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क्या हुआ जब शादी के बाद मैंने अपना सरनेम नहीं बदला

उसने शादी के बाद अपना उपनाम कभी नहीं बदला और उसने इन हास्यास्पद क्षणों को जन्म दिया
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शादी के बाद अपने पुराने उपनाम पर टिके रहिए और यकीन मानिये जीवन लघु कथाओं का संस्करण बन जाएगा । हर अजनबी के साथ मुलाकात, सुनाने और हंसने या खीझ दिलाने वाली एक याद बन जाएगी। आपको उनकी आँखों की हैरानी और फिर वह प्रश्न अच्छा लगेगा जो आपके साहसी कृत्य पर सवाल उठाता है या फिर…‘‘क्या आपके पति ने इस पर ऐतराज़ नहीं किया?’’ लेकिन सबसे ज़्यादा मुझे वह पसंद है जब कोई मेरे पति को ‘मिस्टर झा’ पुकारता है। वह मेरा ‘ज्ञानोदय’ क्षण होता है।

एक नाम में क्या रखा है? देखिए….मुझे नहीं पता। लेकिन हाँ, उपनाम में बहुत कुछ है और उसे लेकर बहुत कुछ हो सकता है। हमारे विवाह और अपना उपनाम ना बदलने के मेरे ‘साहसी कृत्य’ के बाद जल्द ही हमें पूर्वालोकन मिल गया।

एक सुबह जब मैं जागी तो मुझे बुखार था। तब मैं छह महीने की गर्भवती थी और हम अपने-अपने परिवारों से बहुत दूर रहते थे। मेरे पति ने मेरी देखभाल करने के लिए छुट्टी ले ली। दोपहर तक वायरस ने उनपर भी अपना प्रभाव दिखा दिया। इसलिए, शाम को हम एकसाथ अस्पताल चले गए। हमारे लिए अर्ध-डीलक्स कमरे का चयन करना काफी स्वाभाविक था, ताकि हम बिमारी में भी साथ हो सकें।

जैसे ही रात आई, एक लंबी हृष्ट पुष्ट बुजुर्ग नर्स ने हमारे कमरे में प्रवेश किया। बहुत ही कोमल आवाज़ में उन्होंने कहा, ‘‘मिसेज़ झा, मैं रात के लिए ड्यूटी नर्स हूँ और मैं बाहर नर्सों के स्टेशन पर ही रहूँगी। अगर आपको कोई भी समस्या हो या यदि आप किसी भी कारण से असहज महसूस कर रही हों तो घंटी बजा दीजिएगा। मैं कुछ ही पलों में यहां आ जाऊंगी।” उन्होंने मेरा हाथ थामा और बहुत ही कोमल स्वर में पूछा, ‘‘आपके साथ कोई अटेंडेंट नहीं है।”
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बीमारी में अपने परिवार को याद करना स्वाभाविक है और परिवार से मेरा अर्थ प्राकृतिक परिवार है। एक अरेंज मैरिज में, अपने पति को भी अपना मानने में थोड़ा समय लगता है। हाँ समय लगता है! अपने वैवाहिक परिवार को अपना मानने में…यह निर्भर करता है।

मुझे भी अपने परिवार की याद आ रही थी, विशेष रूप से मेरी माँ की। नर्स के मातृत्व भरे स्पर्श की वजह से मेरी आंखें भर आई। ‘‘नहीं, हमारा यहां कोई परिवार नहीं है।” मुझे याद है कि मैंने बहुत ही धीमी आवाज़ में उन्हें बताया था, जो मुश्किल से सुनी जा सके।

“चिंता मत करो, हम तुम्हारे साथ हैं।”

फिर उन्होंने मेरे पति या बल्कि मेरे रूम मेट की ओर देखा, धौंस देने वाले तरीके से अपनी कमर पर हाथ रखा और उनपर एक ‘अगर तुमने हिम्मत की तो मैं तुम्हारी जान ले लूंगी’ वाली दृष्टि डाली। और एक कठोर आवाज़ में, लगभग भौंकने वाले अंदाज़ में उन्होंने कहा, ‘‘मिस्टर रॉय, मैं बिल्कुल बाहर ही हूँ। अच्छे नींद लीजिएगा। शुभरात्री।”

