कन्नकी, वह स्त्री जिसने अपने पति की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक शहर को जला दिया

Utkarsh Patel
kannaki

कन्नकी तमिल महाकाव्य शिल्पादिकारम की प्रसिद्ध नायिका है। यह जैन भिक्षु इलंगो अड़िगल द्वारा लिखी गई एक स्त्री और उसके पति की कहानी है जो वफादारी, सही और गलत, एवं न्याय के लिए संघर्ष करते हैं। कई अनूठी चीज़ों के अलावा, यह एकमात्र महाकाव्य हो सकता है जिसमें एक स्त्री नायक है और कहानी शुरू से अंत तक पूरी तरह कन्नकी के कंधों पर टिकी रहती है।

कन्नकी के जीवन में दूसरी स्त्री का प्रवेश

कन्नकी का विवाह एक अमीर व्यापारी के पुत्र कोवलन से हुआ है और दोनों खुशी से रहते हैं जब तक की कोवलन के जीवन में एक दूसरी स्त्री नहीं आ जाती। कोवलन एक गणिका माधवी के प्रति मंत्रमुग्ध हो जाता है, जो सभी कलाओं से अच्छी तरह वाकिफ थी और उसे स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी का वंशज माना जाता है। कोवलन अपना घर छोड़ देता है और अपनी प्रतिष्ठा और धन की कीमत पर माधवी के साथ रहने लगता है। माधवी की माँ सिर्फ धन के बारे में सोचती है और इस तथ्य पर ध्यान नहीं देती की माधवी को कोवलन से प्यार होने लगा है, जो कि गणिकाओं को नहीं करना चाहिए।

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माधवी के साथ कुछ गलतफहमी के कारण, कोवलन उसे छोड़ देता है और कन्नकी के पास लौट जाता है। एक खाली घर, प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता की कमी ने परिवार को गरीब बना दिया था। लेकिन कन्नकी कोवलन को स्वीकार कर लेती है और दोनों एक नया जीवन शुरू करने का निश्चय करते हैं, उनके पास बची एकमात्र संपत्ति, कन्नकी की पायल की मदद से। वे मदुरै में स्थानांतरित होने और फिर से जीवन शुरू करने का निर्णय लेते हैं।

मनहूस पायल

मदुरै पहुंचने पर, कोवलन एक पायल बेचने का फैसला करता है। दुर्भाग्यवश वह एक सुनार से जा टकराता है, जिसने मदुरै की रानी की एक ऐसी ही पायल चुराई है और किसी के मत्थे दोष मड़ने के लिए एक बलि का बकरा ढूंढ रहा है। वह कोवलन के खिलाफ षड़यंत्र रचता है और इससे पहले की कोवलन कुछ समझ पाए, उसे राजा के सैनिकों द्वारा मार दिया जाता है।

जब कन्नकी को यह पता चलता है, तो वह राजा की अदालत में घुस जाती है और दूसरी पायल दिखाती है, और साबित करती है कि राजा अपने फैसले में चूक गया था। वह राजा को उसके अपराध के लिए शारीरिक दंड देती है, जिससे राजा अपने प्राण त्याग देता है और उसके बाद रानी। इससे भी संतुष्ट ना होकर, कन्नकी मदुरै शहर, जिसे वह अपना घर बनाना चाहती थी, उसे जलकर राख होने का शाप देती है और शहर में लपट उठती हैं और निर्धन और बेगुनाहों को छोड़कर बाकी सब भस्म हो जाते हैं।

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उसका क्रोध तब जाकर शांत होता जब मदुरै की देवी उसे विश्वास दिलाती है कि उसके साथ जो कुछ भी हुआ वह कर्म का परिणाम था। वह अपने पति का दाहसंस्कार करती है और बाद में उसे स्वर्ग में जाकर मिलती है।

उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई

कन्नकी को समय के साथ देवी समान मान लिया गया था और आधुनिक समय में भी उसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है। उन्हें तमिलनाडु में देवी कन्नकी, केरल में कोडुंगल्लुर भगवती और अट्टुक्कल भगवती माना जाता है और श्रीलंकाई बोद्धों में देवी पट्टिनी माना जाता है जबकि श्रीलंकाई तमिल हिंदु उन्हें कन्नकी अम्मा के रूप में पूजते हैं। पूरे दक्षिण में और जो मार्ग उसने तमिलनाडु के पूहर (माना जाता है कि यह बाद में सुनामी में डूब गया) से शुरू करते हुए मदुरै और केरल तक लिया था, वहां देवी कन्नकी को समर्पित मंदिर और देवस्थान देखे जा सकते हैं।

वह आशा की किरण है

कन्नकी इतनी विशेष कैसे है? वह हद से ज़्यादा वफादार है, और अगर हम इसे सामाजिक परिवेश में देखें, तो उसके पास क्या विकल्प था? वह एक बच्ची थी जिसे शादी में झौंक दिया गया था। उसकी वित्तीय स्थिति बिगड़ रही थी, उसके वृद्ध सास-ससुर ने उसका साथ दिया था, लेकिन जो संकट उनके बेटे ने उन पर डाला था उसके विरूद्ध वे ज़्यादा कुछ कर नहीं सके। स्वयं के प्यार पर विश्वास रखने के अलावा उसके पास क्या विकल्प बचा था?

अपने आधुनिक महानगरों से बाहर निकलो और आपको इस तरह का जीवन व्यतीत करने वाली कई स्त्रियां दिखेंगी। हमने अक्सर सुना है कि विश्वास पहाड़ों को भी हिला सकता है और कन्नकी में हमें वह विश्वास दिखाई देता है। वह ऐसी कई स्त्रियों के लिए एक आशा की किरण बन गई है, जो आशा करती हैं कि एक दिन, उनके पति को कुछ अक्ल आएगी।

क्या यह प्यार की शक्ति हो सकती है?

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कन्नकी सीता और द्रौपदी जैसी स्त्रियों से अलग है। हालांकि सीता के अपहरण के परिणामस्वरूप लंका जली, और द्रौपदी के अपमान की वजह से हस्तिनापुर जला, दोनों ही मामलों में यह काम उनके पतियों द्वारा किया गया, जबकि कन्नकी ने मदुरै को स्वयं के बूते पर जलाया। एक शहर, जो उसके पति की मृत्यु का ज़िम्मेदार था, उसपर कहर बरपाने के लिए उसे किसी पुरूष की ज़रूरत नहीं थी।

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अंततः, कन्नकी हर निजी प्रतिकूल परिस्थिति में चुप रहती है, लेकिन दुर्व्यवहार और अन्याय के एकल कृत्य के लिए राजा को दंडित करती है। उसका क्रोध राजा द्वारा प्राण त्यागने पर भी शांत नहीं होता, और वह शहर से ही अन्याय का बदला लेने लगती है, उस के माध्यम से जिसे वह ‘शुद्धि का कार्य’ कहती है। यह एक बहुत ही मजबूत सिद्धांत को उजागर करता हैः व्यक्तिगत क्षमता में किसी व्यक्ति द्वारा अपराध को बरदाश्त किया जा सकता है, लेकिन वही काम एक सावर्जनिक व्यक्ति, वो भी एक राजा द्वारा किए जाने पर बरदाश्त नहीं किया जा सकता, और ऐसे अपराधों में जीवन या उससे भी अधिक मूल्य चुकाना होगा। यह उन दिनों कहा गया एक बेहद मजबूत कथन था , लेकिन अब भी बेहद प्रासंगिक है।

ध्यान दें: मेरी नवीनतम किताब, कन्नकी की पायल, तमिल महाकाव्य शिल्पादिकारम को ज़्यादा दर्शकों तक और अपेक्षाकृत आसान गद्य प्रारूप में लाने का एक प्रयास है।

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