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भारतीय महिला सिर्फ लजा के ही प्यार क्यों दर्शाती है?

हमेशा पुरूषों को ही क्यों पहल करनी चाहिए सेक्स में? एक स्त्री क्यों नहीं अपनी यौन इच्छाएं दर्शा सकती?
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जब वह आपको चुम्बन देने के लिए नीचे झुकता है तो कितनी बार आपने मुंह की बजाए गाल प्रस्तुत किया है? अनगिनत बार, है ना?

एक राष्ट्र के रूप में, हमारी स्त्रियों को कभी भी प्रेमी की ओर झुकते हुए चित्रित नहीं किया जाता है। एक प्रेमी की आंखों में देखने की बजाए स्त्री को हमेशा परे देखते हुए दर्शाया जाता है। हमने स्वाभाविक रूप से रोमांस की इस लोकप्रिय धररणा को मान लिया है जहां नायक स्त्री की एक झलक पाने के लिए भूखा है, और स्त्री या तो दबे होंठों के साथ आखें बंद करती दिखती है या फिर जब वह सही समय आता है जब उसे अपने प्रेमी को गले लगाना है, वह दूसरी ओर देखती है या बस अपनी आंखे झुका लेती है।

परे देखने को उस मुख्य रूमानी इशारे के रूप में देखा जाता था जो एक स्त्री दे सकती थी।

कोमल और शर्मीली होना, कांपना और सीमित होना, यही स्त्री के सबसे अधिक कामुक होने के लक्षण थे। मुझे याद नहीं कि किसी अग्रणी स्त्री ने कहा हो, ‘पहलू में आ जाओ’, या ‘आओ, मैं तुम्हें गले लगा लूं’। क्या सिनेमा निर्माताओं और कला निर्माताओं ने पितृसत्ता के अपने स्वयं के विचित्र विचारों को आगे बढ़ाया या वे पारंपरिक लड़के थे, जो वह चित्रित करने का प्रयास कर रहे थे जो उन्होंने बड़ा होते हुए सीखा था?
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शर्मीली रहो, संकोची रहो

मुझे याद है, बड़ा होने के दौरान, मेरे पिता को एक स्त्री के रूप में मेरी माँ में बहुत रूचि थी, बहुत लंबे समय तक। वह काम के बाद धीरे धीरे बढ़ते और किचन में, जहां माँ सबसे ज़्यादा समय व्यतीत करती थी, उन्हें पकड़कर उन्हें हैरान कर देते और वे अक्सर बुदबादाया करती, जैसे कि दीवारें पत्थरों की बनी थीं, “बच्चे पढ़ रहे हैं, आप ये क्या कर रहे हैं?”

बहुत से लोग कहते हैं कि यह बदल रहा है। मैं पूछती हूँ कहां? हम सब लोग थोड़े बहुत आदर्शों के अंतर के साथ उसी समाज में बड़े हुए हैं, लेकिन कुल मिलाकर हमने वही फिल्में, गीत और डायलॉग सुने और अनुभव किए।

जब पुरूष गा रहे थे, बदन पे सितारे लपेटे हुए, ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो, या छू लेने दो नाज़ुक होंठों को, कुछ और नहीं हैं, जाम है ये, स्त्रियां तेज़ी से अपने पति को स्वामी या भगवान बना रही थी, तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं प्राण मेरे, तुम्हीं आत्मा हो। हां, ऐसे कई स्त्री गीत हैं जो पुरूष के प्रति उनका रोमांस गाया करते थे, लेकिन फिर भी वे पुरूषों के गानों से कम थे। श्रेष्ठ फिल्म रोजा और नवविवाहितों की सबसे पहली अंतरंगता में भी, जब पति अपनी संकोची पत्नी को लुभाने की कोशिश करता है तो यह प्यारा और कामुक था; फिर से, एक विशिष्ट परिदृश्य जहां केवल पुरूष को रूचि है।

प्लीज़ सेक्स नहीं, हम स्त्रियां हैं

एक पुरूष के लिए एक स्त्री नायक की लालसा हम लगभग कभी नहीं देखते हैं, या इस विषय में, जब पुरूष द्वारा पहल होती है तब भी वह झुकती नहीं है। क्या यह हमारे अंदर गहराई से भरा है? क्या बच्चियां इन चित्रों को देखती हैं और इन्हें आदर्श मानते हुए बड़ी होती हैं? यह कोई रहस्य नहीं है कि हमारे समाज में, ऐसी उम्मीद की जाती है कि पुरूषों को दिलचस्पी हो, उन्ही से अपेक्षा की जाती है कि वह हमेशा इच्छा रखे, मैं सोचती हूँ कि क्या वह भी वांछित होना चाहता है? मुझे यकीन है कि वह चाहता है; वह भी मनुष्य है। तो ऐसा क्यों है कि हमेशा पुरूष को ही एक स्त्री की इच्छा और लालसा करते दिखाया जाता है?

