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जब पत्नी के एक फ़ोन ने मुझे अपनी हरकतों पर शर्मिंदा किया

ऑफिस में आयी वह नई सहकर्मी सुन्दर और स्मार्ट थी. मानो इतना काफी नहीं था, उसे मदद की ज़रुरत थी. इस मौके का कुछ तो फायदा वो उठा ही सकता था.....
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मैं कोलकाता की एक एडवरटाइजिंग (विज्ञापन) कंपनी में कार्यरत था जब मैं उससे पहली बार मिला. उसने भी नयी नयी नौकरी शुरू की थी. वो बहुत आकर्षक थी और मैं उसकी तरफ खींचता चला गया. एक अजीब सी कशिश थी उसके रूप, सुडोल काठी और यौवन में. मैं मन्त्रमुघ्द सा उसे lपाने की ललक में अपनी सुध बुध खोने लगा.

मैं अपने आप को कैसे रोक पाता

मैं एक कॉपीराइटर हूँ और जब उसने अपनी मोहक मुस्कान के साथ मुझे देखा तो मैं खुद को उसे आमंत्रित करने से रोक नहीं पाया. बातों का सिलसिला शुरू हुआ और उसने बताया की वह विज्ञापन की इस दुनिया में नयी है और मेरी सहायता की उम्मीद रखती है. उसकी भीतर तक भेदती वो नशीली आवाज़, उससे भी नशीली वह नज़रे.. मैं उसके मोहजाल में फंसता चला जा रहा था. ऑफिस के बाद जब सभी सहकर्मी घर चले गए, मैंने उसे कैफ़े में एक कप कॉफ़ी का आमंत्रण दे दिया.

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कॉफी पीने तो बैठ गए मगर मैं उसके बारे में जानता ही क्या था. मैंने जब उससे कुछ निजी सवाल पूछे तो वह थोड़ी हड़बड़ा गयी. मगर चाय की चुस्कियों के बीच बीच में मैंने उसके सामने अपनी पूरी ज़िंदगी के पन्ने उलट दिए. मैंने उसे बताया की कैसे हर शाम जब मैं घर जाता हूँ तो मेरी ज़िंदगी बिलकुल थम जाती है. मैंने बताया की कैसे मेरी बीवी हर रोज़ बस टीवी के सामने बैठी होती है और मेरी आने न आने की उसे कोई परवाह भी नहीं होती.

मेरी बीवी मुझे समझती नहीं

बातों का सिलसिला चलता रहा और मैंने उसे बताया की मेरी पत्नी एक गृहणी बन कर ही खुश है और वो बिलकुल महत्वाकांक्षी नहीं है. उसने अपने ख़ास (और प्यारे) अंदाज़ में मुझसे सहानुभूति भी जताई. बातों के इस दौर में मुझे हमदोनो के बीच के शारीरिक आकर्षण की तरंगे महसूस हो रही थी. मुझे पता था की अगर मैं भरपूर कोशिश करूँ तो शायद बात आगे बढ़ पाए. फिर मैंने उसे बताया की किस तरह मुझे कई इनाम और मान्यता मिल चुके हैं और कितने मीडिया कम्पनीज ने मेरी शैली को बहुत सराहा भी है. वो मेरी इन उपलब्धियों के बारे में सुनकर बिलकुल प्रभावित नहीं लगी. सच कहूँ तो मुझे कई बार ऐसा भी लगा कि उसे मुझसे ईर्ष्या हो रही थी.

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बातों बातों में उसने मुझे बताया कि वह बहुत महत्वकांक्षी है और आगे चल कर वह खुद की कंपनी शुरू करना चाहती है. उसने मुझे यह भी बताया की मेरे अंदर आज के कॉर्पोरेट दुनिया में कामयाब होने के सारे गुण थे. मुझमे हॉट और हैंडसम का एक आकर्षक मेल था.

