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जब मैंने पति और उसकी प्रेमिका को मेरे बैडरूम में देखा

बचपन के दोस्तों ने शादी की. वो अपने पति की राय के बिना जीना ही नहीं जानती थी मगर फिर एक दिन उसने अपने आप को समेटा और एक नयी उड़ान भरी....

(जैसा प्रिय चेपाकार को बताया गया)

बचपन के साथी से जीवनसाथी तक का सफर

साहिल और मैं बचपन के साथी थे. हम स्कूल में एक दुसरे से प्रेम करने लगे थे, कॉलेज में हमने एक दुसरे से डेट किया, फिर अपने अपने परिवारों से लड़ झगड़ कर हमनें शादी कर ली. मगर हमारी ये बदकिस्मती ही थी की इतना कुछ हो कर भी हम ज़िन्दगी भर के साथी नहीं बन पाए.

हमारी प्रेमकथा तब शुरू हुई जब हम दोनों ही दसवीं में पड़ते थे. साहिल बहुत ही शरारती था और अक्सर स्कूल से छुट्टी ले लेता था और हमेशा ही बिलकुल आखिरी वक़्त में मुझसे नोट्स लेने के लिए पहुंच जाता था. अरे आंटी, नोट्स तो बस बहाना है. मैं तो आपके हाँथ के बेसन के लडडू खाने आता हूँ. आपका दामाद कितना खुशकिस्मत होगा,” वो हमेशा आँख मार कर मेरी मम्मी को ऐसे बोलते हुए दो लडडू अपने मुँह में भर लेता था. साथ ही दो और लडडू अपनी पॉकेट में भी रख लेता था. हमारे बोर्ड एग्जाम के बाद साहिल ने मुझे कॉफ़ी के लिए न्योता दिया. ये पहली बार था की कोई भी लड़का मुझे यूँ डेट पर बुला रहा था और मुझे नहीं पता था की ये आखिरी बार भी होगा. “मैं तुमसे शादी करूंगा,” उसने मेरा हाँथ पकड़ कर मुझे कह दिया.

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वो मुझे बताता की क्या मुझे पहनना है और क्या नहीं

हम किसी भी युगल जोड़े की तरह एक दुसरे से मिलने के मौके ढूँढ़ते रहते थे. कभी सीढ़ीओं के बीच मिल कर जल्दी से एक दुसरे को प्रेम पत्र दे देते और कभी बेशर्मों की तरह एक दुसरे को किस करते. वो cctvकैमरा का ज़माना नहीं था इसलिए हम पकडे नहीं जाते थे. साहिल मेरे लिए मेरी पूरी दुनिया था और मैं कुछ भी उसकी राय लिए बिना नहीं करती थी. मेरी ड्रेस के गले का डिज़ाइन कैसा हो से ले कर मेरे बाल कितने छोटे कटें, साहिल मुझे सब कुछ बताता था. “वो मत पहनों. उसका गला बहुत गहरा है,” “तुमने अपने बाल और छोटे कटाये तो मैं तुमसे बात नहीं करूंगा, “तुम वो यूनिसेक्स जिम में क्यों जाती है जबकि एक महिलाओं के लिए स्टूडियो पास में ही है?” वो मुझसे कुछ भी कहता और मैं चुपचाप उसकी सारी बातें सुनती और मानती थी.

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क्योंकि साहिल एक उच्च जाती से था, उसके परिवार वाले हमारी शादी के लिए तैयार नहीं थे. मगर साहिल ने घर में खाना बंद कर दिया और यहाँ तक की उसने परिवार से बातें करना भी बंद कर दिया. थक हार कर परिवार को मुझे स्वीकार करना ही पड़ा. हमारा दस साल का साथ और पांच साल की शादी पलक झपकते ही निकल गए. म्यूच्यूअल फण्ड के इश्तेहार में आने वाले जोड़ों की तरह हम दोनों जन्मदिन, सालगिरह, साथ मनाते, साथ ही घूमने जाते और हमारी ज़िन्दगी खुशहाल थी. और फिर उसके जीवन में वो आ गई.

जिम की कहानी शुरू हुई

साहिल की कभी कोई महिला मित्र नहीं थी. वो हमेशा अपने काम और अपने वर्कआउट में ही व्यस्त रहता था. मगर जनवरी २०१६ से वो कुछ ज़्यादा ही समय जिम में बिताने लगता था. वो सुबह छह बजे चला जाता था और वापस नौबजे से पहले नहीं आता था. एक दिन उत्सुकतावश मैं बेटे को स्कूल छोड़ने के बाद जिम  चली गई. वहां जो देखा उससे बहुत आश्चर्य हुआ. साहिल के लड़की को उसके स्ट्रेचेस में मदद कर रहा था. मैं गुस्से में आगबबूला हो गई और वापस घर आ गई. जब वो वापस आया, हमारी बहुत लड़ाई हुई. “मैं तो बस उसकी मदद कर रहा था सनिका. क्या तुम्हे मुझे पर बिलकुल  नहीं है. और वैसे भी जब मेरे पास तुम हो, तो मैं और किसी को क्यों देखूंगा? उसने मुझे अपनी बाहों में भरते हुए कहा. “हटो, तुम्हारे पास से बदबू आ रही है,” मैंने उसे बाथरूम की तरफ धक्का देते हुए कहा. शायद मैंने ही गलत समझा था, ये सोच कर मैंने वो बात वहीं ख़त्म कर दी.

शायद मैंने ही गलत समझा था, ये सोच कर मैंने वो बात वहीं ख़त्म कर दी.

