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दो पुरुषों के बीच उसे एक को चुनना था

उसके माँ बाप उसकी शादी नहीं करा पा रहे थे तो इसका बीड़ा उसने खुद ही उठा लिया. नतीज़न उसने दो लड़कों के सामने शादी का प्रस्ताव रखा और दोनों ही मान गए. अब चुनना उसे था...
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छोटी थी तो कहीं सुना था, “शादी एक ज़रूरी अभिशाप है”. उस समय तो यह बात समझ में नहीं आयी, मगर ज़िन्दगी ने धीरे धीरे सारे पाठ पढ़ा दिए.

मुझे हमेशा लगता था की मैं एक अच्छी बेटी हूँ, आज्ञाकारी और सुशील. मगर फिर धीरे धीरे समझ आने लगी और मुझे गलतियां दिखने लगी समाज में, हमारे धर्म में और अपने माँ बाप में भी. यहाँ मैं एक बात कहना चाहूंगी. दुनिया के सभी माँ बाप अपने बच्चों के लिए सब कुछ अच्छा करना चाहते हैं मगर सामाजिक और धार्मिक दायरों को लांघना उनके भी बस की बात नहीं.

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घर में एक दिन सन्नाटा छा गया जब एक दिन मेरे भाई ने कहा की उसे एक मनोचिकित्सक के पास जाना होगा क्योंकि उसे अपने दिमाग में आवाज़ें सुनाई देती है. मैं जल्दीही जान गईथी की मुझे अपना निर्वाह खुद ही करना होगा जब १७ रिश्ते जो मेरे लिए आये थे, बिना रिश्ता पक्का किये चले गए. सब की एक ही डिमांड थी– क्योंकि बेटे को स्किज़ोफ्रेनिआ है, उन्हें मेरी शादी के लिए भीज़्यादा दहेज़ चाहिए था. मैं दहेज़ के सख्त खिलाफ थी और किसी भी कीमत पर में अपनी शादी में किसी को भी दहेज़ देने नहीं दे सकती थी.

कई सालों बाद अब मुझे लगता है की अगर मेरी शादी उन सत्रह लड़कों में से किसी से हो भी जाती, तो जल्दी ही टूट भी जाती, मैं शायद ऐसे पति के साथ ज़्यादा दिन झेल नहीं पाती.

आठ साल के आधे अधूरे प्यार और सेक्स संबंधों के बाद मैं बैंगलोर शिफ्ट हो गई. अकेले रहती थी मगर फिर भी मुझमे वो चमक बिलकुल भी धूमिल नहीं हुई थी, रोज़ खूबसूरत सिल्क की साड़ीपहने मैं कंप्यूटर पढ़ाने जाती थी. १९८९ के उस साल मैं DOS वर्ड जैसे विषय पढ़ाती थी. यह बात और है की आज के आईटी जगत से ये सारे शब्द अब लुप्त हो गए हैं.

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उसका नृत्य अद्भुत था

उन्नी से मैं एक पार्टी में मिली थी एक लड़कों के बैचलर फ्लैट में. बैंगलोर हमेशा से एक बहुत ही मस्ती भरा शहर रहा है जहाँ युवा बियर, गांजा और डांस में अपने वीकेंड बिताते थे. जब मैंने और उन्नी ने एक साथ डांस करना शुरू किया, धीरे धीरे सभी लोगो ने पूरा फ्लोर हमारे लिए खाली छोड़ दिया. हम दोनों का डांस बिलकुल “मैजिकल” था, हमारे लिए और उनके लिए भी जो हमें देख रहे थे. उन्नी नसीरुद्दीन शाह का और भी बेहतर रूप था.

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उसी दौरान मेरे पिताजी ने मुझे एक चिट्टी लिखी जिसमे उन्होंने कहा की मैं अब अपनी पसंद के लड़के को अपना जीवनसाथी चुन्नने के लिए आज़ाद हूँ. मन ही मन सोचा की यही बात उन्हें तब कहनी थी जब मैं सोलह साल की थी. खैर देर आये दुरुस्त आये. तो मैंने अपने प्रिय दोस्त अशोकन को मेल लिखा. अशोकन मेरे साथ पुणे में कॉलेज के दिनों में था, बहुत ही प्यारा लड़का था वो और उस समय मुझसे शादी करने को इक्षुक भी था. उसका कोई जवाब नहीं आया.

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इसी बीच मेरे और उन्नी के सम्बन्ध बेहतर होने लगे और मैं उसके साथ लिव इन रहने लगी. सन्न १९८९ में यूँ तो बैंगलोर एक बहुत ही रूढ़िवादी शहर था, मुझे बहुत ही अच्छे पडोसी मिल गए थे जो मुझे अपनी बेटी मानते थे.

एक शाम मैं और उन्नी बैठे बियर पी रहे थे. उन्नी काफी शांत लग रहा था. मैंने पुछा की क्या कोई बात उसे परेशां कर रही थी.

“मेरी शादी नहीं हो पायेगी”

उन्नी के छोटे भाई की शादी तय हो चुकी थी. उन्नी को डर था की उसकी शादी कभी नहीं हो पायेगी. जब मैंने कारण पुछा तो उसने कहा की उसके पिता ने करीब पंद्रह साल पहले ख़ुदकुशी कर ली थी, और यह बात… “मगर तुम्हारा परिवार एक जाना माना राजनैतिक परिवार है और अगर तुम्हारे बड़े और छोटे सभी भाई बहन की शादियों में कोई अड़चन नहीं आ रही तो तुम्हारी शादी में मुश्किल क्यों आएगी?” मैं उससे पूछे बिना नहीं रह पायी. “मुझे एक सिविल शादी चाहिए, जिसमे न रुपयों का लेनदेन हो न सोने जवाहरात का,” उसने कहा. मैं उसका डर समझ रही थी. एक केरल नायर समुदाय में ऐसी शादी नामुमकीन थी.

