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जब एक गृहणी निकली प्यार की तलाश में

उसे किसी की तो तलाश थी मगर एक अफेयर और एक नाजायज़ बच्चे के बाद जब वह उस २५ वर्षीय युवक से मिली, तो क्या सच में उसकी तलाश पूरी हो गयी?
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वह बंगाली थी और उसका परिवार हर तरह से एक भद्र परिवार की श्रेणी में आता था. आम शब्दों में कहा जाये तो एक ऐसा परिवार जिसमे सब सुशील, सभ्य, और आदतों में थोड़े राजसी थे. असल में किसी बंगाली के लिए “भद्र” की परिभाषा कुछ ऐसी ही है. चलिए, तो हम उसे स्वाति बुलाते हैं. स्वाति की शादी एक उम्दा परिवार के एक बड़े ही कामयाब लड़के से हुई थी. उसे हम स्वाति का देब कहते हैं. तो देब एक बहुत ही नामचीन कंपनी में सी एफ ओ के पद पर था. अच्छी खासी तनखाह और बैंगलोर में उनका एक आलिशान बांग्ला– यह थी स्वाति और देब की ज़िन्दगी. स्वाति जहाँ प्रेम और रोमांस की मल्लिका थी, देब एक मनचला भौरां था. शादी के पहले ही दिन अपनी नयी नवेली दुल्हन के साथ एकांत में समय न बिता कर देब ने अपने बचपन के लंगोटिए यार को भी आमंत्रित कर लिया. स्वाति अपने पति के इस व्यवहार से बुरी तरह हिल गई मगर उसने कुछ कहा नहीं. बस फिर क्या था, देब ने उसकी चुप्पी को सहमति मान लिया और अपनी ज़िन्दगी शादी के बाद भी शराब, पार्टियों और अपनी महिला दोस्तों के साथ ही बीतता रहा. दोनों के बीच के शारीरिक सम्बन्ध यूं तो ठीक थे, मगर स्वाति अक्सर कहती थी, “मेरी रूह प्यासी रह गई.”

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