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एक शरीर और दो लिंगः चंद्रवंशियों की उत्पत्ति कैसे हुई

चंद्रवंशी राजवंश की उत्पत्ति की कहानी अजीब और अद्भुत है

हमारे ग्रंथों में लिंग परिवर्तन और ऑल्टरनेट सेक्सुअल आइडेंटिटीज़ के कई विस्तृत और व्यापक संदर्भ हैं।

यद्यपि वे होमोसेक्सुआलिटी या बाइसेक्सुआलिटी का सीधा उल्लेख नहीं करते हैं, फिर भी भगवान या उन लोगों की कहानियाँ मौजूद हैं जिनके गुण या व्यवहार प्रतीकात्मक हैं। उनकी व्याख्या बाईसेक्सुअल, ट्रान्सजेंडर या ऐसे लोगों के रूप में की जा सकती है जिनमें लिंग वरीयता के तत्व हैं।

समुद्र मंथन के बाद, मोहिनी के रूप में विष्णु शिव द्वारा गर्भवती हो जाते हैं, और अयप्पा को जन्म देते हैं। महाभारत में, पांचाल के राजा द्रुपद के घर शिखंडी के रूप में अम्बा का पुनर्जन्म होता है। वह भीष्म से बदला लेने के लिए यक्ष के वरदान के साथ पुरूष शिखंडी में बदल जाती है।

इला/सुद्युम्ना की भी समान कहानी है जहां एक ही शरीर में दो लिंग रहते हैं।

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यह कहानी भागवत पुराण में अर्जुन के पोते परीक्षित और ऋषि शुक्देव के बीच बातचीत के रूप में दर्ज की गई है। जब परीक्षित अपने चंद्रवंशी राजवंश और सूर्यवंशियों के साथ इसके संबंध के बारे में पूछता है, तो शुक्देव ये कहानी उसे बताते हैं।

कहानी के अनुसार, सूर्य और संज्ञा के यहां वैस्वृत मनु नामक बेटे का जन्म हुआ था। ऐसा कहा जाता है कि मनुष्य के सभी राजवंश मनु से ही उत्पन्न हुए हैं। श्रद्धा से शादी करने के बाद मनु लंबे समय तक संतानरहित रहा। अपने वंश को आगे बढ़ाने के लिए एक बेटे के जन्म के लिए उसने भगवान से प्रार्थना करने का फैसला किया। अपने गुरू ऋषि वशिष्ठ की मदद से उसने जुड़वा भगवान मित्र और वरूण के सम्मान में हवन किया। वे प्रकट हुए और उन्होंने बच्चे की उसकी इच्छा के लिए वरदान दिया।

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श्रद्धा ने एक लड़की इला को जन्म दिया। मनु संतुष्ट नहीं था, क्योंकि वह एक पुत्र चाहता था। उसने वशिष्ठ से बच्ची को लड़के में बदलने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करने को कहा। वशिष्ठ ने इला को सुद्युम्न नाम के एक पुरूष में बदल दिया। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजू़र था। सुद्युम्न अपने मित्रों के साथ शिकार अभियान के दौरान सुमेरू पर्वत के पास घुड़सवारी कर रहा था। एक हिरण का पीछा करते हुए वे सुकुमार नामक एक कुंज में चले गए। जिस क्षण उसके नौकर-चाकर केंद्र में पहुंचे, वे सभी मादा बन गए- पुरूष, राजा और घोड़े भी।

वह कुंज देवी पार्वती के लिए एक निजी स्थान था। उनकी निजता की सुरक्षा के लिए, भागवान शिव ने उस स्थान को वशीभूत कर दिया था। अगर किसी भी पुरूष ने वहां कदम रखा, तो वह स्त्री बन जाएगा। सुद्युम्न ने ऋषि वशिष्ठ को बुलावा भेजा, जिन्होंने शिव को मनाने की कोशिश की कि वे उसे क्षमा कर दें और उसे फिर से पुरूष बना दें।

शिव जादू के प्रभाव को पलट नहीं सकते थे लेकिन वह उन्हें थोड़ा सा संशोधित कर सकते थे। उन्होंने कहा कि सुद्युम्न वैकल्पिक रूप से मादा और नर दोनों के रूप में रह सकता है। महिला के रूप में उसने जो कुछ भी किया, पुरूष बनने के बाद वह भूल जाएगा। उसकी याद्दाश्त भी बदल जाएगी, ताकि वह अपराधबोध में जीने से बच सके। वशिष्ठ ने भाग्य को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इला को कुंज में ही छोड़ दिया। वह जानते थे कि जब वह सुद्युम्न में बदल जाएगा तो वह घर लौट आएगा।

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जंगल में घूमते हुए इला को बुध ग्रह मिला, चंद्र भगवान और तारा का अवैध पुत्र। बुध बहुत ज्ञानी और नेक था। उसने इला को प्रपोज़ किया और उन्होंने शादी कर ली। एक महीने बाद इला सद्युम्न में बदल गई। वह अपने वैकल्पिक अस्तित्व और शादी को पूरी तरह भूल गया।

बुध ने नियति को स्वीकार कर लिया और सुद्युम्न को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। एक साल तक, एक महीने वह इला के साथ वैवाहिक सुख का आनंद लेता था, और अगले महीने सुद्युम्न को वेदों के फरमान सिखाता था। उनके पुत्र पुरूर्व ने इला की कोख से जन्म लिया। फिर बुध ने सुद्युम्न को रहस्य बता दिया।

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सुद्युम्न बच्चे के साथ अपने राज्य लौट आया। उसने फिर से शादी की और उसके तीन और पुत्र हुए उत्कल, गया और विमल। पुरूर्व फिर भी उसका पसंदीदा पुत्र बना रहा। हर अगले महीने, वह एक महिला के रूप में जीवन जीने के लिए अपने निजी घर में चला जाता था।

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उसकी वैकल्पिक पहचान और हर दूसरे महीने राजगद्दी से उसकी अनुपस्थिति राजा के रूप में सुद्युम्न की प्रतिष्ठा में हस्तक्षेप करती थी। उसने अंततः पुरूर्व को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया और जंगल में रहने चला गया।

वैस्वृत मनु के और भी कई पुत्र थे। उनमें से, इक्षवाकु एक बहुत ही बहादुर राजा था और सूर्य का पोता होने के कारण उनके वंशजों को सूर्यवंशी के नाम से जाना जाता था। चूंकि पुरूर्व चंद्र का पोता था, उसके वंशज चंद्रवंशी के नाम से जाने जाते थे।

यद्यपी यह कहानी सुद्युम्न से इला के परिवर्तन को एक पूर्ण शारीरिक बदलाव के रूप में वर्णित करती है, लेकिन यह एक शरीर में दोहरी सेक्सुअल आइडेंटिटी का एक उदारवादी प्रतिनिधित्व हो सकता है – एक बाईसेक्सुअल व्यक्ति, जो महिला और पुरूष दोनों के रूप में जीया।

उल्लेखः श्रीमद् भागवत पुराणः 9.1.1 -9.1.42 (काण्ड 9, अध्याय 1, पद 1 से 42)

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