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जब उसने अपने ससुराल वालों से बात करने का फैसला लिया

एक अप्रत्याशित स्त्रोत से सहयोग और प्रेरणा ने उसे अपने ससुराल वालों की अन्यायपूर्ण टिप्पणियों के खिलाफ बोलने का साहस दिया।
woman and her mother fighting

जब पत्नी को अपने ससुराल वालों के प्रति विनम्र होने के लिए कहा गया

“वे एक घंटे में आ रहे हैं। प्लीज़ मेरे घर वालों से बात करते समय सावधानी बरतना,’’ रोहित परेशान लग रहा था।

सनाया ने कुशन ठीक करते हुए एक फीकी सी मुस्कान दी।

“नहीं, मैं सच कह रहा हूँ,’’ उसने ज़ोर देकर कहा।

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उसने आई कौंटेक्ट करने के लिए कुशन को अलग हटा दिया। ‘‘मेरे भी माता-पिता हैं। मेरी परवरिश ने मुझे अपमानजनक होना नहीं सिखाया है, विशेष रूप से बुज़ुर्गों के प्रति। तो घबराओ मत।”

उसकी चढ़ी हुई त्योंरियों को ठीक करने के लिए उसने कहा, ‘‘मुझे पता है कि तुम क्या कहना चाहते हो। मैं संभाल लूंगी।”

जब रोहित अपने माता-पिता को लेने के लिए एयरपोर्ट पहुंचा, सनाया ने मटर पनीर को हिलाया और खुश्बू से उसे पता चला कि वह बिल्कुल ठीक बना है। उसने अपनी नौकरानी से कहा कि किचन जल्दी साफ कर दे और उसने अपने घर पर एक अंतिम नज़र दौड़ाई। सब कुछ अच्छा दिख रहा था और उसे अच्छा महसूस हुआ। जब उसने अपनी शादी की फोटो को साइड टेबल पर एडजस्ट किया, उसे अपनी शादी के दो साल याद आ गए।

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विपरीत विचार

पूरा समय हमेशा अच्छे से नहीं बीता है। ऐसे भी दिन थे जब काफी समस्याएं आईं लेकिन फिर अंततः सब ठीक हो जाता था। खैर, समस्याएं वापस आ रही थीं। उसके ससुराल वाले आ रहे थे। सनाया और उसके माता पिता के जीवन के प्रति राय, दृष्टिकोण और विचार अलग थे। सनाया भविष्य को समर्पित लड़की थी जबकि उसके ससुराल वाले अतीत से बंधे थे। एकमात्र चीज़ जो उन्हें बांधे हुए थी वह था रोहित।

“इस बार यह अलग होगा। मैं उनके मामलों में दखल नहीं दूंगी,’’ उसने खुद से वादा किया। कार के हॉर्न से उसे संकेत मिला कि वह चाय के लिए गैस पर पानी चढ़ा दे। बैठने और नमस्कार के आदान-प्रदान के बाद सामान्य ड्रिल शुरू हो गई।

रोहित के पिता ने पूछा ‘‘तो चीज़ें कैसी चल रही है?’’

“बहुत अच्छी। मेरा हाल ही में प्रमोशन हुआ है। यह बहुत समय और परिश्रम मांगता है लेकिन फल भी बहुत अच्छा मिलता है।”

नौकरी तो ठीक है लेकिन घर का क्या?

“मैंने तुम्हें रोटी बनाने के लिए नया तवा दिया था ना? क्या तुमने इस्तेमाल कर के देखा?’’ उसकी सास ने घर के कामों को प्राथमिकता देकर जल्द ही प्रमोशन के बारे में उसके उत्साह को ठंडा कर दिया।

“नहीं, मैंने अभी नहीं किया है।”

“यह तब उसे इस्तेमाल करेगी ना जब यह किचन में जाएगी।” उसके ससुर की कठोर टिप्पणी ने उसे चोट पहुंचाई लेकिन उसने अपना मुंह बंद रखा।

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जब सनाया ने अपनी नज़रें उठाईं, रोहित चाय के मग में नज़रें गढ़ाए था। इस डिसकनेक्ट ने उसे तानों से ज़्यादा दुख दिया।

“मैं अभी वापस आई,’’ किचन की ओर भागते हुए सनाया के मुंह से ये शब्द निकले। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसने पूरा दिन खड़े होकर उन लोगों के लिए खाना बनाया था। उसका चेहरा और शरीर दोनों बिखर गए थे। वह फिर से संभलने के लिए किचन काउंटर पर झुक गई।

जब मैं लड़ सकती हूँ तो आप क्यों नहीं?

