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जब मुझे उसकी “परफेक्ट” ज़िन्दगी का सच पता चला

उसे देख कर तो लगता था की वो एक आदर्श जीवन जी रही थी. मगर फिर पता चला की उसकी सेक्स लाइफ तो बिलकुल ना के बराबर थी
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मैंने एक आईटी कंपनी में फ्रीलांसर की तरह काम शुरू किया. वही मेरी मुलाकात प्रियंका से हुई. प्रियंका उस कंपनी के एचआर में कार्यरत थी. हम जल्दी से दोस्त बन गये जब हमें पता चला की हम दोनों एक ही दिन एक ही हॉस्पिटल में पैदा हुए थे. प्रियंका को देख कर लगता था की वो सब कुछ बिलकुल सही करती थी और उसकी ज़िन्दगी में कुछ भी गलत नहीं था. उसकी ज़िन्दगी आसान और सरल लगती थी. पढ़ने लिखने में प्रियंका औसत थी, उसने एमबीए किया, कैंपस से ही नौकरी मिल गई, शादी के लिए उसने पैसे जोड़े, शादी की और अब उसका एक बच्चा भी है. उसकी ज़िन्दगी मुझे आदर्श लगती थी मगर पता नहीं क्यों वो फिर भी उदास दिखती थी.

वो अक्सर मुझसे और मेरे जीवन से ईर्ष्या करती थी और कभी मैंने उसे कुछ अच्छी बात कहते नहीं सुना था. वैसे तो वो कभी इस बात को मानने से इंकार करती थी मगर साफ़ था की उसे मेरी खुशियों से जलन थी. फिर एक दिन वो फूटफूट कर रोने लगी और उसने मुझे अपने जीवन की असलियत बताई.
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(जैसा स्तोत्रोपामा मुख़र्जी को बताया गया)

मेरी ज़िन्दगी में सब कुछ बहुत साधारण था

मैं हमेशा ही एक औसतन लड़की रही हूँ. न मुझमे कोई टैलेंट था न कोई एक्स्ट्रा चमक मगर फिर भी मैं हर जगह फिट हो ही जाती थी. मेरे जीवन की चुनाव से मेरे माता पिता भी मुझसे खुश हैं. मेरे पास नौकरी है, मेरा एक बच्चा भी है मगर फिर भी एक खालीपन है जो मुझे सालता रहता है. ऐसा लगता है मानो मैं ज़िन्दगी एक फ़र्ज़ की तरह निभा रही हूँ. मैं अपने लिए क्या कर रही थी? और अपनी बेटी के बारे में क्या कहूँ. कभी कभी लगता है मानो मैं किसी और के बच्चे को पाल रही हूँ. मेरे पति को भी मुझमे कोई दिलचस्पी नहीं है. वो मेरे पास सिर्फ तब ही आता है जब वो दुसरे बच्चे की बात करता है. कभी कभी अपनी ज़िन्दगी देखकर मैं सोचती हूँ की क्या सच में मैंहमेशा से इतनी ही साधारण और बेचारी थी? क्या कभी भी मेरे अंदर कोई विद्रोहीभावना नहीं आई? क्या कभी किसी बात के लिए मैंने आवाज़ नहीं उठाई?

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जब मुझे पहला प्यार हुआ

मुझे विद्रोह के बारे में तो नहीं पता मगर मैं आपको एक रोमांचक अनुभव के बारे में ज़रूर बता सकती हूँ. जब मैंने किशोरावस्था में कदम रखा तो मुझे प्यार हो गया. वो मेरा दूर के रिश्ते का कजिन था जो हमारे शहर ट्रांसफर होकर आ गया था. मैं बारह साल की थी और उसे देख कर मोहित हो गई थी. हम एक साथ अपनी छुट्टियां बिताते, फिल्में देखते, करीब करीब सब कुछ साथ ही करते थे. किसी को नहीं पता मगर हम दोनों एक दुसरे के पहले किस थे. उसके इस साथ के कारण मैं खुद में और दिलचस्पी लेने लगी, और मुझे कला और संगीत में रूचि होने लगी. मैंने अपने माता पिता से कहा की मुझे डांस सीखना है. ये बात सुनते ही उन दोनों ने साफ़ कह दिया की मुझे बिमल से अपनी दोस्ती ख़त्म करनी होगी क्योंकि वो मेरे लिए बुरा प्रभाव है. और बस सब कुछ ख़त्म हो गया.

