कृष्ण की पत्नी रूक्मणी आज की महिलाओं की तुलना में बहुत बोल्ड थीं

Urmi Chanda-Vaz
Rukmini and Krishna

हालांकि कृष्ण बेटे, भाई, पति, दोस्त, पिता, योद्धा राजा या सलाहकार इन सभी भूमिकाओं में परिपूर्ण थे, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा एक प्रेमी के रूप में याद किया जाता है। राधा के साथ उनके रिश्ते को प्यार का सर्वोच्च प्रतिमान माना जाता है। लेकिन उनके शांत आकर्षण ने वृंदावन और उससे परे किसी भी स्त्री को नहीं छोड़ा था। वे जहां जहां भी गए, स्त्रियों ने उन्हें अपना दिल सौंपा और पति और भगवान के रूप में उन्हें मांगा। बल्कि, हिंदू पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि उनकी 16,008 पत्नियाँ थीं! इनमें से 16,000 बचाई गई राजकुमारियाँ थीं और 8 प्रमुख पत्नियाँ थीं। इन आठों में रूक्मणी, सत्यभामा, जांबवंती, मित्रविंदा, कालिंदी, लक्ष्मणा, भद्रा और नग्नजीति शामिल थीं। इन सभी समान रानियों में रूक्मणी को प्रथम माना जाता है और आज का कॉलम आपको इसका कारण बताएगा।

विदर्भ की राजकुमारी

राजा भीष्मका की पुत्री रूक्मणी बहुत रूपवती थी। वह विदर्भ साम्राज्य के कुंडिनपुरा से थी और इसलिए उसे वैदर्भी भी कहा जाता है। उसके पांच शक्तिशाली भाइयों, विशेष रूप से रूक्मी ने उसकी शादी के माध्यम से एक शक्तिशाली राजनीतिक गठबंधन बनाना चाहा। रूक्मी विशेष रूप से अपनी बहन और चेदी के राजकुमार शिशुपाल के बीच मैच बनाने में रूचि रखता था। लेकिन रूक्मणी बहुत पहले ही अपना दिल कृष्ण को दे चुकी थी।

कृष्ण के जादुई आकर्षण के साथ रूक्मणी का पहला सामना मथुरा में हुआ था। अभिमानी रूक्मणी और बलराम के बीच का झगड़ा रूक्मणी के लिए रोमांस की पृष्ठभूमि बन गया। जिस कृष्ण की सुंदरता और बहादुरी की कहानियाँ सुनते हुए वो बड़ी हुई थी, वह अचानक एक वास्तविकता बन चुका था और उसे उस काले ग्वाले राजकुमार से प्यार हो गया। लेकिन इस घटना ने उसके भाई को यादव राजकुमारों का उग्र दुश्मन बना दिया।

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एक हास्यास्पद स्वयंवर

जब रूक्मणी की शादी का समय आया, एक स्वयंवर आयोजित किया गया। हालांकि यह एक तमाशे से ज़्यादा कुछ नहीं था क्योंकि रूक्मी पहले ही तय कर चुका था की शिशुपाल ही जीतेगा। इस तरह के छल से रूक्मणी बहुत नाराज़ थी और वह इसे कभी स्वीकार नहीं करती। उसने संकल्प लिया कि या तो कृष्ण से शादी करेगी या फिर महल के कूंए में डूब जाएगी।

उसने कृष्ण को एक गुप्त पत्र लिखा और अग्नि जोताना नाम के एक भरोसेमंद पुजारी के हाथों उसे भेज दिया। इसमें उसने कृष्ण के प्रति अपने बगैर शर्त वाला प्यार घोषित कर दिया और उसका अपहरण करने का आग्रह किया। उसने सुझाव दिया कि वे राक्षस विवाह कर लेंगे – वैदिक विवाह का असहमत लेकिन मान्यता प्राप्त रूप जिसमें दुल्हन का अपहरण कर लिया जाता है। कृष्ण स्वीकृति में मुस्कुराए।

प्यार का प्रभार लेना

कृष्ण को वह प्रेम पत्र भेजते हुए रूक्मणी ने दो अग्रणी कदम उठाएः पहला अरैंज मैरिज की पितृसत्तात्मक प्रणाली के खिलाफ और दूसरा उसके दिल के लिए। एक ऐसे परिवेश में जहां लड़कियों से संकोची होने की अपेक्षा की जाती है (यह अब भी नहीं बदला है!), रूक्मणी का कदम सबसे स्वच्छंद था! प्यार की इस साहसी पुकार का उत्तर कृष्ण कैसे ना देते?

स्वयंवर की सुबह, रूक्मणी ने देवी कात्यायनी के मंदिर की परंपरागत यात्रा की। अवसर देखकर, कृष्ण ने धीरे से उसे अपने रथ पर बिठा लिया और वे भाग गए। जो लोग उनके पीछे आ रहे थे, उनका सामना यादव सेना के तीरों से हुआ जो कुछ दूरी पर उनका इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन क्रोधित रूक्मी नरम नहीं पड़ा और उसने कृष्ण के रथ का पीछा करना जारी रखा। वासुदेव अपना क्रोध उस पर उतारने ही वाले थे, लेकिन रूक्मणी ने उन्हें रोक दिया और अपने भाई का जीवन बक्शने का अनुरोध किया। कृष्ण ने सिर्फ उसका सिर मुंडवा कर उसे जाने दिया।

