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कैसे मैंने खुद को और अपने बच्चों को तलाक़ के लिए तैयार किया…

उन्हें तलाक़ लेना था, मगर उसकी साथ की खटास और अपमान के बिना. यह कहानी एक ऐसे दम्पति की है जिन्होंने बहुत सूझ बुझ के साथ अपने रिश्ते को ख़त्म किया.
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तलाक़ हमेशा दूसरी औरत, विवाहोतर प्रेम, बेवफाई, शराब, या प्रताड़ना की वजह से ही नहीं होता है. सुनने में अजीब ज़रूर लगता है मगर कई बार दो सही लोग बिलकुल गलत हो सकते हैं एक दुसरे के लिए, और फिर शादी के २० साल बाद भी उनके बीच फासले इतने बढ़ जाते हैं, कि आपसी सहमति के साथ वो शादी के बंधन से खुद को मुक्त कर लेते हैं.

यह मेरी कहानी है.

मैं चाहती तो शादी के करीब दस साल बाद, जब मुझे लगने लगा था कि सब अब बिखर रहा है, खुद को इस बंधन से आज़ाद कर सकती थी. बंधन कह रही हूँ क्योंकि वो बंधन जैसा ही हो गया था. जकड़ा हुआ मेरे इर्दगिर्द. मगर मैंने ऐसा नहीं किया. मैं खुद को और इस रिश्ते को बचाना चाहती थी, एक पूरी कोशिश तो ज़रूर करना चाहती थी.

हम अक्सर यह गलती करते हैं अपने रिश्ते बचाने के लिए. हम उनपर बहुत मेहनत करने लगते हैं, जी जान लगा देते हैं, ताकि उस रिश्ते में वापिस जान फूंकी जा सके. मगर असली रिश्ते वो होते हैं, जिनपे किसी मेहनत की ज़रुरत ही नहीं होती, वो तो बस पानी सा साथ बहते है.

हम बस अलग लोग थे

हम दोनों दो बिलकुल विपरीत व्यक्तित्व के स्वामी थे. हम दोनों में कोई समानता नहीं थी और वो एक डोर जो हम दोनों को बांधे हुए थी, वो थी हमारे दो बच्चे. और सच मानिये किसी भी शादी को अगर बस ये बच्चो वाली डोर संभाल रही है, तो फिर वो सबसे ज़्यादा कागज़ी रिश्ता है. अक्सर पति पत्नी इस डोर के भुलावे में अपनी पूरी ज़िन्दगी व्यतीत कर देते हैं.

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