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हम दोनों बिलकुल विपरीत स्वभाव के है मगर गहरे दोस्त हैं

हम दोनों ऑफिस सहकर्मी हैं और बहुत अच्छे दोस्त भी. क्या पता एक दिन यह दोस्ती किसी प्यार में ही बदल जाए!
man and woman eating

हम दोनों में इतनी समानताएं थी की हम दोस्त बन गए

बारहवीं के एग्जाम में मैं दिल टूटने की वजह से फेल हो गया था. बस तभी मैंने ये ठान लिया था की अब मैं ग्रेजुएशन की डिग्री भर से संतुष्ट नहीं होऊंगा. मैंने बहुत मेहनत की और मुझे डिग्री से मिला.
के साथ साथ एक अच्छी कंपनी में एक बढ़िया नौकरी भी मिल गई.

वहीं मैं उस
हम दोनों हमउम्र थे और हमें लगा की हम दोनों में काफी समानताएं भी है. शुरू शुरू में बस पंद्रह मिनट के चाय ब्रेक के लिए हम लोग मिलते थे. मगर जैसे जैसे हम ऐसे दुसरे को जानने लगे, हमारे मिलने समय भी बढ़ने लगा. मैं उससे ज़्यादा ऑफिस को समझता था तो अक्सर उसकी परेशानियों में उसकी आये दिन मदद भी कर देता था. इस बात के लिए वो हमेशा मेरा आभार प्रकट करती थी.

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मगर असलियत में हम दोनों बहुत अलग थे

जहाँ मुझे अकेले बैठ, अपनी ही सोच में डूबे अदरक वाली एक गरम चाय पसंद थी, उसे लोगों के साथ गप्पे करते हुए कॉफ़ी पीना पसंद था. मैं अक्सर दुनिया के लिए एक बंद किताब ही था. चाहे कितना भी परेशांन, हैरान, गुस्से में या उत्साहित होऊं, लोगों को अपने मन का हाल भांपने नहीं देता था. दूसरी तरफ उसके सारे भाव उसकी शक्ल देख कर ही आप पढ़ सकते थे. वो बहुत संवेदनशील भी थी. अगर किसी दिन कोई सीनियर उससे रुखाई से बात करता, तो उसका दिल टूट जाता था. और अगर किसी दिन उसके लिए कोई कुछ छोटा सा भी अच्छा व्यवहार या काम कर देता था, तो उसका तो दिन ही बन जाता था. उसकी सबसे अच्छी बात थी उसके मन में सबके लिए अथाह प्यार और दोस्ती. जब मैंने उसकी तरफ दोस्ती का हाँथ बढ़ाया, उसने इतनी शिद्दत से मेरी दोस्ती कबूल की कि मैं भी चकित रह गया.

परिवार उसके लिए काफी महत्व रखता था. वो हमेशा पूरी कोशिश करती थी की वो अच्छा समय अपने परिवार के साथ बिताये और मेरे मन में तो ऐसे ख्याल तक नहीं आते थे. मुझे लिख कर अपनी भावनाएं व्यक्त करना पसंद था और उसे आमने सामने.

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मुझे लिख कर अपनी भावनाएं व्यक्त करना पसंद था और उसे आमने सामने.

वो तो उन लोगों में से थी जो अजनबियों को देख कर भी उनसे बातें कर ले और मुझे अजनबियों की तरफ एक मुस्कान भी मुश्किल लगती थी.

“तुम उसे डेट पर क्यों नहीं ले जाते?”

हमारी दोस्ती को कुछ ही महीने हुए थे और हम ऑफिस सहकर्मी उसका जन्मदिन मनाने कहीं बाहर लंच के लिए गए. वो एक छोटा सा जश्न था उसे अच्छा महसूस कराने के लिए. लंच ख़त्म हुआ और तभी मेरे एक सहकर्मी ने मुझसे पुछा, “तो क्या इरादा है? उसे डेट पर ले जाने वाले हो?” मैं उसके इस प्रश्न से चकित रह गया और जब कोई जवाब नहीं दिया. मगर मुझे भी उस दिन ये एहसास होने लगा की मैं उसकी तरफ वाकई आकर्षित हो रहा था मगर खुद ही इसको अनदेखा कर रहा था.

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मेरे दिमाग में हज़ारों सवाल उमड़ कर आने लगे. करियर, पढ़ाई , ऑफिस, हमारे बिलकुल विपरीत व्यक्तित्व… मगर मुझे पता था की इन चीज़ों से हम दोनों में से किसी को भी फर्क नहीं पड़ने वाला था.
हम दोनों तो अब किसी भी विषय पर बहस करने की ज़रुरत नहीं पड़ी थी.

वो मेरी बात से काफी प्रभावित थी की मैं पढ़ाई के साथ साथ ही नौकरी भी करता हूँ. वो मुझसे हमेशा कहती थी की ऐसे स्वावलम्बी लड़के आज की दुनिया में दिखने बहुत मुश्किल हैं. वो मुझसे हमेशा जानना चाहती थी की यूनिवर्सिटी और ऑफिस में सब कुछ कैसा चल रहा है. मैं जब भी किसी भी काममेंअटकता था, मुझे पता था की वो मेरी हमेशा मदद करेगी. मानसिक तौर पर वो जिस तरह मेरी सहायता करती थी, वो मैं आपको शब्दों में बता भी नहीं सकता. मुझ से मेरी खैरियतऔर ऐसी बातें तो मेरे परिवार वाले भी नहीं पूछते थे. बस मैं समझ गया की मैं ऐसे ही तो किसी की तलाश में था. कोई जो मुझे समझे और मेरी ज़िन्दगी में दिलचस्पी ले और मेरी फ़िक्र करे.

जब मैंने उससे दूर होना चाहा

मैंने एक चांस लिया और एक दिन एक मैसेज के ज़रिये मैंने उसके सामने अपने मन की बात रख दी. मैंने उससे ये भी कहा, “मैं अब तुम्हारे साथ और वक़्त नहीं गुज़ारूंगा क्योंकि ऐसा करने से मेरे मन की भावनाएं और प्रबल हो जाएँगी और मुझे बहुत कमजोर कर देंगी.”

उसका जवाब था, “जो शुरू भी नहीं हुआ उसके लिएतुम इतनी प्यारी हमारी दोस्ती को ख़त्म कर देना चाहते हो?”

मैंने उसकी बात मान ली और हम दोस्त बने रहे.

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मुझे बहुत आश्चर्य हुआ मगर हम दोनों का रिश्ता और गहरा हो गया.

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इस बात को दो महीने हो चुके हैं और मुझे अंदेशा है की अब वो भी मेरी तरफ आकर्षित होने लगी है. मेरे ऑफिस आने का वो अब इंतज़ार करती है. जब वो काम कर रही होती है तो वो चाहती है की मैं उसके आस पास रहूँ. अगर किसी दिन मेरी उससे मुलाकात नहीं होती तो मुझसे मिलने खुद ही मेरे ऑफिस में आ जाती है. मुझे मिलने के प्यारे प्यारे बहाने बनाती रहती है. हम दोनों को ही सप्ताहांत अब काफी लम्बा लगने लगा है. तनख्वाह के आलावा शायद एक दुसरे से मिलना ही हमदोनो को ऑफिस आने के लिए प्रेरित करता है.

हो सकता है, किसी दिन भविष्य में जब वो मेरा हाथ पकडे तो बस मुझे उस पल सहारा देने के लिए नहीं, बल्कि जीवनभर साथ देने के लिए हो.

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