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जब हमें बॉलीवुड के व्याभिचारिणी चरित्रों से प्यार हो गया

चंद्रमुखी से वेरोनिका तक, दूसरी स्त्री अक्सर प्रेम त्रिकोण में सबसे जटिल चरित्र होती है। यहां बॉलिवुड के किरदार हैं जिन्होंने व्यभिचारिणी को मानवीय रूप दिया है।
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बेवफाई हमेशा एक बहुत चर्चित विषय रहा है

ट्विटर के अस्तित्व में आने से पहले ही यह विश्वभर में प्रचलित रहा है। हमने किताबें लिखी हैं, मास्टरपीस चित्रित किए हैं, अनगिनत फिल्में बनाई हैं और हमने बाते की हैं। बहुत ज़्यादा। कई वर्षों तक। और लगता है अब भी इसके प्रति हमारा रूझान कम नहीं हुआ है।

जो पूरी वस्तु को कठिन बनाता है वह यह है कि यह कभी भी एक स्पष्ट श्वेत और श्याम मामला नहीं है। सभी शामिल पक्ष मानव हैं, उनका मन पूरी तरह खेल में रमा हुआ है और वे आमतौर पर प्रक्रिया में कुचले जाते हैं।

हम एक व्यक्ति पर बुरा होने का और बाकी दो व्यक्तियों पर पीड़ित होने का ठप्पा कैसे लगा सकते हैं? एक तर्क यह भी है कि एकल विवाह स्वयं में एक समस्या है। एक सिद्धांत यह है कि मनुष्य स्वाभाविक रूप से बहुविवाही है और उनसे एकल विवाह की अपेक्षा करना तर्कविरूद्ध है। फिर भी हम एकल विवाह की अपेक्षा करते हैं और पीड़ित होते रहते हैं। इस दुविधा को विभिन्न फिल्मों में अच्छे से प्रलेखित किया गया है और उनमें से कुछ सभी शामिल पक्षों का मानवीकरण करने की कोशिश करती हैं। ये बॉलीवुड से कुछ ‘दूसरी स्त्री’ पात्र हैं जिन्होंने हमारे दिलों को छूआ है।

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‘कभी अलविदा ना कहना’ से ‘माया’

रानी मुखर्जी इस 2006 की फिल्म, जो दो जोड़ों और उनके टूटे हुए विवाह के बारे में है, में दिल टूटने का चित्रण है। माया अच्छी पत्नी की पोस्टर गर्ल है। वह अपने घर, पति का ध्यान रखती है, और उनका जीवन चलाती है। हालांकि वह अपने ससुर की ऋणी है जो बचपन में उसे घर ले आए थे। इसका बोझ उसकी आत्मा पर बहुत ज़्यादा है और जो उसके अजीब विवाह में दिखाई देता है। हम कभी अलविदा ना कहना को एक ऐसी फिल्म के रूप में देख सकते हैं जो हमें दिखाती है कि दो लोग अपने विवाह को बचाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन फिर भी बुरी तरह विफल हो जाते हैं। जब वे अपनी बेवफाई के लिए क्षमा चाहते हैं, तब पात्रों की निस्वार्थता के कारण वे मानवीय लगते हैं।

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देवदास की चंद्रमुखी

सोने के दिल वाली वेश्या एक कथात्मक अलंकार है जिसका इस्तेमाल पूरे इतिहास में किया गया है। देवदास में, चंद्रमुखी अलंकार को साकार करती है और इसे बढ़ा देती है। माधुरी दीक्षित ना केवल चरित्र में सुंदरता लाती है, बल्कि अपना दिल चीर कर रख देती है, और दर्शकों के देखने के लिए छोड़ देती है। पारो की शादी किसी और के साथ होने के कारण तकनीकी तौर पर वह ‘दूसरी स्त्री’ है, शायद देवदास फिल्म को छोड़कर। लेकिन पारो और देवदास को मुख्य जोड़ी मानते हुए, चंद्रमुखी दूसरी स्त्री बन जाती है। वह ऐसी स्त्री है जो देवदास के प्यार का छोटा सा टुकड़ा पाने के लिए भी तैयार है। वह अपमानजनक है, नशे का आदी है, इस योग्य नहीं है और फिर भी वह उसे प्यार करती है। चंद्रमुखी देवदास की शूरवीर रक्षक है, जो उसे कथात्मक अलंकार से कहीं अधिक बनाता है।

