धार्मिक विभिन्नता = एक विवाह

Couple during marriage

दो धर्म और एक विवाह ।

समाज में जो बदलाव की लहर चली हुई है उसके चलते सब कुछ बदल रहा है और बदलना भी चाहिए। क्योंकि “परिवर्तन ही संसार का नियम है” और सांसारिक परिवर्तनों के अनुसार स्वयं में बदलाव लाना मनुष्य की जरूरत है। अब कौन सा परिवर्तन अच्छा है और कौन सा बुरा, वह हम उसका अंतिम परिणाम देखे बिना नहीं बता सकते हैं। परंतु बहुत बार वह अंतिम परिणाम क्या होगा, इस बात पर काफी हद तक निर्भर करता है कि आप किसी भी बदलाव को कितनी सहर्षता से स्वीकार करते हैं। यहां हम बात करेंगे ‘प्रेम विवाह’ की जोकि समाज में हुए बदलाव का ही बहुत बड़ा उदाहरण है जिसे स्वीकारनेें में हमारे समाज को बहुत समय लगा है और अभी भी भारत के कई पिछड़ेे इलाकों में यह संघर्ष जारी है और पता नहीं कब तक चलता रहेगा। जैसेे-जैसे समाज में प्रेम विवाह को स्वीकृति मिलती जा रही, वैसे-वैसे एक महत्वपूर्ण बात जोड़ों के समक्ष आ रही है।

वह हैै धार्मिक विभिन्नता…
दोनों के धर्मों का अलग होना ।
दोनों की मान्यताओं का भिन्न होना ।
धार्मिक रुझानों का अलग होना।

यह ही वह महत्वपूर्ण कारण है, जिसकी वजह से हमारे समाज को प्रेम विवाह को अपनाने में इतना समय लगा और अभी भी हम संघर्षरत हैं, इसको पूर्ण रूप से मान्यता दिलाने में।

अब जैसे-जैसे जन-जीवन सार्वभौमिक(globalise) होता जा रहा है लोग परंपरागत तरीकों से विवाह की धारणाओं से आगे बढ़ कर सोचने लगे हैं। वह एक ही जाति, संप्रदाय, मजहब में ही विवाह करने को अस्वीकार करते हैं और अपने पसंद व मन अनुसार विवाह को मान्यता देते हैं कहने को तो कहा जाता है की…

“जहां प्यार होता है वहां कोई भी मतभेद या भेदभाव के लिए जगह नहीं होती लेकिन यह पूर्णतय सत्य नहीं है क्योंकि प्रेम की भी अपनी एक क्षमता होती है और वह भी सभी कार्यों में निपुण नहीं होता है।”

धार्मिक विभिन्नता उन्हीं मे से एक है जो की जोड़ों के आपसी संबंध पर असर डालता है। एक दृढ़, यहां तक कि एक सीमित धार्मिक आस्था भी बहुत सारी गतिविधियों पर प्रभाव डालती है जो पति-पत्नी साथ में करते हैं।

धर्म.. सिर्फ मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे जानेे या नहीं जाने से संबंधित नहीं होता है। जब आप साथ में होते हैं तो यह जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर अलग- अलग तरह से प्रभाव डालता है। आप अपना समय साथ में किस तरह से बिताएंगे, बच्चोंं की परवरिश किस प्रकार सेे की जाएगी, आपके दोस्त किस तरह से चुने जाएंगे, आपका व्यवसाय या फिर साथ में काम करने वाले लोग किस प्रकार के होंगे, पैसा कहां खर्च होगा और कहां नहीं इत्यादि…। यहां सोचने वाली बात यह है कि व्यक्ति जिस परिवेश में रहा है, वह उसकी छवि में आ जाता है और उसमें पूर्ण रूप से बदलाव लाना एक असंभव कार्य होता है।

ये भी पढ़े: भारत में लिव-इन संबंध में रहने की चुनौतियां

लेकिन इन सबका आपके संबंध पर कोई बुरा प्रभाव नहीं होना चाहिए जिसके लिए हमें कुछ नियम बनाने पड़ सकते हैं या कह सकते हैं कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

