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एक छोटा सा पेड और उसके नीचे वो झुर्रियों वाली प्रेम कहानी

उस बुज़ुर्ग जोड़े को पेड़ के नीचे रोज़ बैठा देख वो हमेशा हंसती थी और फिर एक दिन किसी ने उन्हें झंझोरा...
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प्यार करना जन्नत की एक झलक पाने से कम नहीं…. करेंन सुंदे

यह बात साल १९९७ की है. मैं पुणे के एक गर्लस हॉस्टल में रहती थी. क्योंकि हॉस्टल आर्मी के बच्चों के लिए आर्मी के द्वारा ही बनाया गया था, उसके कायदे और शानोशौकत काफी अलग थी. हॉस्टल एक बहुत ही खूबसूरत मगर प्राचीन इमारत में बनाया गया था, मगर उसका रखरखाव उसकी उम्र पता नहीं चलने देता था. दो एकर के उस कंपाउंड में अनगिनत वृक्ष और पौधे लगे थे और बिल्डिंग के ठीक सामने एक बहुत बड़ा लॉन था जो तीनो कोनो से अध्भुत फूलों से सुशोभित था. उस बाग़ की चार दीवारी के रूप में अशोका के लम्बे वृक्ष लगे थे और बाहर से देख कर हमारा हॉस्टल काफी रमणीय लगता था. यूँ तो एक पूरी जमात थी कर्मचारियों की, उस बगीचे और हॉस्टल के रख रखाव के लिए, मगर अक्सर बाहर से किसी को बुलाया जाता था निराई आदि जैसे कामों के लिए. तो यह किस्सा तब का है जब एक महाराष्ट्रियन दम्पति को इस काम के लिए रखा गया.

वो प्रेम में पागल कोई युवा जोड़ा नहीं था

महिला का चेहरा झुरिओं से भरा था, वो रोज़ झुकी कमर, नीची आँखे किये, एक पुरानी सूती साड़ी बड़े ही सलीके से पहन कर आती थी. उसका कद साढ़े चार फ़ीट से ज़्यादा नहीं होता और वो गोल चश्मे और उससे भी ज़्यादा गोल वो मैरून बिंदी उसके कद को और छोटा दिखाती थी. उसका पति भी कद काठी में तक़रीबन उसके जैसा ही था. छोटा कद, झुर्रियों वाला चेहरा और झुकी नज़रें. कभी कभी उन्हें देख कर लगता था की क्या इन्हे पता भी है की यह कहाँ हैं, या बस ये अपने में यूं ही लीन हैं. मगर काम तो उन्होंने बेशक किया था तभी तो जहाँ जहाँ वो काम कर के हटते, अगले दिन वो हिस्सा बिलकुल अलग ही चमकता था.
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रोज़ सुबह दोनों १० बजे काम के लिए पहुंच जाते और लगातार १ बजे तक निराई करते और फिर उसके बाद बैठ कर अपना खाना खाते.

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उनका लंच और वो हल्का फुल्का पेड़

पहले ही मैंने बताया की किस तरह हमारे हॉस्टल के प्रांगण में हर तरह के छोटे बड़े, घने हलके पेड़ों की भरमार थी. मगर इतने घने बड़े पेड़ों को नज़रअंदाज़ कर यह अनोखा दम्पति रोज़ कोने में खड़े एक नीम्बू के पेड़ के नीचे जा बैठ जाता. उस पेड़ पर बहुत कम पत्तियां थी और इसलिए उसके छाओं भी कम ही थी. मगर वो दोनों रोज़ अपना खाना लेकर भरी दुपहरी में उस आधे अधूरे पेड़ के नीचे बैठ जाते थे. थोड़ी देर सुस्ता कर, दोनों अपना टिफ़िन खोलते और रोज़ उसमे रखी रोटी और प्याज़ बड़ी तसल्ली से खाते.

दोनों इस बात से बिलकुल बेखबर थे की उनकी ये रोज़ की दिनचर्या हम हॉस्टल की लड़कियों के लिए कितना कोतुहल का विषय थी. हम लोगों के लिए प्यार का मतलब था युवा जोड़े, मस्ती, मज़ाक, और आलिशान रेस्टोरेंट में बैकग्राउंड म्यूजिक के साथ कुछ फैंसी सा खाना. किसी भी तरह से हमारे प्यार के परिभाषा में ये दोनों फिट ही नहीं हो रहे थे. हम हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों के बीच जल्दी ही वो दम्पति बहुत मशहूर हो गए. जब भी लड़कियों का कोई झुण्ड उनके पास से गुज़रता, उन्हें देख कर दबी आवाज़ में खिलखिलाने लगता. कई बार खिड़की से कोई लड़की अगर कहती, “वो देखो” तो कमरे में बैठी सारी लड़कियां खिड़की पर झूझ जाती उन्हें देखने के लिए. उन्हें देख हम सब यूँ उत्साहित हो जातीं मानो हमने किसी युवा कपल को एक आलिंगन में चुपके से देख लिया है.

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और फिर हमारी आँखें खुली

एक दिन कुछ ऐसा हुआ की हमारे हॉस्टल में एक नयी लड़की आयी. सब आराम से बैठे थे की किसी ने खिड़की के पास से आवाज़ दी, “अरे वो दोनों आ गए लंच करने.” बस फिर क्या था, सारी की सारी लड़कियां भाग पड़ी उस दृश्य को देखने के लिए. नयी लड़की भी कोतुहलवश खिड़की के पास जा कर उन्हें देखने लगी. “कितने प्यारे लग रहे हैं न ये दोनों. मैं तो अपना सब कुछ देने को तैयार हूँ अगर मुझे इस उम्र में ऐसा साथ मिल जाये,” उस लड़की ने उन्हें देखते ही, ठंडी आह भरते हुए कहा. हम सब हंस रही थी और अचानक उसकी बात सुन कर हम सब चुप हो गईं।

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अचानक हमें समझ आया की वो सच ही तो कह रही थी. उम्र के इस पड़ाव में, जब न उनके पास यौवन है, न खूबसूरती, तब दोनों कितनी शिद्दत से एक दुसरे के साथ यूं बैठते हैं रोज़. उसकी बातें सुन प्यार का सही अर्थ समझ आने लगा.

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

उस निराई करने वाले, शायद अनपढ़, बुज़ुर्ग दम्पति ने हमें ज़िन्दगी भर के लिए प्रेम के पाठ पढ़ा दिए थे.
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