जब एक गृहणी निकली प्यार की तलाश में

वह बंगाली थी और उसका परिवार हर तरह से एक भद्र परिवार की श्रेणी में आता था. आम शब्दों में कहा जाये तो एक ऐसा परिवार जिसमे सब सुशील, सभ्य, और आदतों में थोड़े राजसी थे. असल में किसी बंगाली के लिए “भद्र” की परिभाषा कुछ ऐसी ही है. चलिए, तो हम उसे स्वाति बुलाते हैं. स्वाति की शादी एक उम्दा परिवार के एक बड़े ही कामयाब लड़के से हुई थी. उसे हम स्वाति का देब कहते हैं. तो देब एक बहुत ही नामचीन कंपनी में सी एफ ओ के पद पर था. अच्छी खासी तनखाह और बैंगलोर में उनका एक आलिशान बांग्ला– यह थी स्वाति और देब की ज़िन्दगी. स्वाति जहाँ प्रेम और रोमांस की मल्लिका थी, देब एक मनचला भौरां था. शादी के पहले ही दिन अपनी नयी नवेली दुल्हन के साथ एकांत में समय न बिता कर देब ने अपने बचपन के लंगोटिए यार को भी आमंत्रित कर लिया. स्वाति अपने पति के इस व्यवहार से बुरी तरह हिल गई मगर उसने कुछ कहा नहीं. बस फिर क्या था, देब ने उसकी चुप्पी को सहमति मान लिया और अपनी ज़िन्दगी शादी के बाद भी शराब, पार्टियों और अपनी महिला दोस्तों के साथ ही बीतता रहा. दोनों के बीच के शारीरिक सम्बन्ध यूं तो ठीक थे, मगर स्वाति अक्सर कहती थी, “मेरी रूह प्यासी रह गई.”

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एक सुरीला अफेयर

बंगाली स्त्रियों की एक ख़ास बात होती है– संगीत के प्रति उनका अटूट प्रेम. तो जब स्वाति अपने पति की विदेश यात्राओं के लम्बे अंतराल में उस विशाल बंगले में अकेली होने लगी, तो उसने भी संगीत का अपनी सहेली बना लिया. आश्चर्य की बात तो यह है की रबिन्द्र संगीत गुनगुनाने के लिए उसे एक बहुत ही निराला साथी मिला. साथी था उसकी कार का ड्राइवर जो उसे शहर के तमाम देखी अनदेखी राहें दिखता था. और संगीत साधना में लीन उसने स्वाति को सरगम की एक नयी राह ही दिखा दी. रविंद्र संगीत के सुर साधते कब उसने प्रेम के चरम को छुआ, उसे खुद भी पता नहीं चला.

एक सुरीला अफेयर
एक सुरीला अफेयर

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देब जब अपनी विदेश यात्रा से वापस आया तब तक स्वाति के गर्भ को डेढ़ महीने बीत चुके थे. स्वाति ने देब को सब कुछ सच सच बता दिया और इससे पहले की देब कुछ कहता या करता, ड्राइवर अपनी जान की सलामती के लिए वहां से कही चला गया. देब बाबू यूँ तो बहुत आहात थे मगर उन्होंने खुद शादी के कौन से वचन निभाए थे जो ज़्यादा कुछ कहते या सुनते. हाँ उन्होंने उस गर्भ को गिराने से साफ़ इंकार कर दिया और जब वह नन्ही सी जान दुनिया में आयी, तो देब उसे प्यार करने से खुद को रोक ही नहीं पाया. धीरे धीरे कुछ महीने बीतते स्वाति और देब को दिखने लगा कि उनकी संतान आंशिक ऑटिस्टिक है. ज़िन्दगी चलती रही और सात साल एक व्यभिचारी और अय्याश पति और एक ऑटिस्टिक बेटे के साथ रहने के बाद अंततः स्वाती को जीने का एक नया प्लेटफार्म दिखा. वह प्लेटफार्म था सोशल मीडिया और स्वाति ने जीवन का एक नया पन्ना खोला ऑरकुट पर. ऑरकुट पर वो मिले, कुछ औपचारिक बातें की, झूठों का ताना बाना बना और अपने सही मोबाइल नंबर भी दे डाले.

फिर क्या था. स्वाति उसे चर्चित फिल्म “परिणीता” के गाने का बंगाली रूपान्तर बताती और दोनों घंटो फ़ोन पर ही सुर ताल मिलाते.