मैं उसके मोहक चेहरे में इतना डूबा था की मुझे वक़्त का पता भी नहीं चला. वो तो अचानक जब उसने कहा की उसे घर जाना होगा वरना उसके माता पिता परेशां हो जायेंगे, मैं भी होश में आया. मैंने उसे उन हसीं पलों के लिए धन्यवाद किया मगर उसके उदासीन और ठन्डे जवाब से मेरा जोश भी हल्का पड़ गया.

और तभी मेरा फ़ोन बजा

उसी समय मेरा फ़ोन बजा. मेरी पत्नी ने फ़ोन किया था. उसने मुझसे पुछा कि मैं कहाँ हूँ और किसके साथ हूँ. क्या उसे कुछ आभास हो गया था? उसने पुछा कि मैं घर कब आऊँगा और यह कि क्या मेरी व्यस्त दिन में मेरे पास कुछ वक़्त होगा उसके साथ बाहर जा कर डिनर करने का. मैं चाह कर भी उसके शब्दों पर ध्यान नहीं दे पा रहा था.उसने और कुछ पल बातें की और हँसते हुए फ़ोन काट दिया.

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उसके कहकहे ने अनायास ही मुझे हमारे शुरुवाती दिनों की याद दिला दी.

मैं अपनी पत्नी से पहली बार तब मिला था जब मुझे मार्केटिंग कि डिग्री भर मिली थी और उसने कॉलेज में दाखिला ही लिया था. तब हम प्रेम में बंधे दो मासूम पंछियों सा घंटो बातें करते थे. जब हम दोनों ने शादी करने की ठानी तो हम दोनों के ही परिवार इस रिश्ते के बिलकुल खिलाफ थे. सबसे लड़ते, संघर्ष करते हमने अपनी शादीशुदा ज़िंदगी शुरू की मगर इस पूरे सफर में कभी हमने अपनी मुस्कराहट को धूमिल नहीं होने दिया.

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वह पहला प्यार

सारी पुरानी यादें सुनामी की तरह मुझे झंझोरने लगी. पिछले इतने सालों में कितनी बार ज़िंदगी के थपेड़े खाये, मुश्किलें आयी, मगर मेरी पत्नी ने एक पल के लिए भी मेरा साथ नहीं छोड़ा. सही मायने में वह हर मोड़ पर मेरी जीवन संगिनी बन कर रही. कुछ दिन जब मेरी नौकरी भी छूट गयी थी और मैं बिलकुल हताश हो गया था, ज़िन्दगी के उन मुश्किल वक़्त में उसने मुझे हिम्मत दी और याद दिलाया की मेरी असली पहचान क्या है. आज मैं अपनी जिस कामयाबी के परचम लहराता हूँ, उसके पीछे मेरी पत्नी का निरंतर विश्वास और बलिदान है. मैं इतने सुकून से बाहर काम करता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ की हमारे घर को सवारने के लिए मेरी पत्नी है. मेरी इस ऊँची उड़ान में मेरे पंखों में जो शक्ति है, वो उसकी ही दी हुई है.

यह सब जब याद आया तो मन खुद को ही धिक्कारने लगा. मैं अपनी सालों की संगिनी को भूल कैसे कुछ घंटे पहले मिली किसी लड़की के प्रति इतना आकर्षित हो सकता हूँ. मैं अपराधबोध से भर गया और मैंने तत्पर कॉफ़ी का बिल भरा और उठ खड़ा हुआ. किसी ने सच ही कहा है की कई बार हम अपने अच्छे वक़्त में अपने बुरे वक़्त के साथियों को बड़ी सफाई से भूल जाते हैं.

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घर पहुँच कर मैंने अपनी पत्नी को सब कुछ बताया की कैसे मैं भावनाओं में बह गया था मगर वक़्त रहते संभल गया. यह सब सुनते ही उसकी आँखों में आंसूं आ गए मगर फिर कुछ देर बाद उसने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा की वह खुश है की मैंने उसे सब सच बता दिया और उसके विश्वास को टूटने नहीं दिया.हमारी शादी को तीस से ज़्यादा साल हो चुके हैं मगर आज भी हम एक नवदम्पति की तरह एक दुसरे को देख मुस्कुराते है, और हमारा प्यार और गहरा और मज़बूत हो गया है.

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