“दीदी, सुनोगी तो सुनाई जाओगी। मेरे पास कुछ नहीं है, फिर भी मैं हर दिन अपने शराबी पति से लड़़ती हूँ। मैं सच के लिए आवाज़ उठाती हूँ। आपको आवाज़ उठाने से कौन सी चीज़ रोकती है?’’ लक्ष्मी ने सनाया के कंधे पर हाथ रखा और तुरंत एक कनेक्शन बन गया। कभी-कभी जिन लोगों से आपको उम्मीद नहीं होती, वे ही आपको सबसे अच्छी सलाह दे देते हैं।

डिनर परोसा जा चुका था और हर कोई अपनी जगह पर बैठ चुका था। लक्ष्मी उन्हें रोटियां परोसती रही, और जब उनका खाना खत्म होने वाला था, सनाया ने कहा, ‘‘लक्ष्मी, अब तुम जाकर खाना खा लो।” लक्ष्मी ने सिर हिलाया और किचन में चली गई।

उसकी सास ने धीरे से पूछा ‘‘इसका वेतन कितना है?’’

“रहने और खाने के साथ 8,000’’ रोहित ने जबाव दिया।

“हे भगवान। मैं जानता हूँ कि तुम अच्छा कमाती हो, लेकिन तुम बहुत पैसे बर्बाद करती हो,’’ ससुर ने कहा।

“पापा पूरे समय की नौकरानी का यही रेट है। वह अपना काम बहुत अच्छे से करती है,’’ रोहित ने समझाने की कोशिश की।

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“तुम्हें पूरे समय के लिए क्यों चाहिए? अगर एक औरत योग्य है तो वह घर और नौकरी दोनों संभाल सकती है।”

“तुम्हें पूरे समय के लिए क्यों चाहिए? अगर एक औरत योग्य है तो वह घर और नौकरी दोनों संभाल सकती है।”

उनकी नज़र में जजमेंट भरा था।

उसने बात करने का फैसला लिया

“और आप योग्यता को केसे परिभाषित करते हैं पापा?’’ सनाया की टोन ने सबको चौंका दिया। इसकी बजाए, सही टोन में उसके सवाल ने सबको चौंका दिया।

आप योग्यता को कैसे परिभाषित करते हैं, पापा

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थोड़ा संभलने के बाद उन्होंने कहा, ‘‘तुम थोड़े कम लोड़ वाली नौकरी कर सकती थी, या फिर नौकरी ही नहीं करती। रोहित बहुत ज़्यादा कमाता है। घर और रसोई तुम्हारी प्राथमिकता है। उसे देखो, वह कुछ खाता ही नहीं है।” यह योग्यता की उनकी परिभाषा थी।

“पिताजी, मुझे लगता है कि वह ठीक ही खाता है। वह पहले से ही ओवर वेट है। जहां तक मेरी बात है, तो मैं पैसों के लिए काम नहीं करती। मैं मेरे अस्तित्व के लिए काम करती हूँ। मैं यही हूँ और ऐसी ही रहूंगी। मैं दोनों चीज़ें संभालने की कोशिश करती हूँ। मैं बहुत बार गड़बड़ करती हूँ, लेकिन आखिर हूँ तो मैं इंसान ही। और मैं घर पर मेरी मदद करने के लिए नौकरानी अफोर्ड कर सकती हूँ, ताकि मैं काम पर अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन दे सकूँ।

