जब तुच्छ स्त्रियां अपने स्वार्थी उद्देश्यों के लिए कानून का दुरूपयोग करती हैं

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स्त्रियां आज से कुछ दशकों पहले की तुलना में कहीं बेहतर जगह पर हैं। बोर्डरूम से लेकर बेडरूम तक, ज़्यादातर भारतीय महिलाओं को पता है कि वे क्या चाहती हैं और इसे कैसे प्राप्त करना है। भारतीय संविधान में 33 कानून शामिल हैं जो भारतीय महिलाओं की किसी भी परिस्थिति में शोषण के खिलाफ सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। यह सभी गैर सरकारी संगठनों के लिए एक वास्तविक मनोबल वृद्ध प्रदान करता है जिसने वर्षों से अनगिनत महिलाओं की मदद की है। लेकिन जैसे कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, सभी महिलाएं पीड़ित नहीं होती हैं। कुछ तुच्छ महिलाएं अपने तुच्छ उद्देश्यों के लिए कानून का दुरूपयोग करती हैं।

पुरूषों के खिलाफ पूर्वागह के साथ, भारतीय महिलाओं द्वारा कानून का दुरूपयोग किए जाने के कुछ भयावह मामले

मैं टीवी धारावाहिकों या फिल्मों के कुछ दृश्य देखकर घबरा जाती थी जिसमें खलनायिका अनैतिकता की सभी सीमओं को पार कर देती थी, लेकिन यह निश्चित था कि यह अत्यधिक नाटकीय निराशावाद केवल पर्दे के लिए ही था। हालांकि, मेरी यह गलतफहमी दूर हो गई जब मैंने कुछ भयानक मामलों को देखा। विलियम कंग्रेव का प्रसिद्ध क्वोट ‘‘नर्क का कोई प्रकोप एक तुच्छ स्त्री जितना भयावह नहीं है” ऐसे मामलों में बहुत उपयुक्त है जहां पुरूषों पर झूठा आरोप लगाया जाता है।

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भारतीय महिलाओं द्वारा कानून का दुरूपयोग किए जाने के कुछ भयावह मामले

प्रकरण 1: भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए का दुरूपयोग

यह कानून दहेज के संबंध में विवाहित महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न को खत्म करने के लागू किया गया था। यद्यपि यह कानून महिलाओं को सशक्त करने वाला है, यह कानून पति और उसके ससुराल वालों के प्रति अनुचित हो सकता है, क्योंकि यह किसी सबूत की मांग नहीं करता है। नतीजतन, नियमित आधार पर पंजीकृत झूठे उत्पीड़न के मामलों में काफी वृद्धि हुई है, जिससे पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट को तत्काल कार्यवाही करनी पड़ी थी।

दायर किए गए 93 प्रतिशत आरोपपत्रों में से सिर्फ 14.4 प्रतिशत ही दोषी पाए गए थे। 2012 में, आईपीसी धारा 498 के तहत पंजीकृत मामलों की संख्या 3,72,706 थी, जिसमें से 3,17,000 मामलों की भारी संख्या को बरी कर दिया गया था।

2012 में, आईपीसी धारा 498 के तहत पंजीकृत मामलों की संख्या 3,72,706 थी, जिसमें से 3,17,000 मामलों की भारी संख्या को बरी कर दिया गया था।

सर्वोच्च न्यायालय को कानून के इस गलत दुरूपयोग को रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी करना पड़ा। उस दिशानिर्देश के मुताबिक, परिवार कल्याण समिति के नामित अधिकारी द्वारा मामले के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने तक कोई गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

उम्मीद है कि यह उन अनभिज्ञ वृद्ध जोड़ों को थोड़ी राहत प्रदान करेगा जिन्हें उनकी बहू किसी भी सबूत के बिना पुलिस स्टेशन में ले जा सकती थी।

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प्रकरण 2: भारतीय दंड संहिता की धारा 354 का दुरूपयोग

अपनी उपधाराओं के साथ यह धारा 354 किसी भी तरह के यौन उत्पीड़न, हमले से बचाने के लिए या फिर अपमान, दर्शनरति और स्टॉकिंग के इरादे से महिला के प्रति अपराधिक बल के उपयोग से बचाने के लिए लागू किया गया था। हर दिन हम इस तरह के कई मामलों के बारे में पढ़ते हैं और ट्रायल शुरू होने से पहले ही महिला के पक्ष में अपना पक्षपातपूर्ण फैसला सुना देते हैं। मैंने व्यक्तिगत तौर पर कुछ महिलाओं को इस कानून का दुरूपयोग करते देखा है।

