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कैकेयी का बुरा होना रामायण के लिए क्यों ज़रूरी था

शायद उस सौतेली माँ कैकयी की पूरी कहानी हम अब भी नहीं जानते.
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आपने क्या कभी गौर किया है की कभी कोई अपनी बेटी का नाम कैकेयी नहीं रखता, जबकि उस समय के कौशल्या और सुमित्रा तो बहुत ही चर्चित नाम हैं. क्या इसलिए क्योंकि कैकेयी नाम लेते ही वो सौतेली गन्दी माँ जिसने राम को बनवास भेजने का षठ्यंत्र रचा था, याद आती है? मगर, ज़रा सोचिये, अगर राम वनवास नहीं गए होते, तो क्या रावण का वध कर पाते, क्या भगवान् राम बन पाते, और क्या रामायण लिखी जाती.

रामायण के अनुसार कैकेयी राजा दशरथ की रानी और भरत की माँ थी. एक सौतेली माँ होने के साथ साथ कैकेयी के बारे में मशहूर है की वो एक बहुत ही महत्वाकांगक्षी माँ और पत्नी थी. खैर, चलिए आज कोशिश करते है कैकेयी को इन पढ़ी पढ़ाई, सुनी सुनाई बातों से आगे बढ़कर देखने के. आइये अपने चश्मे बदले और फिर समझे की आखिर इस व्यक्तित्व की और भी परतें थी या नहीं.

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बात बेटों की थी

कैकेयी राजा केकाया की बेटी थी और सात भाइयों की अकेली बहन। वो साहसी थी, रथ चलाती थी, युद्ध में हिस्सा लेती थी, बहुत रूपवती थी, कई संगीत वाद्य बजाना जानती थी, और बहुत ही सुन्दर गाती और नृत्य करती थी. राजा दशरथ ने एक बार कश्मीर में शिकार करते हुए केकैयी को देखा और मोहित हो गए. ऐसा भी माना जाता है की कैकेयी के पिता ने राजा दशरथ से ये वचन लिया था की वो कैकेयी की संतान को ही अपना उत्तराधिकारी बनाएगा. दशरथ इस शर्त को मान गया था क्योंकि उस समय तक उसकी किसी भी पत्नी ने पुत्र को जन्म नहीं दिया था. मगर शादी के बाद कैकेयी ने भी पुत्र को जन्म नहीं दिया तो दशरथ ने सुमित्रा से शादी कर ली.

जब राजा दशरथ की शादी कैकेयी से हुई थी, तब तक कौशल्या, दशरथ की पटरानी, ने गर्भधारण तक नहीं किया था. इसलिए दोनों ही पक्ष इस शादी में कई अनकहे अनुमान लगाने लगे थे. जैसे ये की कैकेयी का पुत्र ही अयोध्या का भावी राजा होगा और ये की कैकेयी ही राजा दशरथ की पटरानी बनेगी. मगर जब वो भी गर्भधारण नहीं कर पाई तो दशरथ ने तीसरी शादी कर ली. मगर कैकेयी कौशल्या जैसी नहीं थी, वो साहसी और महत्वकांगक्षी थी.

वो सचमुच बहुत वीर थी

कहा जाता है की एक बार जब दशरथ किसी राक्षस से युद्ध के लिए जा रहे थे, तो कैकेयी भी उनके साथ हो ली. युद्ध के दौरान दशरथ काफी घायल हो गए और तब कैकयी ने रथ चला कर उसे युद्धछेत्र से बाहर निकला. राजा दशरथ की देखभाल की ताकि वो जल्दी ही स्वस्थ्य हो जाये और फिर युद्ध में जा सके. एक दुसरे संस्करण में ये कहा गया है की युद्ध के दौरान दशरथ के रथ का एक पहिया टूट गया था और कैकेयी ने अपनी ऊँगली लगा कर पहिये को रथ से युद्धविराम तक जोड़े रखा, अन्यथा रथ टूट जाता और दशरत युद्ध नहीं कर पाते. राजा दशरथ उसके इस कार्य से इतने खुश हुए की उसे दो इच्छाएं मांगने का अधिकार दे दिया. कैकेयी ने वो दोनों इच्छाएं एक उचित समय के लिए बचा कर रख लिए.

