एक सपने जैसी प्रेम कथा जो वास्तविक जीवन का दुःस्वपन बन गई

Shagufta Kalim
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वे कॉलेज की भीड़ के लिए ईर्ष्या का विषय थे। साहिल को उस कॉलेज में सब जानते थे जहां माया स्नातक की छात्रा थी। वह उसका बॉयफ्रैंड नहीं था। माया के अठारहवें जन्मदिन पर साहिल और माया ने एक न्यायशील पंजीकृत विवाह कर लिया।

उस समय मुझे लगता था कि उनकी प्रेम कहानी हर प्रेमी का सपना है। जब वे एक जोड़ा बने तो वह चौदह वर्ष की थी और वह उससे थोड़ा बड़ा था। माया ने यह साझा करने से इनकार कर दिया कि वे कैसे मिले, ये सब कैसे शुरू हुआ। साहिल भी चुप्पी साधे था। मैंने उनके शुरूआती दिनों के बारे में पूछ कर माया को बहुत परेशान किया। एक बार मैंने उसे उत्तेजित होकर कहा कि मज़ा तो विवरण में ही है। वह खिलखिला उठी और बोली हर एक को विवरण जानना ज़रूरी नहीं। मुझे लगता है कि वे खूबसूरत यादें विशेष रूप से उनकी थीं।

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माया के स्नातक होने के एक महीने भीतर मुझे उत्तरी कोलकाता में उनके पैतृक घर में उनकी शादी का निमंत्रण पत्र मिला। वह सुंदर लग रही थी और वह सर्वोत्कृष्ठ बाबूमोशाय लग रहा था।

उनकी शादी की पहली सालगिरह पर वे दो से तीन हो चुके थे। ‘यह एक लड़की है’ माया ने मुझे बताया, उसकी आवाज़ में उत्तेजना और रोमांच स्पष्ट था। उन्होंने उसे रिनी नाम दिया।

फिर हम थोड़े समय तक संपर्क में नहीं थे…

परेशानी शुरू हुई

जब मैंने अगली बार उसके साथ फोन पर बात की, उसकी आवाज़ में परेशानी और यहां तक की निराशा थी। उसके पति की नौकरी छूट गई थी और वह नौकरियाँ ढूंढ रही थी।

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परेशानियां धीरे-धीरे स्वर्ग में आ रही थीं….

जब साहिल को दूसरी नौकरी नहीं मिली, जिस पहली नौकरी का प्रस्ताव माया को मिला, उसने वह कर ली। उसने एक नए खुले अस्पताल में एक रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम करना शुरू कर दिया। हर सुबह वह अपनी बेटी को अपनी माँ के घर छोड़ने जाती और काम के लिए निकल जाती। शुरूआती समस्याओं के बाद, माया अपनी नौकरी पर पकड़ बनाने और कठिन परिस्थितियों में घर संभालने में सक्षम हो रही थी।

नौकरी की तलाश साहिल का इम्तेहान ले रही थी। जब हम अस्पताल के कैफेटेरिया में मिले, उसने मुझे बोला, ‘‘वह कटू होता जा रहा है और शराब में सूकून ढूंढ रहा है। उसमें निराशा बढ़ती ही जा रही है, लेकिन यह समझा जा सकता है।” साहिल अब उसकी पत्नी की आय पर निर्भर था।

उनकी प्रेम कहानी अब एक दुःस्वप्न बनती जा रही थी…

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शोषण शुरू कैसे हुआ

उसके अनुसार, ऐसी कोई एक विशेष घटना नहीं थी जो उनके वैवाहिक जीवन को नीचे गिरा रही थी। यह तब शुरू हुआ जब वह काम से देर से लौटने लगी और उससे प्रश्न पूछे जाने लगे। विवाहेतर संबंधों के बारे में आरोप लगाए जाने लगे। उसके पर्स से पैसे गायब होने लगे। बहसें बहुत ज़्यादा बढ़ने लगीं। और फिर यह सिर्फ आक्षेप और बहस तक ही सीमित नहीं रह गया था। थप्पड़, मुक्के और लात तक जा पहुंचा था। उसके जीवन का प्यार अब उसे यातना दे रहा था।

स्त्रियों के साथ हिंसा सिर्फ चोट लगने के बारे में ही नहीं है। माया को यह अहसास भी नहीं हुआ कि वह यौन हिंसा की शिकार थी, जब तक कि उसके स्त्री रोग विशेषज्ञ ने गर्भपात के लिए हरी झंडी दिखाने से इनकार ना कर दिया। यह छठी बार था और उसका स्वास्थ्य गंभीर रूप से जोखिम में था। कुछ महीने बाद उनके बेटे रेमो का जन्म हुआ।

