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हमने दस साल, तीन शहर और एक टूटे रिश्ते के बाद एक दुसरे को पाया

दोनों कुछ समय एक साथ बाहरवीं में पढ़ते थे. फिर कई सालों बाद जब मिले तो वो जान पहचान तो बहुत गहरी निकली.
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हम मिले तो थे मगर मिले नहीं थे

जब मैं पहली बार उससे मिली, वो केमिस्ट्री की टूशन क्लास से बाहर निकल रहा था. उसकी कद काठी पतली दुबली थी और अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा घमंडी लगता था. अरे हाँ! उस समय उसकी उम्र करीब सत्रह साल थी. हमारी बारहवीं की परीक्षा में कुल तीन महीने ही बचे थे और उसने मेरा बैच अपने जॉइंट एंट्रेंस एग्जाम के लिए ज्वाइन की थी. मेरा दिल तो पहले ही केमिस्ट्री पर आया हुआ था और मेरी इच्छा थी की मैं किसी बड़े नामचीन इंस्टिट्यूट से इस विषय में आगे की पढ़ाई करूँ।

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मुझे याद नहीं की मैंने कभी उससे क्लास में बात भी की हो. हाँ, ये याद है की वो इस बात से बहुत चिढ़ता था की मैं हमेशा हमारी क्लास टेस्ट में टॉप करती थी. मुझे कोलकाता के एक कॉलेज में एडमिशन लेना था और मुझे केमिस्ट्री होनोर्स के लिएमेरे उस सपने के कॉलेज में सीट भी मिल गई. दूसरी तरफ उसका दाखिला भी वहां के सबसे नामी गिरामी मेडिकल कॉलेज में हो गया. मज़ेदार बात ये थी की हम दोनों के कॉलेज बिलकुल आमने सामने थे. मुझे आज भी याद है की जिस दिन हमने अपने टूशन वाले प्रोफेसर को अलविदा कहा, उस दिन ही हम दोनों ने पहली बार एक दुसरे से बात भी की और एक अच्छे भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी.

हमारे कॉलेज पास थे मगर हम अब भी दूर ही थे

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एक छोटे से शहर से निकल कर एक मेट्रो में आ कर किसी हॉस्टल में रहना एक बहुत बड़ा बदलाव होता है. अचानक ऐसे बहुत से रिश्तेदार हो गए जो कभी नहीं मिलते थे और कई ऐसे दोस्त जो जैसे हमेशा के लिए दूर हो गए. अक्सर मैं सोचती थी की अगर मुझे इन बदलाव से इतनी मुश्किल हो रही है तो वो कैसे सब कुछ संभाल रहा होगा. आप कोई और अंदाज़ा मत लगा लीजियेगा. मैं उसके बारे में सोचती थी क्योंकि अब वो मेरा पडोसी था. मगर क्योंकि हमने कभी बहुत बातें नहीं की थी, हमने अब भी एक दुसरे से बात करने की ज़्यादा कोशिश नहीं की. मगर क्योंकि हम कभी एक दुसरे को अच्छे से जान नहीं पाए थे, हमने मिलने की भी कोशिश नहीं की. फिर मुझे किसी से प्यार हो गया. ग्रेजुएशन पूरी कर के मैं दिल्ली आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए चली गई. इस बीच कभी कभी ये ख्याल ज़रूर आता था की वो टूशन वाला लड़का डॉक्टर बना की नहीं. फिर मैं बैंगलोर शिफ्ट हो गई और वही नौकरी शुरू कर दी. इस बीच मेरा दिल भी टूट गया और मेरे बॉयफ्रेंड से मेरा ब्रेक अप हो गया. उस दौरान मैं MBA के पहले साल में थी. मुझे मेरे कैंपस से ही मिसरे के एक नामी गिरामी बैंक से नौकरी का ऑफर मिल गया. यहाँ स्पष्ट करना चाहूंगी की उस टूशन वाले लड़के से मेरी कोई बातचीत नहीं थी.