सनाया को हिम्मत मिली और वह उसकी बात कह पाई।

“ओवर वेट? कौन अपने पति के बारे में ऐसी बात करता है?’’ उसकी सास क्रोधित हो गई थी।

“गुस्सा मत करो कमला। इस पीढ़ी के पास नैतिकता या दूसरों के लिए कोई सम्मान नहीं बचा है।” उसके ससुर को सब पता चल सुका था।

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मेरी फ्रैंकनैस स्वीकार करें

“आप जानते हैं कि मैं पीठ पीछे किसी की बुराई कर के अच्छी बन सकती हूँ और सामने बुरा कह कर बुरी बन सकती हूँ। मुझे बुरा बनना पसंद है। मैं बात करना चाहती हूँ और चाहती हूँ कि मेरी बात कम से कम एक बार सुनी जाए।”

रोहित ने उसे देखा, लेकिन इस बार उसने नज़रें हटा लीं।

“आप लोगों के आने से पहले मैंने खुद से वादा किया था कि मैं कुछ नहीं कहूंगी। लेकिन स्पष्ट रूप से यह काम नहीं कर रहा है। अगर मैं बात करती हूँ तो मैं बदनाम, बिगड़ी हुई और ज़िद्दी बन जाती हूँ लेकिन मैं उन ठप्पों को खुशी-खुशी स्वीकार कर लूंगी। मैं आप लोगों से यह उम्मीद नहीं रखती कि आप लोग अपने सोचने का तरीका बदल दें, क्योंकि अब उनकी जड़ें बहुत गहरी हो गई हैं। लेकिन मैं आपसे यह उम्मीद भी नहीं रखती कि आप मुझे बदलने की कोशिश करें। आपके बेटे की ही तरह, मैंने भी इस मुकाम पर पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है।”

अब वे सब सनाया को नफरत की नज़रों से देख रहे थे। उसकी सास ने अविश्वास में सिर हिलाया। उसने हर दिन अपने बेटे के लिए भगवान से एक अच्छी पत्नी मांगी थी, और उसे मिला क्या था।

“मेरी पूजा में ही कोई कमी रह गई,’’ उन्होंने खुद से कहा।

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“नहीं, परवरिश में, सनाया ने उनकी राय को व्यक्त किया। काश आपने रोहित को एक औरत और उसके फैसलों का सम्मान करना सिखाया होता। मुझे यकीन है कि आपके माता-पिता ने आपको यह स्वतंत्रता नहीं दी थी, लेकिन आपके पास गलत को सही करने का मौका था।”

रोहित को बात करने का मौका मिला, लेकिन सनाया सबकुछ खुद कहना चाहती थी।

जो आप कहते हैं वह करें

“अगर मैं महत्वाकांक्षी हूँ या अलग दृष्टिकोण रखती हूँ तो मैं एक बुरी बहू नहीं बन जाती। आप मुझे बेटी बोल सकते हैं लेकिन किसी को बेटी कहना और किसी के साथ बेटी जैसा बर्ताव करना दोनों बहुत अलग हैं। मैं आपसे बस इतनी उम्मीद करती हूँ कि आप मुझसे किनारा ना करें। मैं खुद पर विश्वास रखती हूँ और आज मैंने जो भी हासिल किया है वह इसलिए है क्योंकि मैंने इसके लिए कड़ी मेहनत की है।”

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वह डाइनिंग टेबल से उठी और इस्तेमाल की गई सभी प्लेटों को उठाया। रोहित के हाथ से प्लेट उठाते समय वह बुदबुदाई, ‘‘मैं अपने ऑफिस में हर दिन पुरूषों से लड़ती हूँ। काश कि मेरा घरवाला मेरी मदद करता। उसके साथ झगड़ना सबसे बुरा है।”

वह किचन की ओर चल दी और उसने प्लेट्स सिंक में डाल दी। भार छोड़ने पर उसे हल्का महसूस हुआ और उसका मन बहुत मुक्त महसूस हुआ। उसने यह कर दिखाया था – उसने न्याय के लिए अपना केस आगे बढ़ा दिया था।

सनाया ने अपना हाथ लक्ष्मी के कंधे पर रखा और वे दोनों मुस्कुरा दी। शायद वे ना जीतें, लेकिन अब उनके पास हारने के लिए कुछ नहीं था।

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