क्या होता है जब एक शादीशुदा स्त्री को अपने बॉस से प्यार हो जाता है?

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(पहचान सुरक्षित रखने के लिए नाम बदल दिए गए हैं)

निखिल और अरूंधति ने अपने सुखी विवाह के तीन वर्ष पूरे किए। अरूंधति विवाह के प्रस्ताव से इतनी खुश नहीं थी लेकिन अपने माता-पिता की पसंद पर भरोसा करते हुए उसने हाँ कर दी। सबकुछ बिल्कुल परफेक्ट निकला, उसकी कल्पना से भी ज़्यादा।

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परफेक्ट पति

उसके पति ने कभी उसे ‘ना’ नहीं कहा। अरूंधति जो भी करना चाहती थी उसमें वह उसका साथ देता था। दोनों पूरा दिन काम करते थे और शाम को साथ में घर आ जाते थे।

उनका एक कुक था। सुबह की चाय निखिल बना दिया करता था और एक मुस्कान के साथ उसे जगाता था। वह उसके दिन का सबसे अच्छा हिस्सा होता था…हर दिन।

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फिर वह उससे मिली

अरूंधति अक्सर काम से देर से लौटा करती थी या फिर ऑफिस के कलीग्स के साथ उसके डिनर या देर रात की फिल्म देखने के प्लान होते थे और निखिल ने कभी सवाल नहीं किया। वह उसे अच्छी तरह जानता था और उस पर भरोसा करता था। उन दिनों, अरूंधति अपने ऑफिस के एक लड़के के करीब आ गई। वह उसका बॉस धीरज था। वह उससे उम्र में छोटा था, एक शालीन व्यक्ति था। जब भी उनके पास एकांत में समय होता था वे अर्थपूर्ण बातचीत किया करते थे। ऑफिस डेस्क, कैफेटेरिया, शाम की कॉफी और कई बार, डिनर भी… वे किसी अवसर को जाने नहीं देते थे।

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उसकी एक गर्लफ्रेंड थी और अरूंधति एक विवाहित स्त्री थी, फिर भी उनके बीच जो हो रहा था उस पर उन दोनों में से किसी का भी नियंत्रण नहीं था।

जब अरूंधति घर पर होती थी, वह पछताया करती थी। वह अपने पति से नज़रे नहीं मिला पाती थी। और सबसे ज़्यादा जो बात उसे खटकती थी वह यह कि निखिल ने कभी भी उस पर शक नहीं किया उसे किसी भी बात पर संदेह नहीं होता था। अरूंधति, कभी कभी, देर रात को निखिल के पास लेटकर अपने बॉस को मैसेज करती थी फिर भी कभी उसने कोई सवाल नहीं किया।

एक अदृश्य रेखा जो उन्होंने कभी पार नहीं की

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निखिल जब काम के सिलसिले में शहर के बाहर गया, अरूंधति धीरज के घर चली गई। उन्होंने पूरी रात साथ में बिताई…बातें करते हुए, फिल्में देखते हुए, एक दूसरे की बाँहों में बैठकर और एक दूसरे के साथ में आराम ढूँढते हुए। उन्होंने एक दूसरे को यहां-वहां किस किया और कई बार गले लगाया लेकिन उससे आगे कुछ नहीं। अरूंधति ने उसके अपार्टमेंट में अनगिनत रातें बिताईं लेकिन वे साथ में कभी नहीं सोए। उन दोनों में से कोई भी यह नहीं चाहता था। धीरज हर उस बात से खुश था जो अरूंधति को खुश करती थी और उसने कभी ऐसा कुछ नहीं किया जिसने उसे दुखी किया हो।

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दोनों अपने अपने साथी से प्यार करते थे लेकिन फिर भी एक दूसरे से दूर नहीं रह पाते थे

हो सकता है वह उनका आपसी तालमेल हो, या फिर भावनात्मक संपर्क जो अरूंधति उसके लिए महसूस करती थी या फिर उसके पास होने पर जिस तरह से वह मुस्कुराती और हँसती थी। उसकी बदौलत वह किताबों, ब्लॉग्स और परिकथाओं पर विश्वास करने लगी थी। वे अपनी सबसे वाइल्ड फैंटसी एक दूसरे को बताते थे फिर भी उनकी मूल्य प्रणाली समान थी। अरूंधति के साथ उसका संबंध अबोध था। अरूंधति को इतना अधिक अपनत्व जीवन में और किसी के लिए नहीं लगा, यहां तक कि अपने पति के साथ भी नहीं और यह इतना आरामदायक था कि वह उन भावनाओं को शब्दों में बयान नहीं कर सकती थी।

वह ‘‘वन्स इन ए लाइफ टाइम” तरह का बंधन था, ऐसा जिसका अनुभव दुनिया में बहुत से लोग नहीं कर पाते। वह उसकी आत्मा के लिए खुराक और उसकी हर परेशानी का इकलौता जवाब बन गया था।

असली जिंदगी बीच में आ गई

अरूंधति जानती थी के उसके मन में जो चल रहा है वह सही नहीं है। दूसरी तरफ, निखिल और वह परिवार शुरू करने की योजना बना रहे थे। उसके साथ ऐसा करना सही नहीं था। वह ऐसी माँ नहीं बन सकती थी जिसका दूसरे पुरूष के साथ अफेयर हो! इसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता।

इससे भी ज़्यादा हर रोज़ का पछतावा उसे खाए जा रहा था। उसने खुद को धीरज से दूर करने की कोशिश की लेकिन जिसके साथ वह पूरा दिन काम करती थी उससे दूर रहना मुमकिन नहीं था।

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अरूंधति ने इस्तीफा दे दिया। धीरज को धक्का लगा लेकिन वह जानता था कि उस पर क्या बीत रही है। और दूर रहना उन दोनों के लिए अच्छा था और उसका एकमात्र रास्ता यह था कि अरूंधति नोकरी छोड़ दे।

ऐसा उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था लेकिन वे इसे जारी नहीं रख सके। अब उसके पास केवल यादें हैं जो उम्रभर साथ रहेंगी।

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