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एक तलाकशुदा स्त्री को भारत में अभिशाप के रूप में क्यों देखा जाता है?

भारतीय समाज तलाकशुदा महिलाओं को कैसे देखता है? बोनोबोलॉजी योगदानकर्ता अपने विचार साझा करते हैं
Woman Sitting Alone

शायद हर कोई ओर्गेज़्म या जी स्पॉट के बारे में नहीं जानता हो। लेकिन हम में से हर कोई तलाक का मतलब ज़रूर जानता है। और यह कोई गलती नहीं है कि हम भारतीय अक्सर इसे ‘डाइवोर्स’ कहते हैं। हमारे लिए, तलाक अब भी बहुत बड़ी ना है; महिला के जीवन का अंत है।

मेरे पास तलाकशुदा दोस्तों का एक समूह है – पुरूष और स्त्रियां, और मैं उन्हें महीने में दो बार अलग-अलग मिलती हूँ। मैं उनसे मिलने का इंतज़ार करती हूँ। लेकिन उनसे मिलकर मुझे अहसास होता है कि भारत में तलाकशुदा पुरूष होने से कहीं ज़्यादा मुश्किल है तलाकशुदा स्त्री होना। पुरूषों के लिए यह सिर्फ एक और गेट टुगेदर जैसा है – एक पोकर नाइट या गोल्फ टूर्नामेंट जैसा – खाना, शराब पीना और मज़ा लेना। लेकिन तलाकशुदा महिलाएं अकेले होने की वास्तविकता, क्रोधित माता-पिता और उन दोस्तों को संभालने के संघर्ष के बारे में बात करती हैं जो इसे समझ नहीं पाते।

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तलाकशुदा महिला समूह हँसी, आंसू और आलिंगन साझा करता है और हमेशा एक दूसरे को भविष्य के प्रति थोड़ा ज़्यादा आशावान बनाता है।

जिस क्षण एक महिला तलाक के बारे में सोचती है और अपने माता-पिता या दोस्तों के साथ अपने विचार साझा करती है, उसे मिलने वाली सलाह समान ही होती है – ‘‘ऐसा कदम उठाने के बारे में सोचना भी मत। यह कदम उठाये जाने योग्य बिल्कुल नहीं है और तलाकशुदा का ठप्पा लगने के बाद तुम्हें जिन मुसीबतों से गुज़रना होगा उसके बारे में तुम कुछ सोच भी नहीं सकती हो। नीति सिंह सोचती हैं ‘‘समाज के लिए एक तलाकशुदा (खास तौर पर महिला) को सम्मान के साथ देखना इतना मुश्किल क्यों है? उसे एक अभिशाप क्यों माना जाता है?’’

शायद उसे ज़्यादा कोशिश करनी चाहिए थी! शायद उसे अपने आत्म-सम्मान से ज़्यादा महत्त्व अपने पति और शादी के बंधन को देना चाहिए था! शायद उसे एडजेस्ट करना चाहिए था, स्वीकार कर लेना चाहिए था या शायद और ज़्यादा प्रयास करना चाहिए था! पूरी दुनिया शादी में खुश है और एडजेस्ट कर रही है – अगर पति कभी-कभी उसे मारता है या उसका अफेयर है तो इसमें बड़ी बात क्या है …उसे एडजेस्ट करना चाहिए था….और कोशिश करनी चाहिए थी… – ये भारतीय तलाकशुदा महिला के बारे में कहे जाने वाले कुछ विचार हैं,’’ के कहती है। तलाक खुद दर्दनाक है, लेकिन यह कंडीशनिंग और पूर्वाग्रह भारतीय महिलाओं के लिए इसे कहीं अधिक कठिन बना देते हैं। ‘‘लेकिन उम्मीद है और कई लोग इसे सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में स्वीकार करने लगे हैं और महिलाओं के मैरिटल स्टेटस को जज किए बिना उन्हें सम्मान देने लगे हैं,’’ के महसूस करती है।

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अमित शंकर साहा का मानना है कि समाज मूल रूप से ‘‘स्थिति के साथ खुश होना चाहता है और यह सोचने का दृष्टिकोण अपनाता है कि सब ठीक है।” यह उन लोगों को अपनी तथाकथित उपलब्धि जताने का और दूसरों को नीचा दिखाने का भी एक मौका देता है जो भाग्यशाली रहे हैं कि उनका विवाह सुखी है या फिर जिन्होंने अपने विवाह में समझौता किया है।

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“जो सोचते हैं कि एक तलाकशुदा व्यक्ति एक अभिशाप है, वे मानसिक रूप से बिमार हैं,’’ अशोक छिब्बर महसूस करते हैं। ‘‘आज, एक स्त्री एक पुरूष जितनी ही शिक्षित है, अच्छा वेतन कमाती है या अपना स्वयं का व्यापार सफलतापूर्वक चलाती है। उसकी वैवाहिक स्थिति कोई महत्त्व नहीं रखती है। हर इंसान को आत्मसम्मान का अधिकार है चाहे वह सिंगल हो, विवाहित हो, तलाकशुदा या विधवा हो,’’ छिब्बर आगे कहते हैं।

अंतरा राकेश कहती हैं, ‘‘भारत में महिलाओं को हमेशा ऐसा माना जाता है जो अपनी आजीविका, भावनात्मक, वित्तीय, शारीरिक और जीवन की अन्य सभी ज़रूरतों के लिए पुरूषों पर निर्भर हैं,’’ तलाकशुदा को एक विद्रोही माना जाता है। ऐसी महिला जो खुद के लिए खड़ी हुई, जिसने समझौता या एडजेस्ट नहीं किया या हार मान ली।

भारत में लोग तलाकशुदा को एक बहुत मज़बूत, आत्मनिर्भर, घमंडी, असहिष्णु महिला के रूप में देखते हैं जो सामाजिक मानदंडों का पालन नहीं कर सकी।

“इसलिए, जिस स्थिति की वजह से उसे इतना कठोर कदम उठाना पड़ा उसपर सहानुभूति दिखाने की बजाए, उसपर तलाकशुदा औरत का ठप्पा लगा दिया जाता है और यह वाक्यांश स्वयं व्याख्यात्मक बन जाता है, उसका चरित्र चित्रण,’’ अंतरा आंह भरती है। एम मोहंती सकारात्मक पक्ष को देखते हैं और कहते हैं, ‘‘मैं इस तथ्य की गारंटी ले सकता हूँ कि हमारे समाज में बेहतर विचारधारा वाले वर्ग भी हैं।”

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ऐसा कोई घाव नहीं है जिसे समय नहीं भर सकता है। जैसे ही आप अपने नए रूप के आदी हो जाती हैं, आप रेस्त्रां में अकेले भोजन करने का आनंद लेने लगती हैं, बार में उन बीयर गटकने वाले पुरूषों से नज़रे मिलाने से बचते हुए वोडका का मज़ा लेती हैं लेकिन उनकी जिज्ञासा से डरती नहीं हैं। आप दिमाग रहित किशोर हंसी को अनदेखा करती हैं। संक्षेप में, आप एक बार फिर से जीवन का आनंद लेना शुरू कर देती हैं और अनुभव की संपत्ति के साथ मज़बूत, अधिक आत्मविश्वासी बन कर उभरती हैं। अगर आपको डुबकी लगाने की आवश्यकता महसूस होती है तो आगे बढ़ें और यह करें। आप ना सिर्फ जीवित रहेंगी बल्कि आगे बढ़ेंगी!

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