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द्वारका में आने के बाद देवकी द्वारा रूक्मणी का स्वागत किया गया और एक भव्य शादी का समारोह आयोजित किया गया। ‘रूक्मणी कल्याणम’ का पाठन आज भी शुभ माना जाता है। कृष्ण ने कहा कि वह देवी लक्ष्मी का अवतार थीं और हमेशा उनके साथ रहेंगी। कृष्ण ने उन्हें ‘श्री’ नाम दिया और कहा कि अब से लोग उनके नाम से पहले उसका नाम लेंगे और उसे श्री कृष्ण बुलाएंगे। रूक्मणी ने कृष्ण की पहली पत्नी के रूप में अपना जीवन शुरू किया, हालांकि वह आखरी पत्नी नहीं थी।

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रूक्मणी होना

भागने का नाटक रूक्मणी के जीवन में अंतिम परेशानी नहीं थी। शादी के कुछ साल बाद रूक्मणी गमगीन हो गई क्योंकि उसने किसी संतान को नहीं जन्मा था। जब कृष्ण ने शिव भगवान की पूजा की तब जाकर उन्हें एक पुत्र हुआ -प्रद्युम्न जो काम देव का अवतार था। हालांकि नियति के एक अजीब खेल द्वारा, शिशु प्रद्युम्न को उसकी गोद से छीन लिया गया और कुछ वर्षों बाद वे वापस मिले।

उस बच्चे से दूर होना क्या कम बुरा था, कि ऊपर से रूक्मणी को सह पत्नियों की एक श्रृंखला के साथ संघर्ष भी करना पड़ा। लेकिन रूक्मणी एक बात जानती थीः कृष्ण किसी एक नारी के नहीं हो सकते थे, राधा के भी नहीं और उसके भी नहीं। उन्हें हर स्त्री की प्रार्थना का उत्तर देना होता था जो उन्हें मानती थीं। परमात्मा के तौर पर, उन्हें हर समय हर जगह हर एक के साथ होना रहता था। हालांकि रूक्मणी अपने भगवान की भक्ति में दृढ़ बनी रही। दो उदाहरण कृष्ण के लिए उसके अमर प्रेम का सबूत देते हैं।

मज़ाक नहीं है

एक बार कृष्ण ने उसकी आत्मनिर्भरता को परखने के लिए, मज़ाक में उससे पूछा कि उसे कैसा पति पसंद है। उन्होंने कहा कि कई राजाओं और राजकुमारों में से एक ग्वाले का चयन करके उसने गलती की है। वे इतने आगे बढ़ गए कि उन्होंने उसे अपनी गलती सुधारने का सुझाव दे डाला। इस नकली प्रस्ताव के कारण रूक्मणी रो पड़ी और इससे कृष्ण को यह अहसास हुआ कि उनसे दूर जाने के विचार से ही उसे कितनी पीड़ा हुई थी। उन्होंने उससे माफी मांगी और सबकुछ ठीक कर दिया।

लेकिन तुलाभ्रम (पैमाने पर वज़न) वाले उदाहरण ने रूक्मणी की प्रेमपूर्ण भक्ति की वास्तविक सीमा को प्रदर्शित किया। एक बार, नारद ऋषि ने रूक्मणी की मुख्य प्रतिद्वंदी सत्यभामा को उकसाया था कि कृष्ण को दान कर दे। उसे वापस पाने के लिए उसे नारद को कृष्ण के वज़न के बराबर सोना देना होगा।

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रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

अहंकारी सत्यभामा को लगा कि यह आसान था, और उसने चुनौति ले ली। इस सब के बीच शरारती कृष्ण तराजू के एक पलड़े में बैठ कर सारी कार्यवाही देख रहे थे। सत्यभामा ने उसके सारे आभूषण और स्वर्ण तराजू के दूसरे पलड़े में रख दिए लेकिन वह भारी नहीं हुआ। निराशा में, सत्यभामा ने अपना अहंकार निगल लिया और रूक्मणी से मदद की गुहार लगाई। रूक्मणी तुरंत तैयार हो गई और सिर्फ एक तुलसी का पत्ता हाथ में लिए आगे आई। जब उसने वह पत्ता तराजू पर रखा तो वह नीचे गया और कृष्ण के पलड़े से भारी हो गया। हर कोई रूक्मणी के प्यार की ताकत देख सकता था। वह वास्तव में समान पत्नियों में सबसे प्रथम थीं।

अजर अमर प्यार

रहस्यपूर्ण राधा और जोशीली सत्यभामा की तुलना में, रूक्मणी का चरिण अपेक्षाकृत नेक है। उसकी कहानी युवा अवज्ञा से शुरू होती है लेकिन जल्द ही पत्नी रूपी भक्ति में परिपक्व हो जाती है। हालांकि वह राधा जितनी प्रसिद्ध नहीं है, लेकिन उसका वैवाहिक स्टेटस उसे वैधता प्रदान करता है – जो सिविल समाज में बहुत मूल्यवान है। कृष्ण की कई शादियों के बावजूद, वह अपने प्यार और निष्ठा में दृढ़ रहती है। ऐसा सिर्फ एक देवी ही कर सकती है, कोई भी साधारण स्त्री इस तरह का प्यार करने में सक्षम नहीं होगी। सीता की तरह, वह भारतीय पौराणिक कथाओं के क्षेत्र में आदर्श पत्नी हैं और महाराष्ट्र में अपने पति, भगवान विठ्ठल के साथ रूखुमई के रूप में पूजी जाती है।

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