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दुर्योधन की बेटी होकर भी इस राजकुमारी का जीवन दुखमय रहा

वो एक राजकुमारी थी, सबकी लाड़ली थी. बचपन से ही उसका एक सखा था और उन दोनों का विवाह तक़रीबन निश्चित ही था. मगर फिर...
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हस्तिनापुर की राजकुमारी, लक्ष्मणा अपने जन्म से ही सबकी चहेती थी. लक्ष्मणा और उसके जुड़वाँ भाई लक्ष्मण की ज़िन्दगी परिकथा जैसी ही थी मगर कहते हैं न की कुछ परीकथाएं हमेशा के लिए नहीं होती हैं.

लक्ष्मणा अपने पिता दुर्योधन की आँखों का तारा थी. मगर उसके पिता ने अपने अतीत में कई ऐसे कर्म किये थे जिसका असर कई सालो बाद उसके जीवन में भी आने लगा. लक्ष्मणा हालाँकि इन सब बातों से अनभिझ थी. उसे नहीं पता था की उसके पिता ने ही छलसे अपने भाइयों की सारी सम्पति और राजपाट हड़प लिया था, उनकी मृत्यु की साजिश की थी और जब वो विफल हो गई तो उसने जुआ खेलकर उनकी पत्नी द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया और फिर उन्हें १४ साल के वनवास को भेज दिया.

उसके पिता बुरे इंसान है, ऐसी खुसुर पुसुर तो अक्सर महल में होती थी मगर लक्ष्मणा की माँ भानुमति कभी इन बातों को अपने बच्चों के कानों तक नहीं आने देती थी. उसका पति एक बुरा इंसान हो सकता था मगर वो एक अच्छा पति और सर्वश्रेष्ठ पिता था. और भानुमति के लिए इससे बड़ा और महत्वपूर्ण सत्य और कोई नहीं था.

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लक्ष्मणा की परवरिश किसी राजकुमार से कम नहीं हुई थी. वो अपने जुड़वाँ भाई की तरह ही बेहतरीन घुड़सवारी करती, तीर कमान चलाती और गदा से बखूबी युद्ध करने में भी सक्षम थी. लक्ष्मणा की इन विशेषताओं के कारण अधिकांश राजसी परिवार उसे अपने परिवार में जोड़ना चाहते थे.

और उसकी सुंदरता की जितनी तारीफ़ की जाए, वो कम ही होता.

दुर्योधन ने फैसला किया की उसकी गुणवती और रूपवती पुत्री अपने जीवनसाथी का चुनाव खुद ही करेगी. सभी महान राजा, महाराजा, और राजकुमारों को हस्तिनापुर आने का निमंत्रण भी गया. तय हुआ की उनमे से लक्ष्मणा अपने लिए उपयुक्त वर ढूंढेगी.

क्या लक्ष्मणा इस स्वम्वर से खुश थी? शायद हाँ. क्योंकि उसे पहले से ही ज्ञात था की वो अपने लिए किये चुनने वाली है. उसकी पसंद थी अंगा का राजकुमार वृषसेना. वृषसेना उसके पिता के प्रिय मित्र कर्ण का पुत्र था और अपने पिता जितना ही शक्तिशाली और महान योद्धा. वो दोनों बचपन से ही एक दुसरे से प्रेम करते थे. उसने मन ही मन पता नहीं कितनी बार वृषसेना के गले में वरमाला डालते खुद को देख लिया था.

मगर लक्ष्मणा नहीं जानती थी की वो कल्पना जैसा कुछ नहीं हकीकत नहीं होने वाला था.

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एक हादसा

और तभी आया साम्बा, धरती का सबसे खूबसूरत राजकुमार.

साम्बा कृष्ण का पुत्र था और लक्ष्मणा के रूप से बहुत लुभान्वित था. उसने लक्ष्मणा को रथ पर बिठाया और उसके मित्रों ने मिल कर हस्तिनापुर के सिपाहियों को रथ से दूर रखा.

जब तक की दुर्योधन को कुछ समझ आता, साम्बा लक्ष्मणा को लेकर अपनी माँ के पास द्वारका पहुंच गया था. साम्बा की माँ जाम्बवती ने राजकुमारी को गले लगाया और उसे अपने साथ ले गई. दूसरी तरफ द्वारका के बाहर कृष्णा और बलरा कौरवों से एक भीषण युद्ध कर रहे थे. इसी तरह पूरी रात बीत गई.

और जब एक पूरी रात लक्ष्मणा किसी और पुरुष के घर पर रह चुकी थी, तो समाज में कोई भी उससे विवाह नहीं कर सकता था. अब जिसने उसे अगवाह किया था, उसे ही लक्ष्मणा से विवाह करना होगा.

तो क्या हुआ अगर वो हस्तिनापुर की राजकुमारी थी. तो क्या हुआ अगर वो दुर्योधन की बेटी थी.

दुर्योधन ने सबसे विनती की मगर कुरु गृह के सभी बुज़ुर्गों ने उसकी एक न सुनी. लक्ष्मण और उसके पिता अपनी लाचारी से आगबबूला हो रहे थे मगर कर्ण और वृषणसेना ने भी कुछ नहीं कहा.

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एक ज़बरदस्ती किया गया विवाह

आखिरकार साम्बा और लक्षमणा का विवाह हो ही गया.

लक्ष्मणा फिर भी एक तेजस्विनी स्त्री थी. मगर फिर कुरुक्षेत्र का युद्द शुरू हो गया और फिर से उसका संसार उथल पुथल हो गया.

लक्ष्मणा का जुड़वाँ भाई लक्ष्मण युद्ध में मारा गया. कर्णपुत्र वृषसेना भी युद्ध के आखिरी दिनों में वीरगति को प्राप्त हो गया. लक्ष्मणा के सभी चाचाओं की युद्ध में मृत्यु हो गई. यहाँ तक की उसके पिता की भी मृत्यु हो गई.

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और उसकी माँ, उसकी प्यारी माँ जो कभी काशी का गौरव थी, उसने पांडवों पर निर्भर रहने से बेहतर अपने प्रेम की अग्नि में आहुति दे दी.

लष्मणना की सास एक सीधी साधी महिला थी और उन्होंने अपनी पुत्रवधु को बहुत हिफाज़त से रखा होगा. कृष्ण भी उसके प्रति उदार ही थे.

मगर कई वर्षों बाद यादवों का युद्ध हुआ जिसमे उसके पति की मृत्यु हो गई.

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उसके लिए सब कुछ एक बार फिर बिखर गया जब उसके ससुर की मृत्यु हुई और लक्ष्मणा की सास भी उनके साथ ही चली गई. लक्ष्मणा तब ज़रूर ही हस्तिनापुर चली गई होगी.

उसके चाचाओं ने उसकी खूब खातिरदारी भी की होगी मगर वो वही तो थे जिन्होंने उसे परिवार और उसके प्यार को मारा था.

लक्ष्मणा के लिए क्या सचमुच कहीं कोई घर बचा था…

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