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उसने मुझे ऑरकुट पे फिर ढूंढा

यह बात अगस्त २०१० की है. मैंने अपने ऑरकुट के अकाउंट को जब बहुत दिन बाद खोला तो एक बहुत दिनों से पड़ी फ्रेंड रिक्वेस्ट देखि. प्रोफाइल के व्यक्ति की शक्ल जानी पहचानी तो लग रही थी मगर मुझे कुछ ठीक से पहचान में नहीं आ रही थी. बहुत गौर से देखने पर वो टूशन वाला लड़का ही लगा. बिलकुल निश्चित नहीं थी इसलिए पहले मैंने उससे एक स्क्रैप कर के पुछा. उसने मिनट भर में जवाब दे दिया. और बस फिर हमारी बातें शुरू हो गई. हम ऐसे बातें करने लगे मानो हम कितने पुराने बिछड़े मित्र हों. उस रात जब उसने मुझे फ़ोन किया तो हमने करीब दो घंटे बातें की. जल्दी ही मुझे पता चला की मुझे ढूंढ़ने के लिए उसने बहुत मशस्क्त की थी. ऑरकुट से पहले उसने कॉलेज के काफी चक्कर लगाए थे और हमारे एक कॉमन सीनियर से भी उसने मेरा पता लेना चाहा. मगर जब उसे मेरे बॉयफ्रेंड के बारे में पता चला था तो उसने मुझे कांटेक्ट करने की कोशिशें छोड़ दी थी. हम दोनों ही प्यार में धोखा खाये हुए प्रेमी थे मगर सबसे अजीब बात थी हम दोनों के पुराने अफेयर और उनके अंतराल की समानताएं.

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और फिर उसने मुझे प्रोपोज़ किया

धीरे धीरे हम बहुत ही गहरे दोस्त बन गए थे. चाहे कितनी भी देर रात तक नाईट शिफ्ट हो, हमारा दिन एक दुसरे से बात किये बिना ख़त्म ही नहीं होता था. हम दोनों एक ही शहर से थे तो एक दुसरे से वैसे भी बातें तो हमेशा ही होती थी हमारे पास. हम दोनों में सिर्फ शहर ही एक नहीं था, हमारे संस्कार और हमारा बचपन भी लगभग एक सा था. शायद इसलिए हम दोनों का जीवन को देखने का नजरिया भी एक सा ही था. उसे सफर करना बिलकुल भी पसंद नहीं था. मगर फिर भी नवंबर २०१० में वो बैंगलोर के लिए प्लेन में बैठा और फिर चार घंटे के रोड के सफर के बाद मैसूर पंहुचा मुझे सरप्राइज देने. शुरू में तो हम दोनों ही थोड़े अजीब से पेश आ रहे थे एक दुसरे से मगर जल्दी ही दोनों ऐसे सहज हो गए मानो हम तो हमेशा से ही एक दुसरे को जानते थे.

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अगले दिन उसने मुझे प्रोपोज़ कर दिया. उसका वो कदम मेरे लिए बिलकुल अजीब और आचार्यचकित करने वाला नहीं था. ऐसा लगा की इस रिश्ते को तो ऐसे ही आगे बढ़ना था. उन दिनों मेरे मम्मी पापा मेरे पास आये हुए थे. वो हमारे रिश्ते को लेकर इतना विश्वस्त था की उसने मेरे पेरेंट्स से मिलने का भी फैसला किया.

मुझे आज भी समझ नहीं आता की कैसे उसने एक महीने में हमारी शादी के लिए सब कुछ कर लिया. उसके माता पिता ने पहले मुझसे बात की और फिर मेरे अभिवावकों से. जल्द ही दोनों के पेरेंट्स मिले और अप्रैल २०११ में हमारी गई. उसके अगले महीने, यानी जून में, हम दोनों हमारे शहर में परिवारों और दोस्तों के बीच शादी के बंधन में बंध गए. उसने मैसूर में ही एक असाइनमेंट ले लिया क्योंकि मेरे लिए कोलकाता ट्रांसफर लेना मुश्किल हो रहा था.

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मुझे कई समझौते करने थे मगर हर कदम वो साथ था

मेरा एक छोटा सा नुक्लेअर परिवार था और मेरे लिए उसके संयुक्त परिवार में रहना बहुत मुश्किल हो रहा था. यूँ तो मुझे वहां कुछ ही हफ्ते रहना था, मगर मेरे लिए वह एडजस्ट करना जटिल कार्य था. उसने मेरी हर कदम पर मदद की ताकि मुझे इस नए परिवार में सम्मलित होने में कम से कम मुश्किल आये. शादी के पांच महीने होते होते मेरी मम्मी का किसी अनजान बीमारी से देहांत हो गया. उन सबसे मुश्किल पलों में उसने मुझे किसी चट्टान की तरह सहारा दिया. हमारी सगाई वाली सुबह उसने मुझे कहा था की जब हमने पहली बार बात की थी, उसे मुझसे तभी से ही प्यार हो गया था. सच कहूँ तो कहीं मेरा अंतर्मन भी इस बात को जानता था मगर मैंने इतने सालों इस बात से मुकरने में बिता दिए. मुझे तीन शहर, एक टूटा रिश्ता और दस से भी अधिक वर्ष लगे खुद को ये बोलने में की हम दोनों एक दुसरे के लिए ही बने हैं.
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