मेरी सहेली के 60 वर्षीय पिता एक दिन पत्ते की तरह लड़खड़ाते हुए घर लौटे। हम उनकी तरफ दौड़े, हमने बाहर एक कॉन्सटेबल को इंतज़ार करते देखा। हैरानी की बात है कि कॉन्सटेबल ने बहुत ही आश्वस्त स्वर के साथ स्थिति की व्याख्या की।

अंकल की कार एक दूसरी कार के साथ टकरा गई थी जिसकी ड्राइवर एक लड़की थी और उसके साथ एक सहेली भी थी। यह स्पष्ट रूप से लड़की की गलती थी क्योंकि सभी खरोंचे अंकल की कार की बांई तरफ से थी। ज़ाहिर है कि लड़कियां बांई ओर से ओवरटेक कर रही थी, लेकिन दृर्घटना के बाद उन्होंने अंकल से बहस की जो अब भी कार में ही बैठे थे। जब यातायात पुलिस आई, तो लड़कियां यह कह कर रोने लगीं कि अंकल उन्हें भद्दे ईशारे कर रहे थे इसलिए उन्होंने उनका पीछा किया। एक ही पल के भीतर एक साधारण कार दुर्घटना एक गंभीर यौन अपराध बन गया। मेरी सहेली जल्द ही उसके पिता और उनकी छवि पर लगे आघात को कम करना चाहती थी, इसलिए उसने उन लड़कियों की मांग मान ली और मामले को वापस लेने के लिए उन्हें 20,000 रूपए दे दिए।

यौन उत्पीड़न एक बहुत ही गंभीर अपराध है जिसमें 3 साल का कारावास और जुर्माना हो सकता है, लेकिन जब किसी पुरूष को इस अपराध का झूठा दोषी ठहराया जाता है, तो वह और उसका परिवार बहुत बड़ी कीमत चुकाता है।

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प्रकरण 3: 1956 के हिंदु उत्तराधिकार अधिनियम का दुरूपयोग

यह कानून पति की मृत्यु के बाद पत्नी की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है। इस कानून के मुताबिक, अगर पति वसीयत बनाए बगैर मर जाता है, तो उसकी पत्नी, माँ और बच्चे उसकी संपत्ति के वारिस हो सकते हैं। पिता सहित परिवार का कोई भी अन्य सदस्य सिर्फ अपनी पत्नी, माँ और बच्चों की अनुपस्थिति में संपत्ति के हकदार हैं।

भले ही यह अजीब लगे लेकिन कभी-कभी प्रतिशोधी महिलाओं द्वारा इस कानून का दुरूपयोग किया जाता है। वकील सोनल सेठिया के अनुसार, बार काउंसिल ज्वॉइन करने के बाद अदालत में उनका पहला दिन बहुत ज़बरदस्त था। उसके सीनियर ने उसका परिचय श्री राव से करवाया जिन्होंने अपनी पत्नी द्वारा छोड़ कर चले जाने के बाद अपने बेटे को अकेले पाला था। वर्षों बाद, जब आकस्मिक रूप से उनके बेटे का निधन हो गया, तो वह बेटे की संपत्ति लेने के लिए फिर से आ गई। इस कानून द्वारा प्रदान की गई स्वतंत्रता के कारण उसने इस तरह का मामला दर्ज करने का दुस्साहस किया। मामला एक साल तक चला और श्री राव की दुःखद मृत्यु के बाद समाप्त हो गया।

प्रकरण 4: 1954 के विशेष विवाह अधिनियम की धारा 37 का दुरूपयोग

यह कानून भी महिलाओं का पक्ष लेता है और 1954 के विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाहित पुरूषों के खिलाफ स्पष्ट रूप से भेदभाव करता है। इस कानून के अनुसार, एक पुरूष उसकी विरक्त पत्नी को जीवनभर रखरखाव या फिर एक बार का निर्वाह धन देने का उत्तरदायी है, भले ही पत्नी की आर्थिक स्थिति कैसी भी हो।