मैंने शादी अपने माँ बाप को खुश करने के लिए की

मुझे भलीभांति पता था की मेरे माँ बाप मेरी शादी किस तरह के लड़के से करना चाहते हैं. वो मेरी ही जाती का होना चाहिए, मुझसे उम्र में कुछ साल बड़ा, अपने करियर में सफल और एक अच्छे परिवार का होना चाहिए था. कुणाल बिलकुल वैसे ही था. हमने करीब करीब आठ महीने डेट किया। मेरे परिवार को वो पसंद था. तो जब एक हीरे के लॉकेट के साथ उसने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा, मेरे पास मना करने का कोई कारण नहीं था. हमारी शादी बहुत धूमधाम और आलिशान अंदाज़ में हुई. मगर शादी के कुछ ही महीनों के अंदर मैं समझ गई की मैं एक पिंजरे से निकल कर दुसरे पिंजरे में कैद हो गई थी. मेरी अपनी न कोई पहचान थी, न कोई आवाज़. सब कुछ मेरे लिए मेरे फायदे को सोचकर तय कर दिया जाता था.

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अगर ये बात अभी तक भी स्पष्ट नहीं है तो बताना चाहूंगी की मैं अपनी ज़िन्दगी से खुश नहीं हूँ.

मुझे अपनी नौकरी से कोई लगाव नहीं है. मेरी बेटी के लिए मैं ज़्यादा महत्त्व नहीं रखती, और शादीशुदा ज़िन्दगी में सेक्स के बारे में कुछ न ही कहूँ तो बेहतर है.

मेरी ज़िन्दगी में बिमल वापस आया

मुझे अपनी ज़िन्दगी के खालीपन का कोई अंदाज़ा नहीं होता अगर बिमल फिर से मेरी ज़िन्दगी में वापस न आता. बिमल ने आते ही कई रंगों से मानो मुझे तर कर दिया और कई नए रोमाँचों के सपने दिखने लगा. उसने मुझे हम दोनों के पुराने दिन फिर से याद दिलाये, वो दिन जो मैं कब की भूल चुकी थी. हम फिर से मिलने लगे और मुझे भेजने में किसी को कोई एतराज़ नहीं था क्योंकि वो मेरा रिश्तेदार था. हम एक दुसरे के करीब आ रहे थे, अंधरे हॉल में फिल्म देखते हुए एक दुसरे के हाथ पकड़ लेते, कार में जल्दी से एक किस कर देते, साथ सिगरेट पीते और मैं फिर से जीने लगी. ज़िन्दगी अच्छी लगने लगी और मैं खुश रहने लगी. एक बार फिर खुद को सुन्दर कहने लगी मैं और अब मुझे बिमल के करीब रहने के अलावा कुछ नहीं सूझता था.

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एक बात बताना तो मैं भूल ही गई. बिमल शहर अकेले नहीं आया था. वो वापस अपनी पत्नी और बच्चे के साथ आया था. उसकी पत्नी नौकरी करती थी और बिमल को उससे ये एक चिढ़ थी. अब मुझे पता चला की उसे अपनी पत्नी की नौकरी से शिकायत क्यों थी. वो बिमल से ज़्यादा कमाती थी और ये उसे अपमानजनक लगता था. वो शहर वापस आया था क्योंकि उसकी पत्नी की तरक्की और इस शहर में तबादला हो गया था. बिमल को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी थी और अब वो इस शहर में एक नयी नौकरी की तलाश में था. मैं उसकी ज़िन्दगी का रोमांच थी शायद। उसे अपनी पत्नी से नफरत थी की उसके कारण उसकी नौकरी छूट गई मगर साथ ही शुक्रगुज़ार भी था की वो अब इस शहर में था.

वो मेरा इस्तेमाल कर रहा था

जल्दी ही मेरी समझ में आने लगा की वो पूरी तरह से अपनी पत्नी के शिकंजे में था और उसे वैसे ही रहना पसंद था. जैसे ही उसकी नौकरी शुरू हुई, वो मेरे साथ कम से कम समय बिताने लगा. वो सिर्फ अँधेरी रातों में किसी कोने में कार खड़ी कर मुझसे सेक्स करने में ही दिलचस्पी लेता था. मुझे भी इससे कोई आपत्ति नहीं थी, मगर मैं कभी किसी छोटे से होटल में ही सही, जाकर उसके साथ रात बिताना चाहती थी. मगर वो इसके लिए तैयार नहीं था. होता भी कैसे, उसके मन में अपनी पत्नी का खौफ इस कदर भरा था की वो ऐसा कदम उठा नहीं सकता था. और फिर मुझे समझ आने लगा की मुझे ही ये सिलसिला यहीं ख़त्म करना होगा क्योंकि अपनी पत्नी से बदला लेने के लिए ही बस मेरा इस्तेमाल कर रहा है. और इस तरह मेरा पहला विवाहेतर सम्बन्ध ख़त्म हुआ.

तो देखा न आपने, आखिर इतनी परफेक्ट भी नहीं थी मेरीज़िन्दगी.
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