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उन्होंने हमारे बीच पर्दा खींच दिया, हमें अलग कर दिया और कमरा छोड़ दिया। हम इतने बीमार थे की उनके विपरीत व्यवहार या स्वर को समझ नहीं सके और ना ही कह सके की पर्दे खुले रखें। हमें नींद आ गई।

अगली सुबह हम जल्दी जाग गए। मेरे पति ने पर्दे खोल दिए जो हमें अलग कर रहे थे और मेरे बिस्तर पर मेरे पास बैठ गए।

वह मुझ पर झुके हुए थे, मेरे बालों से खेल रहे थे और हमारी नज़रें केवल एक दूसरे को देख रही थीं। हमें अहसास नहीं हुआ कि कोई कमरे में प्रवेश कर चुका था।

“मिस्टर रॉय, आप यहां क्या कर रहे हैं?’’ एक कठोर आवाज़ ने हमारे रोमांटिक पड़ाव को झटका दिया।

वह मुड़े और बहुत सहजता से उत्तर दिया, ‘‘कुछ नहीं।”

“क्या कुछ नहीं? आप इनके बिस्तर पर क्यों बैठे हैं और ये पर्दा किसने खोला?’’ वह बहुत ज़्यादा गुस्से में थी।

“आपको मुझे बुला लेना चाहिए था, मिसेज़ झा।” वह आग उगल रही थीं। ‘‘आप एक विवाहित स्त्री हैं। भले ही आपका यहां कोई रिश्तेदार नहीं है, आपको अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए और यह भी की आपके लिए क्या सही है। आपके पति और परिवार कहां हैं? वे रूक ही नहीं रही थीं।

“लेकिन….’’

“मैं देख कर आती हूँ कि क्या हम आपके लिए एक अलग कमरे की व्यवस्था कर सकते हैं।” उनकी आवाज़ में एक प्रभुत्व था।

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मेरा रूम पार्टनर वहां नटखट मुस्कुराहट और आंखों में शरारत लिए खड़ा था।

“जब मैं अपने पति के ही साथ यह कमरा साझा कर रही हूँ तो मैं एक अलग कमरे में क्यों जाऊं?’’ मैंने अपनी हंसी को रोकते हुए बहुत ही रचनात्मक स्वर में उनसे पूछा। मेरे पति अपनी हंसी रोक रहे थे।

“पति….?’’ वह उन्हें देखने के लिए मुड़ी। वे इतनी ज़ोर से बोल रही थी कि अन्य कर्मचारी भी जिज्ञासावश वहां खिंचे चले आए। ‘‘लेकिन आपका उपनाम झा है और ये मिस्टर रॉय हैं?’’

“तो…?’’

एक लंबे और शर्मिंदगीभरे अंतराल के बाद उन्होंने कहा, ‘‘यह भ्रम और गलतफहमी पैदा करता है।” यह उनका चिड़चिड़ा उत्तर था।

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एम मोहंती ने शादी के बाद अपना उपनाम नहीं बदला और इसे एक अन्य कारण से उपयोगी पाया। कुछ स्त्रियां जो शादी के बाद अपना नाम बदल कर खुश हैं वे कहती हैं इसने उनकी पहचान नहीं बदली है। इसलिए वे समझ नहीं पाती की क्यों कोई भी स्त्री विरोध करेगी। क्या आपका भी यही दृष्टिकोण है? या शायद आपको लगता है कि अगर आपका नाम बदलने से आपकी वास्तविकता नहीं बदल जाती, तो पुरूषों को भी शादी के बाद उनका नाम बदल लेना चाहिए…आखिरकार, यह बस नाम ही तो है! हमें नीचे कमेंट में लिखें। हमें आपकी राय सुनना अच्छा लगेगा।
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