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मुझे आश्चर्य हुआ कि क्यों माया जैसी शिक्षित शहरी स्त्री अपमानजनक पति को सहन करती गई। मैं अक्सर उस से दर्द को समाप्त करने का आग्रह करती थी। वह हमेशा इसे यह कह कर टाल देती थी कि ‘साहिल को छोड़ देना गलत होगा,’ ‘उसका मन अभी नाज़ुक स्थिति में है’, ‘मुझे अब भी उससे लगाव है, ‘बच्चों का क्या होगा….’कभी-कभी भावनात्मक रूप से अभिभूत होने पर, उसके पास शब्द कम पड़ जाते थे।

अंतिम दुर्घटना

साहिल कभी ठीक नहीं हुआ। उसकी पीने की आदतें बद से बदतर होती गईं, हिंसा बढ़ गई।

फिर ब्रेकिंग प्वाइंट आया….

एक दिन साहिल का एक दोस्त शराब पीने आया। उसके जाने के बाद साहिल माया के पास आया। उसने उसे ताना मारा, ‘‘मेरा दोस्त यहां तुम्हारे लिए आता हे। तुम दोनो मेरे पीठ पीछे गुल खिला रहे हो।” और, ‘यह कमीना मेरा बेटा नहीं है। इसका भद्दा अस्तित्व तुम्हारी यौन करतूतों का परिणाम है।” जैसा पहले भी कई बार हुआ था, मौखिक चिल्लाहट शारीरिक हिंसा पर जा पहुंची थी।

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वह उसके बाल पकड़ कर बेडरूम तक खींच लाया, उसपर बहुत से वार किए, उसके कपड़े फाड़ दिए। जब वह स्वयं को बचाने की कोशिश कर रही थी तो उसका शरीर लाल निशानों से भर चुका था। और फिर वह घबरा गई जब उसने देखा छः वर्षीय रिनी कोने में खड़ी चुपचाप रो रही थी। अपनी डरी हुई बेटी को देखकर माया कमरे से भाग गई। उसने खुद को किचन में बंद कर लिया। मई की तपती गर्मी में, नग्न अवस्था में, दर्द में तड़पते हुए और अपमानित होकर उसने पूरी रात वहीं बिताई। उसने जो दर्द महसूस किया वह सिर्फ शारीरिक नहीं था, उसे लगा जैसे उसकी आत्मा छलनी हो गई है। सुबह की पहली रोशनी के साथ वह एक निर्णय तक पहुंची।

उनका बेडरूम रात के कटू अनुभव की दास्तान सुना रहा था। जो साड़ी वह पिछले दिन काम पर पहन कर गई थी वह बिस्तर पर पड़ी थी। उसने स्वयं को उससे ढंका, रेमो को उठाया और जल्दी रिनी को जगाया। सात फेरे लेने के सात साल बाद माया चली गई, उसके बिखरे सपनों का घर हमेशा के लिए छोड़ गई।

“जब तक यह मुझ तक सीमित था तब तक मैंने उसके वहशी व्यवहार को सहन किया। लेकिन जब मेरी बेटी मे मेरा शोषण देखा, वह इसका अंत था। मैं नहीं चाहती कि वह डर के साये में बड़ी हो। मैंने उसे छोड़ने के लिए खुद को मजबूर किया,’’ उसने मुझे बताया।

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यह एक जीवन बदलने वाला निर्णय था

कारण विशाल हैं

मेरी सहेली भाग्यशाली है कि उसे एक और साथी मिल गया है लेकिन वह इतनी भी भाग्यशाली नहीं कि रिश्ते पर मोहर लगा सके। कानूनी रूप से वह अब भी साहिल की पत्नी है। उसने माया को तलाक देने से इनकार कर दिया है। ‘‘मैं उस से थक चुकी हूँ। मैंने चीज़ों को ऐसे ही छोड़ दिया है। हाँ, कभी कभी मुझे घर बसाने की, घरेलू सुख का आनंद लेने की इच्छा होती है जिसका मैंने कभी सपना देखा था। रिनी मुझे समझती है, शायद इसलिए कि उसने मेरी पीड़ा देखी है। रेमो नहीं समझता, वह उस समय बहुत छोटा था।”

उनकी प्रेम कहानी दूसरे प्रेमियों के लिए एक सपना थी, अब वे एक दूसरे से नफरत करते हैं। कैसे? क्यों? लेकिन पुराने ज़ख्म क्यों कुरेदना, शायद उन्हें ऐसे ही छोड़ देना सबसे अच्छा है…

विधवा होने के बाद, उसके माता-पिता भी उसे सामान्य और सुखी देखना नहीं चाहते थे

दुनिया के लिए वह कैरियर वुमन थी, लेकिन घरेलू हिंसा की शिकार थी

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