१. सब कुछ सम्मान पर निर्भर करता है

Married couple's hand
धार्मिक विभिन्नता

जब आपके धर्म या धार्मिक रुझान भिन्न होते हैं तो सबसे महत्वपूर्ण पहलू इस तरह के संबंधों में जो होता है वह है सम्मान आप बातों पर सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन आप यह सोचो कि…आप एक दूसरे की सोच का, विचारों का अनादर करें और चीजें फिर भी कार्य करती रहें, तो ये संंभव नहीं है। आप अपने धार्मिक भिन्नताओं को ध्यान में रखते हुए एक-दूसरे के धर्मों का आदर करतेे हुए उसकेेे बारे में खुलकर बात करें और समझनेे का प्रयास करें निरंतर जब तक आप उस संबंध में हैं क्योंकि यह कोई एक दिन का कार्य नहीं है। यह जीवन का एक हिस्सा है, तो इसको एक हिस्से के रूप में अपना कर, उस पर जब भी आवश्यकता हो कार्य करें व विचारों का आदान-प्रदान करें। ऐसा नहीं है यह धर्म अलग होने पर ही होता है, यह कार्य तब भी करना पड़ता है। जब दोनों में से एक आस्तिक व एक नास्तिक हो। अगर आप एक – दूसरे की आस्था का सम्मान नहीं करेंगे तो वह अनिवार्य रूप से आपके रिश्ते में समस्या उत्पन्न करेगा।

विशेष रूप से नितांत अध्यात्मिक लोगों की स्थिति में, वह लोग अपने धर्म को अपनी पहचान का एक हिस्सा मानते हैं।

“धर्म संरेखित ना सही परमार्थ तो संरेखित हो सकता है।”

ये भी पढ़े:एक छोटा सा पेड और उसके नीचे वो झुर्रियों वाली प्रेम कहानी

 २. धार्मिक आस्था का हिस्सा बनना

एक मजबूत रिश्ता और परिवार बनने के लिए यह आवश्यक है कि आप
एक-दूसरे के धार्मिक कार्यो में भाग ले। ये आप के रिश्ते व परिवार दोनों के हित में होगा। यह कार्य आप अच्छे प्रेेेषक(observer) के रूप में कर सकते हैं। एक-दूसरे को समझने का सबसे अहम चरण, एक-दूसरे का सहयोग करना और भिन्नताओं में बराबर व पूर्ण रूप से भाग लेना ही होता है। आप हर बार अपनी चीजें महत्वपूर्ण बोल कर उन्ही को करने के लिए सामने वाले पर दवाब नहीं डाल सकते।

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

३. संतुलन खोजने का प्रयत्न करें

एक छत के तले दो धार्मिक मान्यताओं में संतुलन बनाना थोड़ा चुनौतीपूर्ण तो है लेकिन यदि यह बात आप दोनों को प्रारंभ से ही पता है कि संतुलन बिठाना पड़ेगा, तो इतना कठीन भी नहीं होगा। उन चीज़ों पर कार्य करे जो नियंत्रण में हैं और उन को समझने का प्रयत्न करे जो नियंत्रण से बाहर हैं। धार्मिक संतुलन आवश्यक है क्योंकि तभी आप एक दूसरे को सही मायनों में धार्मिक स्वतंत्रता दे पाएंगे। तो इस संतुलन को बैठाने के लिए सदैव तत्पर रहें।

ये भी पढ़े: विश्वास करिये, भारत में ये तलाक़ के कारण हैं

समझने की बात ये है कि पृष्ठभूमि या आधार अलग अलग क्यों ना हों यदि मिल कर कुछ करने की ठान ली जाए तो उस कार्य या रिश्ते को संभव बनने से कोई भी नहीं रोक सकता, बस निस्वार्थ प्रयास ज़रूरी हैं।

कुछ रिश्तों का जायका ही, वैचारिक मतभदों से होता है।

https://www.bonobology.com/%e0%a4%b5%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%ad%e0%a4%bf%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%8f%e0%a4%95-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5/

पति, पत्नी और राजनीति: राजनीतिक विचारों में अंतर को संभालें

Spread the love

This website uses cookies to ensure you get the best experience on our website.