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काम और रति की कहानी भारत के भूले बिसरे प्यार के उत्सव को उजागर करती है

काम और रति की दिव्य जोड़ी प्यार और वासना के स्पेक्ट्रम में हर चीज़ को जोड़ती है और उनकी कहानियां सबूत हैं कि एक समय भारत कामुकता को पसंद करता था।
Kama and Rati

ना तो अच्छा हो सकता था और ना ही पूर्ण। किस और कंडोम से शर्माने वाला जो देश हम बन चुके हैं उसके विपरीत, किसी जमाने में भारत को अन्य चीज़ों के साथ कामसूत्र की भूमि के नाम से भी जाना जाता था। हम वह ‘फारवर्ड’ देश भी थे जिसने ना केवल विश्व को आकर्षक सेक्स मैनुअल दिए बल्कि हमारे मंदिर की दिवारों पर कामुक जोड़ों की छवियां भी दी। सेक्स एक वर्जित विषय नहीं था जिससे बचा जाता था या बुरा माना जाता था बल्कि उत्सव मनाने की वस्तु थी। काम, या कामुक आनंद, चार पुरूषार्थों (जीवन के लक्ष्य) में गिने जाते थे, बाकी तीन में धर्म (कर्तव्य), अर्थ (धन) और मोक्ष (मुक्ति) शामिल थे। यह ना सिर्फ एक अधिकार था बल्कि खुद के प्रति एक कर्तव्य भी था जिसके बगैर जीवन

प्यार खेल और कला था। यह एक गंभीर कार्य और उत्सव था। प्यार दिव्य था क्योंकि यह देवताओं द्वारा शासित था।

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आनंद के देवता
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काम शब्द सुख दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, और यह उस भगवान का भी नाम है जो इसे नियंत्रित करता है। मनमथा, मदाना, अतानु, या अनंगा के नाम से पहचाने जाने वाले कामदेव, अधिकांश पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रहमा के पुत्रों में से एक हैं। वे प्यार, वासना और कामुकता के भगवान है और उनका अवतार हैं। पश्चिमी इरॉस या क्यूपिड की तरह, वह दो लोगों के आकर्षण का प्रतीक है।

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दृश्य रूप से, उन्हें एक सुंदर युवा पुरूष के रूप में एक तोते (वाहन), गन्ने के धनुष के साथ चित्रित किया जाता है जिसमें मक्खियां धनुष का तार और तीर बनती हैं जिसके शीर्ष में फूल होते हैं।

वे अक्सर उसकी पत्नी, रति के साथ होते हैं जो कामुक इच्छा, वासना, जुनून और यौन आनंद की देवी हैं। वे भी पौराणिक ग्रंथों में युवा और सुंदर महिला के रूप में वर्णित है और दक्ष प्रजापति की कई बेटियों में से एक है। काम और रति का एक पुत्र भी है हर्ष, या कुछ कथाओं के अनुसार उनके दो बेटे हैं -दूसरा बेटा ‘यश’ है। मिस्टर और मिसेज़ काम के बच्चों के नाम ध्यान देने योग्य हैं, स्पष्ट रूपकों के कारणः यौन मिलन और तालमेल का परिणाम खुशी और अनुगह होता है। हमारे ऋषि मुनी कुछ भी भूलते नहीं थे।

कलात्मक सुंदरता

इसी तरह, भौतिक और कामुक उदारता एक और कहानी में बताई गई है कि काम और रति किस तरह साथ आए। यह लक्ष्मी के सौहार्दपूर्ण रूप से जुड़ा हुआ है जिसे सौंदर्य लक्ष्मी कहा जाता है। हुआ यह कि रति कभी साधारण दिखा करती थी। किसी भी विवाह प्रस्तावक को आकर्षित करने में असमर्थ होने के कारण रति बहुत उदास हो गई थी, लेकिन फिर उसे लक्ष्मी का उपकार प्राप्त हुआ। लक्ष्मी ने रति को सोलह श्रृंगार की कला प्रदान की जिसने उन्हें तीनों विश्वों की सबसे सुंदर स्त्री बना दिया। अनिवार्य रूप से, कामदेव उनके वश में आ गए और उसने रति को अपनी मुख्य पत्नी बना लिया। संयोग से, श्रृंगार शब्द में श्री शब्द शामिल है जो देवी लक्ष्मी का एक और नाम है। फिर, प्यार के देवताओं को समृद्धि की देवी का आशिर्वाद प्राप्त हुआ।

