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“क्या हम मिलें?”

जब उसके ऑनलाइन अजनबी दोस्त ने उससे मिलने की इच्छा जताई.
Lady With Laptop

वो शब्द जैसे मेरी रूह तक में गूँज रहे थे. मुझे वो घर के पर्दों तक पर छपे दिख रहे थे, बड़े बड़े अक्षरों में. क्या सचमुच मेरे पति को कुछ नहीं दिख पा रहा था? मैंने जब सुबह का अखबार उठाया तो उसकी हैडलाइन के बदले ये शब्द दिखे. मैं ब्रश करते हुए मन ही मन ये शब्द दोहरा रही थी. नहाते हुए जब शीशे पर नमीं जमीं, तो उस पर भी मैंने वही लिख डाला.

एक साल से मैं चुपके से एक अजनबी से ऑनलाइन चैटिंग कर रही थी. ये सब शुरू हुआ था चैटिंग से, फिर सिलसिला बढ़ कर ईमेल तक चला गया. शुरू के मेल बिलकुल औपचारिक झिझकते हुए होते थे और फिर लम्बे, कॉन्फेशन से भरे लम्बे मेल. ये इंसान धीरे धीरे मेरे अंतर्मन को सुकून देने वाला मरहम था. वो मुझे समझता था, मेरी भावनात्मक ज़रूरतों की उसे कदर थी, और वो मुझे वो सुकून देता था जिसकी मेरे मन को हमेशा से तलाश थी.

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बड़े होते हुए मैं हमेशा इस बात में यकीन रखती थी की हम सब के लिए कोई एक बिलकुल परफेक्ट और आदर्श साथी कहीं होता है. और इस साथ में हमारी भावनात्मक ज़रूरतें भी पूरी होती हैं और इसलिए ऐसे साथी के साथ जीवन एक सुखद अनुभव बन जाता है. शादी के कुछ दिनों बाद ही मैं ये भी समझ गई थी की मेरे पति मेरे वो साथी नहीं है. मेरे पति एक बहुत ही शिष्ट और भले इंसान है अपने ख़ास तरीके से मुझे प्यार करते हैं और मेरी परवाह भी करते हैं.

मगर इस ऑनलाइन अजनबी के बारे में क्या बोलूं. वो तो मानो मुझसे शब्दों से ही मुझसे प्यार कर ले रहा था;

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