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जब मेरी मित्र एक विवाहित पुरुष के प्यार में पड़ी

लड़की को लगा की पुरुष गे है और पुरुष को लगा की लड़की लेस्बियन है. मगर दोनों ही स्ट्रैट थे और एक दुसरे के करीब आ रहे थे.
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(जैसा स्रोतरोपमा मुख़र्जी को बताया गया)

हम बस दोस्त बन गए
मैं ताउम्र एक फ्रीलांसर रही हूँ. आखिर बदलाव ही तो एक अकेला स्थिर तथ्य है, है न? मगर फ्रीलांसर होने में जो सबसे मुश्किल पहलु है वो है आर्थिक अस्थिरता। मेरी जमा पूंजी जल्दी जल्दी ख़त्म हो रहीथी और मुझे पैसों की सख्त ज़रुरत थी. इंदिरा की एक सहेली ने मेरी पहचान सयक से कराई. उसके पास काम था जो मुझे पसंद था,और मेरे पास कला उस काम को अंजाम देने के लिए. हम क्लिक कर गए.

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साथ काम करना

काम बहुत ज़्यादा था और उसमे कुछ भी सरल नहीं था. वो एक प्रतिलिपि और अनुवाद का काम था. इसमें समय कोडिंग जैसी चीज़ें ज़रूरी थी. हम अधिकांश विषयों पर बहस करते थे. फॉर्मेट कैसा होने चाहिए, प्रोग्राम क्या होना चाहिए वगैरह वगैरह. मगर एक बात तो तय थी की हम दोनों ही उस प्रोजेक्ट को सर्वोत्तम बनाना चाहते थे और ये बात जल्दी ही हमारी दोस्ती का कारण भी बनने लगी. हमें चार दिन और ४७ इमेल्स लगे एक दुसरे से इतना सहज होने में की हम एक दुसरे से व्हाट्सअप पर बात कर सकें. और बस सिलसिला वही से शुरू हुआ.

गलत पहचान

हम दोनों के बीच में करीब करीब १२ साल का अंतर था मगर फिर भी हम दोनों में बहुत कुछ समान था. सयक मेरी पसंद के संगीत से बहुत प्रभावित था और मुझे उसका साहित्य का ज्ञान बेजोड़ लगता था. हम एक दुसरे को चुनौतियां देते थे, एक दुसरे के साथ क्विज करते थे और हम जैसे लोगों के लिए ये गतिविधियां फ्लिर्टिंग से कम नहीं होती हैं. मगर हम दोनों के बीच एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी थी. मुझे लगा था की सयक इस समलैंगिक प्रोजेक्ट पर इसलिए इतनी जीतोड़ परिश्रम कर रहा है क्योंकि ये प्रोजेक्ट उसके दिल के बेहद करीब है. उसे लगा की मैं इतनी मेहनत इसलिए कर रही हूँ क्योंकि मैं लेस्बियन हूँ. हमने एक दुसरे से कभी इन बातों की पुष्टि नहीं की, बस ऐसे ही मान लिया की हमारी एक दुसरे को लेकर जो राय है, वो सही है. हम कभी अपराधबोध भी महसूस नहीं करते थे, बावजूद इसके की हम दोनों ही एक दुसरे की तरफ आकर्षित हो रहे थे. हमें यकीन था की इस आकर्षण का कोई भविष्य नहीं था.

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और फिर मैंने पूछ ही लिया

फ्लिर्टिंग की भी अपनी एक खासियत होती है. आपके भीतर तक वो आपको गुदगुदा देती है. मोबाइल में चाहे मैसेज आये या फिर कोई कॉल, जो दिल यूँ मुँह के पास आ जाता है, वो कुछ अलग सा ही एहसास होता है. वो तड़प की किसी भी परिस्थिति में कैसे भी जवाब देना है, शब्दों में समझाई नहीं जा सकती. हम दोनों एक दुसरे के पास खींचते चले जा रहे थे इस यकीन के साथ की इस खिचाव का कोई अंजाम नहीं होगा. मैं बात बेबात उसका हाँथ पकड़ लेती, वो मेरे और पास बैठने लगा, और उसके पास की गर्माहट मुझे सर्दियों में कैंप फायर सा सुकून देने लगी. फिर एक दिन मुझे उससे पूछना ही पड़ा, “क्या तुम गे हो?”

