespective of his will and consent; even after divorce.
    Goverment gave logic of breaking of institution of marriage if so called marital rape is criminalised because if goverment bar any person from having sexual relationship with his/her spouce on will, then it will not have any moral authority to stop married person from having sex with other than own spouce. Same will go with spouce. After all, one cant stop anyone from getting anything which is perfectly legal(of having sex with consensual part er) if one cant provide it.
    And yes, the scope of misuse will be more. See the example of IPC sec 498A. Now after some judgements which bar autometic arrest in this section, now disgrunted wives have started using sec 377 to get their husband arrssted on charge of un natural offence which means having anal or oral sex(even if happen with will of wife, man is legally criminal). This section 377 is nearly of the nature of rape and amazingly, NOT a single husband has been convicted in this section by his wife but enough husbands have been arrested on mere complain of wife, have been put behind bar, have been forced to do settlement favourable to wife in matrimonial disputes. One can simply check this from NCRB data, where IPC 377 was filed against husband and status and final judgement of the case.
    If each law is prone to misuse so we can have one sided loopholed law then it should be gender neutral, so that each and every one should have equal oppertunity to misuse it and carry on extortion out of it. But, then in 2013 only, ‘prominent feminists’ of our country successfully opposed attempt of goverment to make sexual crimes gender neutral, just because of fear of MEN WILL MISUSE IT and may file a case against victim after commiting crime against women. So, yes misuse of law is a big threat. Every law can be misused but effect of misuse of every law is different. In case of most of laws, an accused is presumed to be innocent until proven guilty while in matrimonial and sexual offence laws, the nature of law is such that here an accused is asked to prove his innocence by police.
    Before criminalising so called marital rape, there should be some change in other matrimonial laws like
    Maintenance of wife in every form should be solely based on consent of husband which he can remove as per his own will. Like, if one night, if husband refuse to let wife in his won house wife should follow it and vacate his house at that time instead of charging husband of any sort of violence. After all, will and consent of everyone as far as personal choice is conserned, in every situation should be kept supreme and above anything
    No alimony or maintenance should be forced on husband without his CONSENT in any situation. After all, consent matters in financial and economic matters too and a man should have full autonomy over his finance, wealth, earning irrespective of his own marital status.
    It should not be any crime whether civil or criminal if a husband establish sexual relationship with any other woman if wife refuse to have sex with husband.
    A man should not be forced to live in any matrimonial alliance without his own CONSENT and should have right to unilateraly end marriage with ending all rights and responsibilities as per his own will and CONSENT with no one, even wife to have authority to question the choice of husband to end marriage as per own consent. Needless to say, no financial or any kind of support from husband to wife without his CONSENT in any situation including in case of divorce.
    How it will be?? Try to ask this question to those supporting criminalising marital rape. If marriage is not the right to have sex without consent, marriage is also not the licence to stop anyone from having sex with anyone other than spouce, marriage is not the licence to force anyone to use his income, wealth, properties for any person without his consent, marriage should also not be the licence to stop any person from getting married again just because he/she is married with any other person(polygamy should be decriminalise, as it prevent people from making choices of just because they are married).
    Hope, those want to criminalise so called marital rape, they will agree with me as my argument is also based on principle of respecting consent, freedom to make choices.
    How it will be??

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