असम में एक पारिवारिक अदालत ने घरेलू हिंसा के आधार पर, एक पुरूष को छह महीने के भीतर अपनी पत्नी को एक करोड़ रूपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। न्यायाधीश ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाया कि पति सिर्फ इसलिए रखरखाव के लिए पत्नी के दावे की उपेक्षा नहीं कर सकता क्योंकि पत्नी सुशिक्षित है या फिर अपने पिता द्वारा समर्थित है। भले ही पति की बेगुनाही साबित करने के लिए कुछ गवाह थे, लेकिन पत्नी के शरीर पर कुछ स्वयं द्वारा पहुंचाई गई चोट ने घरेलू हिंसा साबित कर गवाहों के विरूद्ध निर्णय दे दिया। जब तक पत्नी ने दुबारा शादी नहीं कर ली और फिर से वही पैंतरे नहीं आज़माए, किसी ने भी उसपर संदेह नहीं किया। तथाकथित ‘पीड़ित’ पत्नियों द्वारा इस कानून का दुरूपयोग कैसे किया जा रहा है इसकी सूची अंतहीन है।

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पत्नियों द्वारा इस कानून का दुरूपयोग कैसे किया जा रहा है इसकी सूची अंतहीन है।

प्रकरण 5: भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी का दुरूपयोग

यह कानून दहेज से संबंधित मृत्युओं के खतरे को रोकने के लिए लागू किया गया था। इस कानून के अनुसार, पति या पति के रिश्तेदार पर पत्नी की मृत्यु का मुकदमा चलाया जा सकता है अगर विवाह के सात साल के भीतर उसकी मृत्यु जलने या किसी अन्य शारीरिक चोट के कारण होती है। अगर किसी भी तरह से घर में आग लगती है, तो पत्नी अपने पति के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने का प्रयास कर सकती है अगर वह इस कानून का दुरूपयोग करने का फैसला कर लेती है तो।

प्रकरण 6: भारतीय दंड संहिता की धारा 497 का दुरूपयोग

यह कानून शादी की पवित्रता बनाए रखने के लिए महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए लागू किया गया था। इस कानून के अनुसार, अगर पति व्यभिचार करता है तो उसपर मुकदमा चलाया जा सकता है। हालांकि पत्नियों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि कुछ महिलाएं जो अपनी शादी तोड़ना चाहती है, वे अपने पति की झूठी बेवफाई को साबित करने की सीमा तक जाती हैं।

प्रकरण 7: भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में सूचीबद्ध चौथी और छठी स्थिति का दुरूपयोग

आईपीसी धारा 375 बलात्कार के संबंध में कानूनों को संदर्भित करती है। महिलाएं सदियों से कठोर बलात्कार कानूनों के लिए लड़ रही है। फिर भी, कुछ स्वच्छंद महिलाएं ऐसे निम्न स्तर पर गिर जाती है और नकली बलात्कार का मामला दर्ज कर देती हैं जो लगभग एक पुरूष की पूरी ज़िंदगी बर्बाद कर देता है।

इस खंड के बिंदु 4 के मुताबिक, एक पुरूष प्री मेरिटल सेक्स के बाद रिश्ते से बाहर नहीं जा सकता है। अगर वह स्त्री से शादी करने का अपना वादा निभाने में विफल रहता है तो महिला उस पर बलात्कार का आरोप लगा सकती है।

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रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

इस खंड के बिंदु 6 के मुताबिक, कोई भी स्त्री जिसने नाबालिग लड़के के साथ सहमत सेक्स किया है, उसे बलात्कारी कह सकती है और मामला दर्ज कर सकती है, अगर वह चाहे तो।

इस कानून का सबसे हालिया दुरूपयोग रामपुर, उत्तरप्रदेश की गैंग रेप पीड़िता का मामला था। लड़की जो एक गैंग रेप मामला दर्ज करवाने आई थी, उसने आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारी ने उससे सेक्सुअल फेवर्स की मांग की थी। उसके पास सीडी है जिसमें उसकी और पुलिस अफसर की बातचीत रिकॉर्ड है जिसे उसने सबूत के तौर पर प्रस्तुत किया। हालांकि, इस बार यूपी पुलिस ने मामला जल्द ही सुलझा लिया। स्पष्ट रूप से, लड़की ने अधिकारी को फंसाया था क्योंकि उसने पिछले गैंग रेप के झूठे मामले में लड़की की गलती पकड़ ली थी। यूपी पुलिस ट्विटर हैंडल ने इन आरोपों को स्पष्ट किया।

यह बहुत निराशाजनक है कि कुछ महिलाएं, स्त्रियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों के सभी संघर्षों को नगण्य कर देती हैं। यह हर समय महफूज़ रहने में मदद करता है भले ही आप किसी भी लिंग के हों।

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