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निराकार प्यार

लेकिन एक अन्य भगवान इस जोड़े से खुश नहीं थे। मदाना भस्म की यह कहानी उस समय की बताई जाती है जब भगवान शिव गहरे ध्यान में लीन थे। अपनी पत्नी, सती को खोने के बाद शिव दुनिया से दूर हो गए थे। लेकिन भयानक राक्षस ताड़कासुर द्वारा आतंकित दुनिया का उद्धार करने के लिए शिव का पुत्र चाहिए था। एक पुत्र उत्पन्न करने के लिए, शिव को शादी करनी होगी और शादी करने के लिए उसे पहले अपनी ध्यान समाधि से बाहर निकलना होगा।

देवताओं ने पार्वती, जो सती का पुनर्जन्म थी, के साथ शिव के मिलन की साजिश रची। कामदेव की सेवाएं प्राप्त की गईं और उन्हें एक बिना मौसम का वसंत रचने को और एकांतप्रिय भगवान पर वासना का तीर छोड़ने को कहा गया। कामदेव इस कार्य में सफल तो हो गए लेकिन अपने जीवन की कीमत पर। इस हस्तक्षेप पर बुरी तरह नाराज़ शिव ने अपना तीसरा नेत्र खेला और कामदेव को जला कर राख कर दिया। रति अपने प्रेमी और साथी को खोने के बाद गमगीन हालत में थी और बदला लेना चाहती थी। जब शिव शांत हो गए तो उन्हें अपनी मूर्खता महसूस हुई और उसे वापस जीवित करके इसे पूर्ववत करने की पेशकश की। हालांकि, अब काम के पास कोई शरीर नहीं था इसलिए उन्हें बगैर शरीर का (अन-अंगा) कहा जाने लगा।

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अंततः शिव ने पावर्ती से शादी कर ली और उनके बेटे कार्तिकेय ने ताड़कासुर की हत्या कर दी। दुनिया को प्यार द्वारा बचा लिया गया था, क्या हुआ अगर अब वह निराकार था।

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एक अबाध प्यार

काम और रति का प्यार समय, आकार और स्थान से परे है, यह एक अन्य कहानी में देखा जा सकता है। काम का पुनर्जन्म कृष्ण और रूकमणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में हुआ था। एक शिशु के रूप में, एक मछली राक्षस, सांबरा ने उसका अपहरण कर लिया, जिसकी मृत्यु प्रद्युम्न के हाथों नियत थी। प्रद्युम्न का पालन पोषण संबारा की पत्नी मायादेवी ने किया जो कोई और नहीं बल्कि रति का पुनर्जन्म थी। मायादेवी प्रद्युम्न को अपने क्रूर पति से बचाती है और आखिरकार राक्षस का अंत होता है। उसके बाद एक ओडिपल ट्विस्ट में, प्रद्युम्न मायादेवी से शादी कर लेता है और काम और रति एक बार फिर से एक हो जाते हैं।

सत्य बड़े पैमाने पर प्रकट होता है

भारतिय समुदाय के विशाल भाग में विशेष रूप से प्रचीन और मध्ययुगीन काल में स्वीकार किया गया था कि प्यार महत्त्वपूर्ण है, भले ही इसे परिभाषित किया गया हो या नहीं। सभी प्यारों में से, पुरूष और स्त्री के बीच के प्यार को कलाकारों और कवियों का विशेष ध्यान प्राप्त हुआ। और इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इनमें से अधिकांश ग्रंथों का नाम प्यार के पहले जोड़े के नाम पर रखा गया।

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14वीं से 17वीं शताब्दी तक रीतिकाल कविता और वात्स्यायन के कामसूत्र, कोकौका का रति रहस्य, कल्याणमल्ला का अनंगरंगा, प्रौधदेवराजा का रतिरत्नप्रदीपिका, जयदेव की रति मंजरी और अज्ञात मानमाथा संहिता ऐसे कुछ उदाहरण हैं।

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इनमें से कुछ ग्रंथ धार्मिक साहित्य की संहिता शैली में रचित हैं, जहां रति और काम के बीच संवाद दिखाया गया है – शिवत्व तंत्र में शिव और पार्वती की तरह। उन्हें हर अर्थ में प्रेमी और समान भागीदारों के रूप में चित्रित किया जाता है और इस प्रकार उन्हें एक आदर्श जोड़ा माना जाता है। ये ग्रंथ संभोग के निर्देश और जी-स्पॉट, ओरल सेक्स और यौन संगतता की अवधारणाओं से भरे हुए हैं, जिन्हें हम आधुनिक समझते हैं। अगर साहित्य सामाजिक रीति रिवाज़ों का मानदंड हैं, तो ये किताबें उजागर करती हैं कि मध्ययुगीन भारतिय यौन संवेदनाएं वास्तव में मुक्त थीं। और यह इस विचार को संभव बनाता है कि भारत कभी ऐसा स्थान हुआ करता था जहां लोग प्यार करते थे और प्यार करने देते थे।
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