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कहते है की हम क्या हैं औरहमारी प्रतिक्रिया हमारे पुराने अनुभव पर ही निर्भर होती है. अक्सर बचपन की कोई घटना हमें इतना प्रभावित करती है की हम आज के फैसले भी उसी को याद कर के करते हैं. कैकेयी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.

उसके जीवन में कोई कोमल प्रभाव नहीं था

कुछ संस्करण कुछ और ही कहते हैं. वो कहते है कैकेयी के पिता अश्वपति थे और उन्हें ये वरदान था की वो पंछियों की बोली समझ सकते थे. मगर शर्त ये थी की अगर उन्होंने ये बात कभी भी किसी को बताई तो उनके प्राण ले लिए जायेंगे. एक बार वो अपनी पत्नी के साथ सैर कर रहे थे. तभी उन्हें दो बतखों को बातें करते सुना और उनकी बातें सुन कर राजा को बहुत ज़ोर से हंसी आ गई. उनके साथ चल रही उनकी रानी राजा के इस बर्ताव से चकित रह गई और उनके हंसने का कारण पूछने लगी. राजा ने कुछ नहीं बताया और कहा की अगर वो उसे कारण बताएँगे तो उनके प्राण चले जाएंगे. इस पर रानी ने कहा की उन्हें तो बस बात जाननी है और उसे मतलब नहीं की राजा जिए या मरे. ये सुनकर राजा आगबबूला हो गए और उन्हें लगा की रानी को तो उनसे कोई प्रेम ही नहीं.इसके फलस्वरुप राजा ने रानी को अपने राज्य से निकलने का फैसला सुनाया।

कैकेयी अपनी माँ की छत्र छाया के बिना ही बड़ी हुई और उसे हमेशा ही पुरुषों के प्रति एक अविश्वास रहा. उसके लगता था की पुरुष अपनी बात पर नहीं टिक पाते और दृढ़ निश्चयी नहीं होते हैं. क्या होगा अगर दशरथ उसे उसके जीवन के आखिरी पलों में उससे कम प्रेम करने लगें? क्या होगा अगर उसका बेटा उसकी वृद्धावस्था में उसे कोई मान न दे, न उसका कोई ध्यान दे? ऐसे कई प्रश्न उसे विचलित करते थे और बची कुछ आग उसकी आया मंथरा ने लगा दी जो उसके साथ उसके पिता के घर से ही आयी थी. बस फिर क्या था. कैकयी ने अपनी दो इच्छाओं को राजा दशरथ के सामने रख दिया, जिसमे एक था उसके बेटे भारत को राजा बनाना और दुसरे, राम को चौदह साल का बनवास देना.

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उसकी करनी के पीछे के उद्देश्य

रामायण एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे सब कुछ आदर्श ही दर्शाया गया है — आदर्श बेटा, आदर्श पत्नी, आदर्श मायें, आदर्श भाई, आदर्श सेवक. और कई बार आदर्श के अंकन के लिए उसके विपरीत को आंकना भी बहुत ज़रूरी होता है. वरना आदर्श आदर्श नहीं लगता.

एक दुसरे संस्करण की माने तो कैकेयी की पिता ने कुछ पंछियों की बातें सुनी थी जो कह रही थी की जल्दी ही जंगल में राक्षसका राज होगा और सभी ब्राह्मणों और ऋषि मुनियों को वो काफी नुक्सान पहुचाएंगे. ऐसा सुन कर ही राजा ने ये कदम उठाया था. वो मंथरा का स्वाभाव जानते थे और इसलिए उन्होंने उसे कैकेयी से साथ अयोध्या भेजा ताकि वो ऐसे कारनामें करे. राजा को पता था की अगर राम जंगल में रहे तो इन राकक्षों का वध कर, सभी का उद्धार कर सकेंगे. कहना न होगा की राजा का ये फैसला तो काफी कारगार निकला.

चाहे किसी भी संस्करण की बात करें, एक निष्कर्ष तो यही निकलता है की राम का बनवास पूर्व निर्धारित था और होना निश्चय ही था. अब ये नहीं पता की कैकेयी की ये छवि चाहे लेखक के मन की अपनी कल्पना हो या फिर कहानी को एक नया मोड़ लाने के लिए एक उत्प्रेरक ही था जिसे हर बात के लिए दोषि ठहराया जाता है. क्या ये बेहतर नहीं होगा की अब हम उसे एक नई रौशनी में देखें.

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