“कोई बात नहीं. तुम मुझसे शादी लो,” मैंने हँसते हुए कहा.

उन्नी काफी अंतर्मुखी था तो इस बात के जवाब में चुप ही रहा.

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मगर ज़िन्दगी ने यहाँ से मेरी राह में नए नए मोड़ लाने शुरू कर दिए.

और उसने हाँ कर दिया

अशोकन की गिनती भी शर्मीले लड़कों सकती है, तभी तो उसने तीन महीने लगा दिए मेरे विवाह प्रस्ताव का जवाब देने में. ये बात और है की जवाब “हाँ” ही था. उसने इस काम के लिए हम दोनों के कॉमन मित्र रतन को चुना जिसने उसकी तरफ से मुझसे बात की और फिर शादी की तैयारी शुरू हो गयी.

इन सब से सबसे पहले ही मैंने उन्नी के सामने शादी का प्रस्ताव रख दिया था. मेरे अंदर की स्त्री अब माँ बनने को बहुत ही व्याकुल हो रही थी. मैं अब तक २९ वर्ष की हो चुकी थी और मैंने हर तरीके से उन्नी को शादी के लिए हाँ करवाने की कोशिश करि, मगर वो चुप रहा.

तो अंततः मैंने अशोकन से शादी का फैसला कर लिया. मेरे पिता बैंगलोर आये और अशोकन से मिले. शादी १५ फरवरी १९९० को होने वाली थी. १४ तारीख को हम हिन्दू समाज के तरीके से शादी करते और फिर केरला जा कर गिरिजाघर में शादी करते. हमारे गिरिजाघर के पंडित ने रजामंदी दे दी क्योंकि लड़का ब्राह्मण था.

शादी के कुछ दिन पहले अशोकन के घर कुछ हिन्दू रीती रिवाज़ होने थे. मैं पूना जाने के लिए तैयार थी, मुझे अलविदा कहने उन्नी भी आया. हमने बैंगलोर स्टेशन पर कुछ कश लिए और तभी अचानक उन्नी ने पुछा की क्या मैं गर्भवती हूँ. मेरा मासिक धर्म हमेशा ही अनियमित था और मैंने कभी इस बारे में ध्यान ही नहीं दिया था. मुझे खुद उसके इस सवाल का जवाब नहीं पता था. उस ज़माने में कोई घर बैठे टेस्ट भी नहीं थे प्रेगनेंसी के बारे में जानने के. तब तक पुणे स्टेशन पर ट्रैन भी आ गई थी.

फिर फोन बजा

जब अशोक के माता पिता के घर पहुंची तो वहां शादी की तैयारियां ज़ोर शोर से चल रही थी. उसकी माँ ने मुझे अपनी खानदानी साड़ियां और गहने दिखाए और कहा की मुझे तेलगु सीखनी होगी और अशोक की पसंदीदा तेलगु रेसिपी भी.

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और तभी फ़ोन की घंटी बजी.

रात के ग्यारह बज रहे थे और बैंगलोर से एक ट्रंक कॉल थी. उस ज़माने में मोबाइल नहीं होते थे और हम ट्रंक कॉल और एसटीडी पर बातें किया करते थे. फ़ोन उन्नी का था और उसकी आवाज़ में बहुत दर्द था.

उसने मुझे कहा की वो मेरे बगैर ज़िंदा नहीं रह पायेगा और खुद को ख़त्म कर लेगा. ख़ासकर अब जब शायद मैं माँ बन रही थी. मैंने उसे समझाया की ऐसी सूरत में उसके “बच्चे” की पूरी देखभाल की जाएगी. “क्या तुम उसे जन्म नहीं दोगी ?” उसने मुझसे पुछा.

“बिलकुल दूँगी. अगर ऐसे हालत हुए तो अशोक ख़ुशी ख़ुशी मेरे बच्चे को अपना लेगा,” मैंने उसे समझाया.

उन्नी ने फिर से दोहराया की वो खुद को ख़त्म कर देगा.

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मैंने फैसला ले लिया

मेरे पास निर्णय लेने के लिए बहुत ज़्यादा वक़्त नहीं था. मैं अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी किसी और के ख़ुदकुशी की धमकियों के बीच कैसे शुरू करती.

“ऐनी, वो ज़िन्दगी के हर मोड़ पर तुम्हे ये धमकी देता रहेगा.तुम जल्दबाज़ी में कोई फैसला मत लो,” अशोकन ने मुझे बहुत समझाया. मगर मैंने जल्दबाज़ी में ही फैसला लिया. अगर मैं सच में गर्भवती थी तो मेरा अशोकन से शादी करना दोनों पुरुषों के साथ अन्याय होता।

खैर, उस लम्बी दुविधा को दो शब्दों में कहूँ तो अशोकन मेरे लिए प्लेन के टिकट ले आया और मुझे खुद ही एयरपोर्ट तक छोड़ने गया. वो मुझसे दुखी और हताश था, उसके और मेरे परिवारवालों की मनोदशा भी कुछ ऐसी ही थी.

खैर उन्नी और मेरी शादी पांच साल तक टिकी। खैर वो एक दूसरी कहानी है.

तलाक लेते समय मुझे अहसास हुआ कि मैं उसे वापस पाना चाहती थी

यह जानकर मैं निराश हो गई की मेरे पति का कोई विवाहेतर संबंध नहीं था

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