मैं एक बेटे की माँ हूँ, और मैं दुविधा में हूँ

Divya Nair Hinge
mother hugging child

आज के दौर में एक माँ की दुविधा

मेरा बेटा अभी पिछले ही साल प्ले स्कूल से निकला है और उसे कक्षा के सबसे”सौम्य और सुशील” बच्चे की उपाधि दी गई. बहुत ज़ोर शोर से मैंने उसे शाबाशी दी और गर्व से उसकी पीठ भी थपथपाई. मगर फिर जब कुछ देर अकेले बैठी तो मन बहुत अशांत हो गया. बार बार मेरा मन मुझसे ये पूछ रहा था, “क्या आज के समय में मैं सचमुच अपने बेटे को सौम्य और सुशील बनाना चाहती हूँ? कहीं ऐसा तो नहीं की इस सौम्यता को बरक़रार रखते ये नन्ही सी जान आज के ज़माने के लिए “कमज़ोर ” हो जाये?

प्रश्न रह रह कर मन में अक्सर आता था. और फिर कुछ दिनो पहले कठुआ का हादसा पढ़ा. उस आठ साल की मासूम के साथ हुए बलात्कार ने आत्मा तक हिला दी. उस दिन मुझे मेरे प्रश्न का उत्तर भी मिल गया. मैंने तय किया की मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगी जिससे मेरे बेटे की सौम्यता कम हो जाए. क्योंकि मैं नहीं चाहती की उसे बदल कर बाकियों सा बनाने की होड़ में मैं उसकी अच्छाइयों को कम कर दूँ. उसके कोमल ह्रदय की इस समाज को बहुत ज़रुरत है.जब मैंने कठुआ की उस घटना की रिपोर्ट पढ़ी , तो मुझे अगली कई रातों तक नींद नहीं आई. जब कुछ दोस्तों को अपनी परेशानी बताई, तो पांच में से तीन सहेलियों ने ये कह दिया की मुझे खुश होना चाहिए की मैं एक बेटे की माँ हूँ, बेटी की नहीं. सच में?

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मुझे अक्सर लगता है की हमें अपनी ये सोच बदलनी होगी. हमें भावुक माओं की तरह नहीं, बल्कि समझदार महिलाओं की तरह सोचना होगा की कैसे हम ये निश्चित करें की हमारी परवरिश हमारे बेटों को एक अच्छा इंसान बनाये और न की ऐसा हैवान जो किसी की बेटी, माँ या पत्नी का किसी भी रुप में शोषण करे.

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कहाँ से शुरू करें ताकि हमारे बेटे बेहतर पुरुष बनें?

१. सबसे पहले तो हम माओं को ये निश्चित करना होगा की हम अपने बेटों को “एक देन” न बनने दें. उन्हें ऐसा कभी नहीं लगना चाहिए की उनका होना हम सब के लिए एक बहुत बड़ा आशीर्वाद हैं. अगर ये बात हमनें उन्हें समझा दी तो किसी भी स्तिथि
में वो किसी विशेषाधिकार की अपेक्षा नहीं करेंगे.

२. हम मायें बाद में है, और स्त्रियां पहले. तो अपने बेटों को हमें अपनी आवाज़ और अपनी परेशानियां हमेशा बतानी चाहिए. ऐसा करने से उन्हें पता होगा की महिलाओं के लिए कौन सी बातें महत्त्व रखती हैं.

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३. यूँ ही बैठे बैठे पूरे स्त्री समाज पर टिपण्णी न दें और एक ही चश्मे से सभी को न देखें. अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो वो भी समझेंगे की हमारी कथनी और करनी में फ़र्क़ नहीं है.

४. शुरू से ही उससे सही और गलत के अंतर बताएं. ऐसा जल्दी करेंगे तो आगे जाकर उसकी सही गलत की समझ कहीं बेहतर और सुलझी हुई होगी.

५. उसे ये बात साफ़ तौर पर समझाएं की लड़कियों की रक्षा करने की ज़रुरत किसी को नहीं है. ऐसा कर के हम उसे ये मैसेज देंगी की लड़कियां हर तरह से लड़कों के बराबर हैं, और हीन या कमजोर नहीं जिन्हे लड़कों के सहारे की ज़रुरत हो, फिर चाहे वो ऑफिस हो या बैडरूम.

६. उसे बताएं की वो चुटकुले जो स्त्रियों का मज़ाक उड़ाते है, वो न स्वस्थ हैं न सही. अक्सर लड़कियों के लिए ये घिसेपिटे विचार इन्ही चुटकुलों और फॉरवर्ड का ही नतीजा होते हैं.

