जब मैं एक डेट के लिए तैयार हुई और पति मुझे सब्ज़ी मंडी ले गए!

वो सब्ज़ियों की खरीदारी करने का शौकीन है

ये उन दिनों की बात है जब हमारी नयी नयी शादी हुई थी और मैं अपने पति के साथ उनके घर बैंगलोर पहुंची. मैं एक छोटे शहर से थी तो जब एक शाम पति ने कुछ रूमानी आवाज़ में कहा की चलो तैयार हो जाओ, बाहर चलते हैं, मेरे कल्पना के घोड़े तो सरपट दौड़ने लगे. “हम पिक्चर देखने जा रहे हैं या फिर एमजी रोड,” मैंने कौतूहलवश पुछा. एमजी रोड बैंगलोर की वो जगह हुआ करती थी जहाँ अक्सर युगल दम्पति और नव विवाहित जोड़े अपनी शामें बिताने आते थे. जवाब देने के बदले पति ने मुझे एक शरारती मुस्कान दी. मैं झटपट तैयार हो गई और जब हम घर के बाहर निकल रहे थे तब मैंने पति के हाथ में एक थैला देखा. मुझे लगा की शायद इस शहर में पुरुष अपने परिवार के साथ निकलते समय हाथ में थैला ले कर चलते होंगे. मुझे क्या पता था की मैं इतनी तैयार हो कर पति के साथ पास के सब्ज़ी मंडी जा रही थी.

जैसे ही मंडी में घुसे, मैंने देखा की सभी सब्ज़ी वाले मेरे पति को नमस्ते कर रहे थे. ऐसा लग रहा था की मेरे पति की गैरमौजूदगी उनलोगों को काफी खल रही थी. उन्हें क्या पता था की पति तो अपने लिए पत्नी लेने के लिए गए थे तो जब उन्होंने देखा की अब पति के साथ मैं भी हूँ, वो खुश हो गए. अब सब्ज़ियां एक के लिए नहीं, बल्कि दो लोगों के लिए ली जाएँगी.

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खाना उनकी रूह का हिस्सा था

मुझे थैला पकड़ा कर पति ने सब्ज़िओं की जांच पड़ताल शुरू कर दी और साथ ही सब्ज़ीवालों से गप भी कर रहे थे और आस पास की खबरें भी ले रहे थे. जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गए, सभी कोनों से सब्ज़ी और फल वालों की आवाज़ हमें बुलाने लगी. जल्दी ही हमारा थैला पूरा भर गया था. अब सब्ज़ियों के बाद बारी थी फलों की. उन दिनों हमारे घरों में फ्रिज नहीं था. मुझे क्या पता था की अब ये हमारी रोज़ की ज़िन्दगी का हिस्सा बनने वाला था. जैसे ही पति ऑफिस से वापस आते, वो किचन में घुसते और सब्ज़िओं और फलों की एक लिस्ट बना लेते और देखते की क्या क्या चीज़ें ख़त्म हो गई हैं.

खाना उनकी रूह का हिस्सा था
मुझे थैला पकड़ा कर पति ने सब्ज़िओं की जांच पड़ताल शुरू कर दी

अपनी शादी तक खाना बनाना मेरी ज़रुरत नहीं शौक था. अक्सर मैं किताब पड़ते हुए बड़ी शान से माँ के हाथ का स्वादिष्ट खाना खाती थी. मैं कभी उनसे ये तक नहीं पूछती थी की खाना बनाया कैसे है. और प्रशंसा? कभी नहीं. बस खुद का पेट भरना ही मेरा एक मात्र लक्ष्य रहता था. मुझे तो अंदाज़ा भी नहीं था की मैं एक ऐसे व्यक्ति से शादी करूंगी जिसके लिए खाना उसकी रूह का हिस्सा होगा.

वो मुझसे बेहतर खाना बनाते थे

मुझे लगता था की उनका शौक सिर्फ खाना खाना है. मगर मेरे पति ने मुझे गलत साबित कर दिया. मुझे जल्दी ही पता चल गया की वो बहुत ही शानदार खाना भी बनाते थे. उन्होंने मुझे कई तरह के सांभर, चटनी वगैरह बनाना सिखाया जिसके बारे में मुझे कभी पता भी नहीं था. मैं तो उत्तर भारत के एक शहर से आई थी और इस तरह के दक्षिणी व्यंजन बनाने मुझे नहीं आते थे. मुझे आज भी याद है की जब मैंने पहली बार इडली बनाई थी तो मेरे पति ने कहा था,”इडली तो बिलकुल पत्थर की तरह सख्त हैं. अगर तुम मुझसे नाराज़ होकर मुझ पर एक इडली फैंकोगी तो मुझे चोट लग सकती हैं. मगर फिर मेरी बात का विश्वास भी कौन करेगा?”

वो मुझसे बेहतर खाना बनाते थे
मुझे जल्दी ही पता चल गया की वो बहुत ही शानदार खाना भी बनाते थे

अगर तुम मुझसे नाराज़ होकर मुझ पर एक इडली फैंकोगी तो मुझे चोट लग सकती हैं. मगर फिर मेरी बात का विश्वास भी कौन करेगा?”

जब शुरू शुरू में पति मुझे मेरे खाने के लिए टिपण्णी करते थे तो मुझे बुरा लगता था. सफाई में पतिदेव कहते थी की वो तो मेरी कमियां इसलिए निकल रहे हैं ताकि मैं और बेहतर खाना बना सकूं. मगर जल्दी ही मैंने ये जान लिए की पाक कला में वो मुझसे कहीं बेहतर थे और मुझे उनकी बातें सुननी चाहिए थीं. मगर मैं अक्सर सोचती थी की आखिर मेरे पति को इतना अच्छा खाना बनाना आया कहाँ से.

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ये प्यार हॉस्टल के दिनों में शुरू हुआ

जब मैं अपने पति के दोस्तों से मिली, तब जा कर मेरे सामने राज़ खुले. उनसे पता चला की कैसे वो सब हॉस्टल का खाना पसंद करते थे और उनका कुक बाला कैसे उन्हें स्वादिष्ट खाने खिलाता था. बाला खुद हर किसी के पास जा कर ये देखता था की सबकी थाली में सब कुछ है की नहीं और हॉस्टल में रहने वाले छात्र रोज़ ही हॉस्टल पहुंच कर खाना का इंतज़ार करते थे. रविवार की शाम को बाला और बाकी रसोइयों की छुट्टी होती थी. उस दिन मेरे पति और उनके सभी दोस्त शहर भर में अच्छे होटल और रेस्टोरेंट ढूंढते थे.

तो इंजीनियरिंग की पढ़ाई के साथ साथ मेरे पति को अच्छे खाने का भी भरपूर ज्ञान मिल रहा था. शादी के पहले वो खुद ही खाना बनाते थे और कोशिश करते थे की उन्हें बाहर का खाना खाने की ज़रुरत न पड़े. अपने शौक के कारण उनका जीवन काफी आसान हो गया था. और फिर वो जहाँ भी जाते, उनके दोस्त हमेशा ही उनके आमंत्रण का इंतज़ार कर रहे होते थे.

मैंने अक्सर सुना है की किसी भी पुरुष के दिल तक पहुंचने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है. हमारे मामले में ये थोड़ा सा अलग है. मगर हाँ, इतने सालों तक साथ रहकर खाने के प्रति उनका उत्साह और प्रेम अब मुझमे भी आने लगा है.

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