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नई उम्र की एक बहुत ही दिलचस्प फिल्म ओके जानू में, लड़की भी लड़के में उतनी ही दिलचस्पी रखती है, यौन रूप से। वह स्वतंत्र, आत्मनिर्भर है, वह जानती है कि वह किसे पसंद करती है और वह क्या चाहती है, वह इच्छा को जानती है और वह निश्चित रूप से वासना को जानती है। यह चिकनी चमेली हूँ मैं प्रकार का भद्दा बिना सिर पैर का ओब्जेक्टीफिकेशन नहीं था।

बीच वाली पीढ़ी

लेकिन उस पीढ़ी का क्या जो संयम और स्वतंत्रता के विचारों के बीच में अटकी है? क्या हम स्वयं द्वारा बनाए गए बंधनों को कभी तोड़ सकेंगे? क्या हम कभी कहेंगे, ‘हाँ, मैं तुम्हारी इच्छा रखती हूँ?’, ‘मैं इसी वक्त तुम्हें पाना चाहती हूँ’, क्या हम कभी भी स्वयं की इच्छाओं को व्यक्त करने में सक्षम होंगे? यहां तक कि अपने आप को ही?

मैंने एक परामर्शदाता/ चिकित्सक द्वारा एक कार्यशाला में भाग लिया, जिन्होंने 15 स्त्रियों की एक पूरी कक्षा को सिखाया कि सेक्स के लिए अपने साथी से संपर्क कैसे करें। और यह देखना हास्यास्पद रूप से दुखी था कि स्त्रियां इस विभाग में किस तरह भोली, दयनीय, शर्मीली और लगभग पूरी तरह अनभिज्ञ बर्ताव कर रही थीं। यह आमतौर पर वह करता है या कभी नहीं होता। ‘अगर वह मुझे प्रस्ताव नहीं देता, मैं कभी नहीं कहती या उसके पास होने की आवश्यकता भी महसूस नहीं करती।’

मैं यह कैसे करूं….

चिकित्सक ने हमसे खिड़की की तरफ कामुक तरीके से चलने को कहा, यह कल्पना करते हुए कि वह वहां खड़ा है। इस तरह से जो चीख-चीख कर बताए ‘आज मैं कामुक हूँ, मैं तुम्हें चाहती हूँ’। हममें से अधिकांश हद से ज़्यादा शर्मा रही थी, जड़वत थीं और एक उंगली तक नहीं हिला पा रही थी। कुछ शर्म की वजह से रोने लगीं, कुछ ने कामुकता से चलने की कोशिश ही, लेकिन खिलखिला कर हंस पड़ी; लेकिन कोई नहीं, कोई भी नहीं जानता था कि उस तरह से कैसे चलना है।

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तब चिकित्सक ने एक साथी के पास जाने का सबसे सरल विचार प्रकट किया। उसने बस अपने सहायक के साथ इसका अभिनय करके दिखाया, जो बस स्वयं की तरह चली, बगैर अतिरंजित आहों और पैंट और होंठों के चटाकों के। वह स्वयं का खूबसूरत रूप थी, उसने कहा, ‘‘जब मैं अपने बाल खुले छोड़ देती हूँ तब मुझे सेक्सी महसूस होता है, जब मैं अपनी पसंदीदा साड़ी पहनती हूँ तो मुझे खुद के बारे में अच्छा महसूस होता है। मुझे बहुत अच्छा महसूस होता है जब मेरे पास प्यार करने वाला दिल है और मुझे महसूस होता है कि इन क्षणों में मैं स्वयं के संपर्क में होती हूँ।” वह उस खिड़की पर चली गई जहां चिकित्सक, उसका काल्पनिक प्रेमी खड़ा था, उसने उसकी आंखों में देखा और अपनी आंखे नीची कर ली, फिर उसने दुबारा उनमें गहराई से देखा। मैं जानती थी कि मैं कंपकपा उठी थी; बस यही था। सब इंतज़ार कर रहे थे कि वह कुछ कहे, और उसने कहा, ‘‘मैं यही हूँ। अगर आप स्वयं को ढूंढ लेते हैं, तो आप जानते हैं कि आपको दूसरे को क्या प्रस्तुत करना है,’’ और हम सबने ताली बजाई।

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बाधाओं को तोड़ दें

क्या हम उसके बाद सबसे अच्छे प्रेमी बन गए, क्या हमने अपने साथियों को प्रस्ताव देना सीख लिया? मैं नहीं जानती, लेकिन मुझे लगता है कि मुझे कुछ कीमती चीज़ का अहसास हुआ, कि आपको परे देखने के प्रशिक्षण को तोड़ना होगा और आगे बढ़ने के नए अभ्यास को अपनाना होगा। अगली बार जब वह चूमने के लिए आए, अगर आप चाहती हैं तो आप भी चूमें, हिन्दी फिल्मों की पुरानी नायिका जैसी संकोची ना बनें जो एक आह के साथ परे देखती है।

समय आ गया है कि हम पहला कदम कौन उठाता है कि बारे में अपनी पुरानी अवधारणाओं और ‘यह ऐसा होना चाहिए’ रवैये को छोड़ दें।

वास्तविक रहिए; अगर आपकी इच्छा है, तो उसे बताइये, अगर आपकी इच्छा है, तो उसकी टीशर्ट को खींच दीजिए।

इस राह में ना बैठी रहें कि वह आपका मूड बनाएगा। क्योंकि यह बाहरी नहीं है, यह हमारे भीतर है। अगर हम इसे जीवित नहीं रखना चाहते, तो यह मर जाएगा, और फिर एक दिन भले ही आप कितना भी आगे बढ़ना चाहती हों, आप नहीं कर सकेंगी, क्योंकि आप अंतहीन इंतज़ार में कहीं अपनी ज्वाला खो चुकी होंगी।

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