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जब मैंने अपने ससुराल वालों को खुश करने की कोशिश करना बंद कर दी तो मैं अधिक खुश रहने लगी

वह अपने ससुराल वालों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी, और फिर उसे अहसास हुआ कि जैसे हो वैसे रहना और गलतियां करना ही बेहतर है।
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‘ससुराल वाले’ शब्द आपके गले में अटकी एक डली की तरह होगा और आप समझ नहीं पाएंगे कि उसे निगलें या उगलें। और मैं, मैं विशेष हूँ क्योंकि जहां अधिकांश लोगों के एक सास ससुर होते हैं, वहीं मेरे पास तीन-तीन सास ससुर हैं। पहले मेरे पति के माता-पिता, फिर उनके ताऊ और ताई और फिर अंत में दादा-दादी। मेरी स्थिति का अंदाज़ा लगाइयेः मैंने अपने सबसे अच्छे दोस्त को पति के रूप में चुना, उसके साथ होने के लिए अपना कैरियर त्याग दिया (मेरा स्वयं का फैसला था) और फिर भी हर सुबह मुझे मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना पड़ता था और यह साबित करना पड़ता था कि किस तरह मैं उनके बेटे के लिए सबसे अच्छा विकल्प हूँ और कैसे उनकी बहू बनने के योग्य हूँ।

यह एक प्रेम विवाह तो था ही, लेकिन यह एक अंतर्जातीय मिलन भी था, इसलिए हनीमून की अवधि में मैं अपने नए सरनेम की नई परंपराओं और जटिलताओं को गूगल कर रही थी। हर कोई चौबिस घंटे मेरा मूल्यांकन और विश्लेषण कर रहा था।

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एक अवधि जिससे मैं हमेशा डरा करती थी वह वर्ष में दो बार आया करती थी जब परिवार की वृद्ध पीढ़ी परिवार के देवता के सम्मान में एक सत्पाह लंबा उपवास रखती थी। मुझे हर बार उन्हें आश्वस्त करना पड़ता था कि मेरे हाथ धुले हुए हैं और हर मसाला, तैल, और नमक नए डिब्बों से लिया गया है, ना कि दैनिक उपयोग के सामान्य डिब्बों में से। एक शाम मैंने, क्या करना है और क्या नहीं की अपनी पूरी सूची देखी और गर्व से अपना बनाया गर्म और स्वादिष्ट भोजन प्रस्तुत किया। लेकिन मैं हैरान और निराश हो गई जब मेरी सास दुखी हो गई क्योंकि मैंने भोजन उसी कैसरोल में परोसा था जिसमें सुबह गेहूं की चपातियां रखी गई थीं, इसलिए मुझे भोजन उसमें नहीं परोसना चाहिए था।
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तब मुझे अहसास हुआ कि मुझे हर समय कोशिश करना बंद कर देना चाहिए। यह स्वस्थ और प्राकृतिक नहीं था।

धीरे-धीरे मैं वह करने लगी जो मेरे लिए स्वाभाविक था। गलतियां करना लेकिन उन्हें सुधारना भी।

कई बार मैं अपना आपा खो देती थी और स्थितियों पर ज़्यादा प्रतिक्रिया देती थी। एक बार मैं अपने पति के साथ उसकी खीझ उत्पन्न करने वाली आदतों पर तीव्र बहस कर रही थी और मेरी सास हमें शांत करने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उस क्षण के गुस्से में बह कर मैं उन पर भी भड़क गई और उनकी आंखों में आंसू आ गए। मुझे तुरंत इस बात का अहसास हुआ और मैंने अपने अहं को ताक पर रखकर तुरंत अपनी गलती स्वीकार ली। मेरे अफसोस व्यक्त करने से वह मेरे और करीब आ गईं। उन्होंने देखा कि मेरा अभिमान उनके साथ मेरे संबंध से बड़ा नहीं था। जहां उन्होंने मेरा गुस्से भरा रूप देखा, वहीं उन्होंने यह भी देखा कि मेरे लिए अपनी गलतियां स्वीकार करना आसान काम था।