स्वाति को उसमे सब अच्छा लगता– उसकी कद काठी, सुन्दर चेहरा, उससे भी सुन्दर आवाज़, और एक दमक जिसमे प्यार बेशुमार दिखता.

दूसरी तरफ हुसैन को स्वाति में फ्री सेक्स दिखा और हाँ, स्वाति में उसकी मिस रूबी की झलक भी थी. मिस रूबी क्लास छह में उसकी अध्यापिका थी और उसका पहला एक तरफ़ा प्यार भी.

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जब देब ने फ़ोन किया

उन्हें जिस दम्पति के साथ जाना था, उन्होंने बिलकुल जाने के टाइम अपना प्लान रद्द कर दिया, स्वाति और देब, जो बस से जाने वाले थे, अब कार से जाने लगे. हुसैन ने कार ऊटी तक खुद ही चलाई. दोनों कहीं कुछ आतंरिक, निजी पल बिताने के लिए जगह ढूंढ ही रहे थे कि स्वाति के घर से फ़ोन आने लगे. दोस्त, घरवाले सब एक एक कर फ़ोन करने लगे. देब तो बिलकुल ही आपे से बाहर हो गया था. आखिर स्वाति इस तरह अपने बच्चे को पड़ोसियों के पास छोड़ कर कैसे जा सकती थी. उसने फ़ोन किया और हुसैन से बात की. देब ने बहुत गुहार की कि हुसेन उसकी गृहस्ती न तोड़े और स्वाति को वापस ले आये. हुसैन खुद बिलकुल अचंभित था. उसे तो पता भी नहीं था की स्वाति शादीशुदा है और एक बच्चे की माँ भी है. वो तुरंत वापस बंगलोर आ गए और देब बाबू ने हुसैन को बहुत धन्यवाद किया.

मैंने एक नयी कार ली थी — एक हुंडई गेट्ज़. इतनी सुन्दर गाडी ली थी तो एक जश्न तो बनता ही था. तो आनन फानन अपने कुछ दोस्तों को मैंने आमंत्रण दे दिया. हुसैन को भी बुलाया तो उसने पुछा की क्या वह अपने किसी मित्र को ला सकता है. मुझे क्या आपत्ति होती? मैंने भी हाँ कर दिया. मेरा और हुसैन का रिश्ता थोड़ा सा पेचीदा है. मैं उसकी ४६ वर्षीया प्रेमिका हूँ और दो युवा बच्चों की माँ भी. हुसैन, मेरा ३४ वर्षीया प्रेमी, उन दोनों बेटों का सरोगेट पिता है. हमारे रिश्ते की यह सच्चाई सब जानते थे, लगभग सब, सिवाय स्वाति के. तो उस रात जब सारे मित्र हंसी ठिठोली कर रहे थे, स्वाति को कुछ शक हुआ. उसने वहां आये मेरे कुछ बंगाली मित्रों से मेरे और हुसैन के बारे में पुछा. संयोग से उस दिन मेरे सारे मेहमान बंगाली ही थे. तो मेरी मित्र काकोली ने बहुत इत्मीनान और प्यार से स्वाति को हमारे १० साल के रिश्ते का सच बताया. उसने स्वाति को बताया की जिस हुसैन को वह २५ साल का समझ रही थी, वह असल में ३५ साल का है.

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जब झूठ का कोहरा उठा

स्वाति की ज़िन्दगी में तो जैसे भूकंप ही आ गया. हुसैन के इस सच से वह बहुत आहत हो गई थी मगर हुसैन ने हंस कर कहा “चलो अब हमारा हिसाब बराबर हो गया”. उन्होंने उस दिन अपना रिश्ता ख़त्म कर दिया. आखरी बार उसके बारे में सुना था की स्वाति का पति जर्मनी चला गया है मगर स्वाति के ज़िन्दगी को काफी आलिशान बना गया है. यह भी सुना है की स्वाति ने एक मलयाली युवक से शारीरिक सम्बन्ध बनाये. लड़का चरसी था, १८ वर्षीया था और बहुत ही अमीर माँ बाप का एकलौता बेटा. सुना तो यह भी है की वह स्वाति के प्रेम में पूरी तरह से पागल था.

जब झूठ का कोहरा उठा
जब झूठ का कोहरा उठा

कभी कभी लगता है मैंने इन लड़कियों के सामने एक गलत उद्हारण रख दिया अपनी जीवन शैली का. स्वाति तीसरी लड़की है जो मेरे नक़्शे कदम पर चल पड़ी है. शायद गलती हो गयी मुझसे.

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