दूसरी बार मुझे शक तब हुआ जब हम अपने दुबई ट्रिप से वापस आये. साहिल का फ़ोन पर सुबह के पांच बजे से मैसेज आ रहे थे. मैंने देखा तो मैसेज कुछ ऐसे थे — तुम उठ गए? मैं तुम्हारे घर के नीचे पिछले आधे घंटे से खड़ी हूँ. मुझसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा है.

फिर मैंने उसके फ़ोन बिल्स निकलवाए और उसके बदलते व्यवहार को करीब से देखने लगी. मेरा पति घंटों अपनी उस प्रेमिका से बातें करता था, किसी किसी दिन चार चार घंटे और घर देर से आता था. मुझसे भी अब वो कटा कटा रहता था.

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और फिर वो आखिरी धोखा

“शायद वो बस अच्छे दोस्त हों. मैं बेकार परेशां हो रही हूँ. वो मुझे प्रेम करता है और मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा,” मेरे दोस्तों ने मुझे समझाना शुरू किया. किसी ने कहा, “तुम उसकी दुनिया हो. तुम्हारे अलावा किसी और के पास जाने के बारे में वो सोच भी नहीं सकता है.”

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और फिर एक दिन मेरी दुनिया तहस नहस हो गई जब मैं घर अचानक पहुंच गई और साहिल और उसकी प्रेमिका को मेरे बिस्तर पर लेटे हुए देखा. पास की टेबल पर प्रेगनेंसी किट रखी थी जो पॉजिटिव थी. मुझे लगा की किसी ने मेरे पेट में बहुत ज़ोर से मुक्का मारा हो.

“मैं तुम्हे सब समझा दूंगा. तुम मुझ पर यकीन करो,” वो कहता रहा और मैं घृणा से उसे देखती रही.

अगले ही दिन मैं उस घर से निकल गई और मैंने अपने वकील मित्र को फ़ोन किया. मैं दुनिया के सामने अपने आप को मजबूत दिखाना था. मैंने कसम खा ली थी की मैं उसकी ज़िन्दगी नर्क बना दूँगी. मगर आपको सच बताऊँ तो मैं तार तार टूट रही थी. मुझे समझ ही नहीं रहा था की मैं साहिल के बिना कैसे जीऊँ। मैंने कभी उसके बिना कोई फैसला लिया था और उसकी हामी के बिना तो एक छोटी सी बात भी नहीं करती थी, और अब मुझे सारे फैसले लेने थे.

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वो मेरे लिए बहुत ही अंधकारमय वक़्त था

दिन लम्बे होते थे मगर रातें तो जैसे ख़त्म ही नहीं होती थीं. मैं हर वक़्त अपने पति और उसकी प्रेमिका के प्रेम प्रसंग के टुकड़े जोड़ती रहती थी. “वो कहाँ मिले होंगे?” “वो क्या बाते करते होंगे?””वो प्यार कैसे करते होंगे?” “क्या वो मुझसे बेहतर है?” अजीब था न मुझे ही धोखा मिला था और मैं ही अपनी कमियां गिन रही थी.

अजीब था न मुझे ही धोखा मिला था और मैं ही अपनी कमियां गिन रही थी.

कुछ रातें मन करता था की तुरंत ही उससे बदला ले लून. कोशिश किया की मैं भी दुसरे पुरुषों के साथ नयी मित्रता करूँ और उनसे फ्लिर्टी करूँ मगर मैं असफल रही. मैं उस दूसरी स्त्री को लम्बे लम्बे मेल लिखती थी मगर कभी भी उन्हें भेजने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी. “मैं उसे क्या बोलूं जब मेरा खुद का पति ही उसके साथ शारीरिक और भावनात्मक सम्बन्ध में था?”

सप्ताहंत तो मैं घर से बाहर भी नहीं निकलना चाहती थी, न खाती थी, न ही किसी का फ़ोन उठती थी. मगर हाँ, मुझे आज भी सोच कर अजीब लगता है की मैंने कभी आत्महत्या करने की क्यों नहीं सोचा. ईश्वर का धन्यवाद है की वो एक विचार मेरे मन में कभी नहीं आया.

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थेरेपी और समय ने मुझे उबारा

महीने बीतते गए और थेरेपी और समय ने धीरे धीरे मुझे हिम्मत दी. जब मैं रो चुकी थी, अपनी ज़िन्दगी को कोस चुकी थी, तब मैंने अपने ऊपर और समय देना शुरू कर दिया. उसके दिए ज़ख्म अब भी दर्द देते थे मगर मेरी उम्मीद से जल्दी वो ठीक भी हो रहे थे. मैंने मैराथन में दौड़ना शुरूकिया, पुरातन वाक में जाने लगी और विश्वास करिये, एक पोल डांस की क्लास भी लेने लगी. ऐसा लग रहा था की भगवन मुझे वो सारे साल वापस दे रहे थे जो मैंने साहिल के हिसाब से जीने में गवाए थे. अपनी नौकरी के सिलसिले में भी मैं अब अक्सर नयी नयी जगहों पर जाने लगी थी. अब मैं ऑफिसकर्मियों के साथ ज़यादा समय बिताने लगी थी क्योंकि अब मुझे रात के खाने की तैयारी करने की कोई टेंशन नहीं थी.

छह महीने बाद हम दोनों ऑफिशियली भी अलग हो गए थे. साहिल ने हर मुमकिन कोशिश की मुझे वापस लाने की. मगर मैंने ठान लिया था की मैं किसी भी कीमत पर उस अतीत को फिर नहीं दोहराऊंगी. एक कमज़ोर और पति पर पूरी तरह आश्रित पत्नी से बदल कर मैं एक स्वाभिमानी आत्मनिर्भर महिला बन गई थी जो ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती थी. और ताज़्ज़ुब ये था की मैं अब नए पुरुषों से मिलने को भी तैयार थी. मेरा समय शुरू हो गया था और मैं खुद के लिए खुश थी.

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