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एक बार, मेरे ससुर जी हम पर गुस्सा हो गए थे क्योंकि हमें पार्टी से लौटने में देर हो गई थी और मुझे गुस्सा आया कि इसमें उन्हें क्या करना है। अगले कुछ दिनों तक मैं उदास रही और पहले की तरह हंसमुख नहीं थी। उन्होंने भी बात उन्हीं तक रखी और थोड़े समय बाद पूरा प्रकरण फीका पड़ गया। हालांकि मैं उनकी मनोदशा तब ही समझ पाई जब मैं स्वयं माँ बनी और मेरे बच्चे के स्कूल से लौटने में अगर 2 मिनट की भी देर हो जाती थी तो मैं पागल हो जाती थी। हालांकि वह प्रकरण लगभग तीन साल पुराना था, लेकिन हाल ही में मैं उनके साथ बैठी और अपना दिल खोल कर रख दिया। मैंने वह कहानी उनके साथ साझा की और स्वीकार किया कि अब मुझे अहसास हो गया है कि माता-पिता को उनके बच्चों की कितनी चिंता होती होगी भले ही वे कितने भी बड़े क्यों ना हो जाएं।

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मुझे बुरा अक्सर तभी लगता था जब मेरी सास नाराज़ हो जाती थी कि मैं उनकी परंपराओं को उतने अच्छे से नहीं समझती थी जितने अच्छे से उनकी बिरादरी की कोई लड़की समझती। मेरे माता-पिता और मुझे अपने रीति-रिवाज़ों के बारे में सिखाना उनका एक मिशन बन जाता था और भले ही दोनों परिवार एक ही समस्या को हल करने की कोशिश करते, लेकिन वे कभी समान नहीं माने जाते थे। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, हर अंधेरी रात के बाद सवेरा ज़रूर आता है।

मैंने कठिन कोशिश करनी बंद कर दी और वह करने लगी जो करना मुझे पंसद था। मैं अपने श्रेष्ठ व्यक्तित्व को गर्व के साथ प्रदर्शित करने लगी। मैं मज़ाकिया चुटकुले सुनाती थी और हर कोई दिल खोल कर हंस पड़ता था। मैं विशेष अवसरों पर परिवार को साथ में लाती थी, उन्हें कविताएं समर्पित करती थी और जन्मदिन और सालगिरह पर उनके लिए सरप्राईज़ आयोजित किया करती थी। मैंने इस नई दुनिया में अपनी रचनात्मकता दिखाने का फैसला लिया।

हर छोटी बात में अच्छाई देखने का प्रयास किया और सराहना करने के लिए किसी बड़े कार्य का इंतज़ार नहीं किया।

मैं अपने ससुराल वालों को अपने ही परिवार की तरह प्यार करने लगी और उनकी परवाह करने लगी। कुछ समय बाद वे मेरे साथ तालमेल स्थापित करने लगे, मुझे और मेरे कार्यों को समझने लगे। मेरी हंसी की सराहना करने लगे और अपने बच्चे की तरह मुझे डांटने लगे।

अगर हम उनके हर कार्य को एक ससुराल वाले के कार्य की तरह ना देखें तो चीज़ें आसान हो जाती हैं। हमारी स्पर्धा दूसरी बहुओं के साथ भी होती है, मेरे मामले में दो बहुओं के साथ। लेकिन फिर, हम सब का अपना स्थान है। हमारी अच्छाई और बुराई के साथ हमें स्वीकार किया जाता है। यह एक ऐसा खेल है जिसमें अंततः हमें अहसास होता है कि कोई खेल है ही नहीं। यह साबित करने के लिए कि वह एक अच्छा बेटा है मेरे पति को एक बुरा पति नहीं बनना पड़ता और इसके विपरीत भी। और यह साबित करने के लिए कि वे मेरे ससुराल वालों से ज़्यादा हैं, मुझे अनाज्ञाकारी बनने की ज़रूरत नहीं है।
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