और बातें खुलने लगीं

उस एक सवाल से तो जैसे सवालों की झड़ी ही लग गई. हम दोनों को पता चला की हममें से कोई भी गे नहीं था और ये एक बहुत ही चौकाने वाला खुलासा था. जल्द ही हम अपनी अपनी निजी ज़िन्दगियों की भी बातें करने लगे. मैंने उसे बताया की मैं पिछले बारह साल से इंदिरा के साथ ओपन लिव इन सम्बन्ध में हूँ. उसने मुझे बताया की उसकी एक पत्नी और एक बेटी है. कहना न होगा की मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. मैं ओपन लिव इन में ज़रूर थी मगर मैं एक धोकेबाज़ नहीं थी. मैंने पक्का इरादा कर लिया की मैं इस शुरू होते रिश्ते से बाहर निकल जाऊँगी, मगर मैंने ऐसा नहीं किया. मैंने खुद को समझाया की ये सब नहीं कर सकती क्योंकि मैं एक प्रोजेक्ट से जुडी हूँ और मुमकिन नहीं होगा. मगर क्या सचमुच ऐसा ही था?

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उसने मुझे बताया की किस तरह उसने और उसकी पत्नी ने कब से एक दुसरे से कोई सम्बन्ध नहीं बनाये हैं और वो उस विवाह में सिर्फ अपनी बेटी के लिए ही है. मैं उसकी बातों से कन्विंस हो गई, शायद इसलिए क्योंकि मैं हर हाल में उसकी बातें मानना चाहती थी. इस रिश्ते को राज़ रखने की ललक मुझे बहुत उत्तेजित कर रही थी.

हम करीब आने लगे

बहरहाल मैं उसके लिए काम करती रही. वो कभी कभी मुझे कोई गिफ्ट भेज देता था. कभी अपनी पसंदीदा किताब तो कभी डार्क चॉकलेट सी साल्ट वाली. जब हम कॉफ़ी के लिए मिलते, उसे हमेशा मेरी पसंद याद रहती थी और हम सारा सारा दिन बातें करते गुज़र देते थे. हम शहर में लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाते, गाडी की पिछली सीट पर सेक्स करते, और वो मुझे बेहतरीन प्रॉमिस करता.

मैं उसपर विश्वास करती थी क्योंकि मैं ऐसा करना चाहती थी मगर अब मुझे ये गुपचुप रिश्ता थोड़ा खटकने भी लगा था.

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जब मैं उसके परिवार से मिली

वो किसी की गलती का नतीजा नहीं था. मैं कोई नादान बच्ची न थी और न ही वो कोई शातिर बॉस. मगर हाँ मैंने आँखें बंद करके इस रिश्ते को आगे बढ़ाया था. सप्ताहांत सबसे दुखदाई होते थे. हमने ये रूल बनाया था की इन दो दिन हम एक दुसरे को कोई फ़ोन या मैसेज नहीं करेंगे. उसने मुझसे कहा था की वो दिन उसकी बेटी के लिए हैं. मैं खुद एक बिखरे परिवार से हूँ और मैं किसी भी हाल में किसी और का बचपन तबाह नहीं होने दे सकती थी. मगर ये शर्त मुझे अंदर अंदर खा रही थी.

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एक दिन अचानक एक रविवार को मैंने एक रेस्तौरां में उसे देखा. वो दूर से देखने में एक बिलकुल सामान्य खुशहाल परिवार लग रहे थे. मेरे अंदर कुछ बुरी तरह से टूटने लगा. मैं उनकी टेबल पर गई और उनसे हेलो करा. उसने अपनी पत्नी को बताया हुआ था की मैं एक लेस्बियन हूँ और मेरी एक गर्लफ्रेंड भी है. मैं भी उसके इस खेल में साथ देने लगी.

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मुझे पता है की आज नहीं तो कल वो अपने इस परिवार को नष्ट कर देगा मगर मेरा ज़मीर इस गुनाह की ज़िम्मेदारीलेने को तैयार नहीं. इसलिए मैंने अपनी वो नौकरी छोड़ दी और उससे फिर कभी बात नहीं की. मगर आज भी मैं अपने मन से एक विवाहेतर सम्बन्ध में होने की बात के लिए अपराधबोट महसूस करती हूँ.

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