७. उसे इस बात पर यकीन दिलाएं की हमारे बारे में अच्छी और बुरी बातें हमसे कहीं पहले दूर दूर तक पहुँचती है. अगर वो समाज में इज़्ज़त और नाम चाहता है, तो उसे इस काबिल बनना होगा.

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८. हम दिनभर में कई काम करते हैं और कई किरदार भी निभाते हैं. हमें उससे इन कामों में हाथ बटवाना शुरू करना चाहिए क्योंकि जब वो जानेगा की एक स्त्री को कितना कुछ संभालना होता है, वो स्वतः ही उनकी इज़्ज़त करेगा.

९. हमारे बेटों को हम शक्तिशाली होना तो खूब सिखाते हैं. अब हमें उन्हें बताना है की रोना भी एक सहज भाव है और उसे भी रोने की इजाज़त है.

१०. जब हम दुखी या डरे होते हैं, हमें अपने बेटों को अपने इन भावों के बारे में बताना चाहिए तभी तो वो समझेगा की ज़िन्दगी में सफ़ेद और काले के अलावा और भी कई रंग हैं.

११. ज़रूरी है वो अपनी ज़िन्दगी के हर कदम पर करुणामय या दयालु बनें. दूसरों को दर्द समझेगा तो खुद ही सही कदम उठाने की प्रेरणा मिलेगी.

१२. प्यार सिर्फ करें नहीं, दिखाए भी. उसे प्यार से गले लगाएं, ताकि उसे प्यार की झप्पी का जादू समझ में आये.

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१३. हमेशा अपने बेटे को हमें ये आश्वासन देना है की हम उसके साथ है. अगर वो कभी अकेला महसूस नहीं करेगा तो बड़े होकर एक असुरक्षित पुरुष कदापि नहीं बनेगा.

१४. उससे आपसी सहमति और सेक्स में अपनी अपनी सीमाओं के बारे में बताना होगा ताकि वो अपने साथी की सीमाओं का सम्मान करे.

१५. सौ बातों की एक बात कहूँ तो हम सब को वो स्त्री बनना होगा और ऐसे पुरुष से शादी करनी होगी, जिन्हे हमारे बेटे सम्मान और प्यार के सही मेल के साथ देख सकें.

हाल ही में बीबीसी की एक न्यूज़ स्टोरी में एक बहुत ही सटीक बात कही गयी. उसमे कहा गया की हमारे देश में जब भी कोई बलात्कार की घटना सामने आती है, हम पहले तो बिलकुल चुप रहते हैं, फिर उस घटना के प्रति आसक्त होते हैं और फिर अचानक हम बिलकुल पागलपन की हद्द तक उत्तेजित हो जाते हैं. ये कुछ दिन चलता है फिर दोबारा सो जाते हैं और फिर कोई वीभत्स घटना के घटने पर ऐसी ही प्रतिक्रियाएं देते हैं. आप सोचिये की अगर हर माँ एक अच्छा बेटे भी इस देश को देने में समर्थ हो गयी तो हम एक हारे हुए देश होने से शायद बच पाएंगे. अपनी बात एक बार फिर से आपके सामने रखने के लिए एक छोटी सी घटना आपके साथ साझा करना चाहूंगी. पिछले साल दिवाली पर मेरे बेटे के स्कूल में सभी बच्चों को परंपरागत कपड़ों में स्कूल जाना था. मैं अपने बेटे को उसके स्कूल से लेने पहुंची. मेरी नज़र बच्चों के एक झुण्ड पर पड़ी. कई छोटे छोटे लड़के कुछ लड़कियों का मजाक उड़ा रहे थे क्योंकि उन्होंने लेहंगा पहना था और उनके पेट दिख रहे थे. मुझसे रहा नहीं गया और मैं उनके पास पहुंच गई. “आप लोगों को अगर आपके स्विमिंग ट्रंक में देखकर लड़कियां स्विमिंग पूल में आपका मज़ाक उड़ाने लगे, तो आपको कैसा लगेगा?” मैंने उनसे पुछा. वो छह साल के छोटे छोटे लड़के झेप गए और बहुत ही आराम से उन्हें अपनी गलती भी समझ आ गई. उन्होंने अपनी सहेलियों से माफ़ी मांगी और वायदा किया की अब वो कभी भी किसी लड़की को यूँ तंग नहीं करेंगे.

शायद हमें यही करना होगा अगर हमें अपने बेटों को संवेदनशील बनाना है. उन्हें बार बार लड़कियों की जगह पर खुद को रख कर देखने को कहना होगा. शायद जब उन्हें दुसरे की तकलीफ का एहसास होगा, वो बेहतर इंसान होंगे और ये समाज एक बेहतर जगह.

Divya Nair Hinge
सम्पादकीय पेन से

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