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कॉकटेल में वेरोनिका

अक्सर एक अभिनेत्री के रूप में दीपिका की प्रारंभिक भूमिका कहलाई जाने वाली, वैरोनिका एक सूक्ष्म किरदार है। तीन चरित्रों के बीच की रेखाएं समझ से परे धुंधली हैं और हम चाह कर भी उनपर दया खाने से खुद को रोक नहीं पाते। अपने ब्वॉयफ्रैंड को जाने देते हुए, वह भी अपनी सबसे अच्छी सहेली के पास, वैरोनिका शालीनता और मर्मभेदी दुख दर्शाती है। हम देखते हैं कि वह संबंध को सुधारने के लिए तड़फड़ा रही है, यह जानते हुए भी कि उसका साथी किसी और से प्यार करता है। यह संघर्ष उसके कार्यों में, उसके चेहरे पर, उन अभिव्यंजक आंखों में दिखाई देता है। वेरोनिका हम सब का रूप बन जाती है जब वह प्यार में बहुत कोशिश करती है, लेकिन हममें से कुछ की तरह वह असफल होती है, और हमें उसका दर्द कुछ इस तरह महसूस होता है जैसे वह हमारा अपना हो।

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ऐ दिल है मुश्किल से सबा

सबा जान जाती है कि वह कब दूसरी स्त्री बन चुकी है, वह यह भी जानती है कि कब चले जाना है और एैश्वर्या इस सीन में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करती है। वह रणबीर के चरित्र, जो उस समय उसका ब्वॉयफ्रैंड था, को कहती है कि वह नहीं चाहती कि वह उसे समझाए क्योंकि अगर वह ऐसा करेगा तो वह समझ जाएगी और वह टूट जाएगी। वह कहती है कि किसी के साथ प्यार में पड़ने को आप नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन आप यह नियंत्रित कर सकते हैं कि आपको कब जाना है। वह अयान से जाने को कहती है। यह ‘जा सिमरन जा’ का विपरीत है और यह काम करता है। सबा एक तरह से अयान के लिए दूसरी स्त्री है क्योंकि उसने अपने पहले प्यार को प्यार करना कभी बंद ही नहीं किया। वह अयान से ज़्यादा मज़बूत है और उसे जाने दे सकती है। वह कठिन निर्णय लेने के लिए काफी मज़बूत है, लेकिन बगैर नफरत के निर्णयों को व्यक्त कर सके इतना प्यार करती है।

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अर्थ की कविता

1982 की फिल्म महेश भट्ट के लिए एक तरह से परवीन बाबी के साथ उनके संबंध की स्वीकारोक्ति थी। दिवंगत स्मिता पाटिल अर्थ में एक दूसरी स्त्री के पागलपन को बखूबी साकार करती है। जब उसका प्रेमी अपनी पत्नी को छोड़ देता है उसके बाद भी उसका पागलपन कम नहीं होता, और बाद में उसके अपराधबोध का कारण बनता है।

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भावनाओं की जिन श्रेणी से वह गुज़रती है, वह शायद उसे नैतिक रूप से श्रेष्ठ नहीं दर्शाती लेकिन वही बात निश्चित रूप से उसे मानवीय बनाती है। हम उसके व्यवहार को अनुमोदित नहीं कर सकते लेकिन निश्चित रूप से उसे समझ सकते हैं।

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