क्या हुआ जब पूरा ससुराल मेरे खिलाफ खड़ा था…

couple showing support each other

दोनों परिवार उनके प्रेम विवाह के खिलाफ थे

मधु हैदराबाद से कोलकाता पढ़ने आई थी. उसे अलग अलग भाषाओं में दिलचस्पी थी और उसने करीब तीन महीनों में ही बंगाली सीख ली थी. वो बहुत ही मधुरभाषी थी मगर इसका मतलब ये बिलकुल नहीं था की वो चुपचाप सब कुछ सहने वाली लड़की थी. वो अपनी बात रखना और उसके पक्ष में बहस करना भी खूब जानती थी.

दूसरी तरफ अभ्रो एक गर्म मिज़ाज़ लड़का था. वो एक छात्र नेता था और काफी चर्चित भी था. जहाँ मधु को शान्ति से रहना पसंद था, वही अभ्रो को हमेशा सुर्ख़ियों में. मुझे नहीं पता की वो दोनों कैसे मिले और एक दुसरे से प्रेम करने लगे. शायद कहते हैं न की विपरीत आकर्षित करते है.

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मगर जब बात दोनों की शादी की आई तो और भी मुश्किलें खड़ी हो गयीं. परिवार वाले इस रिश्ते से नाखुश थे और उन्होंने साफ़ शब्दों में ये ज़ाहिर भी कर दिया था. मगर फिर अभ्रो और मधु के विद्रोह के सामने दोनों पक्षों के घरवालों को हार माननी ही पड़ी. उनकी शादी हो गई और मधु अपने ससुराल आ गई.

ये घटनाएं तब से शुरू होती है जब मधु अपने ससुराल आ जाती है.

(जैसा स्तोत्रोपामा को बताया गया)

मुझसे वो गैरों सा बर्ताव करते थे

जब मैं अभ्रो के साथ उसके घर आई, तो मैं समझ गई की अब मेरी मुश्किलें शुरू हो गई हैं. वो एक संयुक्त परिवार में रहता था. सब लोगों ने पूरी कोशिश की की मैं उस घर में परायापन महसूस कर सकूं और वो काफी हद तक सफल भी हो गए. आप समझ रहे हो न वो रोज़मर्रा की छोटी छोटी बातें जो अगर आप किसी से साझा करो, तो लोग आपको सनकी या पागल ही समझेंगे. जैसे जब मैं किसी भी कमरे में घुसती थी तो सब लोग आपस में बातें करना बंद कर देते थे, घर के किसी भी फैसले में मेरी कोई राय का कोई मतलब ही नहीं था, और ऐसी ही कई बातें.

मुझसे वो गैरों सा बर्ताव करते थे

मैं अपने माता पिता से भी कोई शिकायत नहीं कर सकती थी क्योंकि अगर कुछ कहती तो उनका जवाब होता, “हमने तो पहले ही कहा था.”

मैं अपने माता पिता से भी कोई शिकायत नहीं कर सकती थी क्योंकि अगर कुछ कहती तो उनका जवाब होता, “हमने तो पहले ही कहा था.”

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मैं बहुत व्याकुल हो रही थी और इस कारण धीरे धीरे डिप्रेशन में भी जा रही थी. मुझे अब अभ्रो से भी चिढ़ होने लगी थी. मैं पहली बार किसी के साथ अपना कमरा साझा कर रही थी और वो भी पुरुष के साथ. मैं अपना दिन भर का गुस्सा और चिड़चिड़ाहट अब अभ्रो पर निकालती थी और हर छोटी बात पर भड़क जाती थी. हम बहुत बहस करते थे मगर फिर अभ्रो ही मुझे शांत करते था. मैं कभी कभी उसके ऊपर चिल्ला भी पड़ती थी जो मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं है.

अगर मैं घर में किसी भी बात का विद्रोह करती या शिकायत करती तो मेरे सास ससुर मुझे कह देते थे की अगर पसंद नहीं है तो छोड़ कर चली जाओ. मगर मैं ऐसे कैसे छोड़ कर जा सकती थी. मैं अभ्रो को प्यार करती थी और अभ्रो इसी संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ था. मैं अपने कारण उसे इस तरह घर छोड़ने को नहीं कह सकती थी. अगर मैं ऐसा कहती तो शायद वो मुझे कभी माफ़ नहीं करता. और मैं अभ्रों के साथ अपने रिश्ते को ससुराल के रवैये के कारण ख़राब होने नहीं दे सकती थी. मगर मुझे कुछ भी रास्ता भी नहीं दिख रहा था.

वो कच्ची मछली…

और फिर वो मेरी ज़िन्दगी का सबसे भयानक दिन आया. मुझे आज भी वो दिन ऐसे याद है जैसे कल ही की बात हो. अपने धर्म और अपनी इच्छा से मैं एक शाकाहारी हूँ. मगर ये जीवनशैली एक बंगाली परिवार में निभाना काफी मुश्किल होता है. मुझ पर कटाक्ष कसे गए की शादी होने के बाद भी मैं बिलकुल भी नहीं बदल रही हूँ. अभ्रो ने इस बात का पूरा ध्यान रखा की मैं अपनी ये आदतें न बदलूँ और इस कारण परिवारवाले मुझसे और भी खिन्न थे. तो अचानक ऐसी “घटनाएं” हो जाती जब मुझे कुछ मांसाहारी परोस दिया जाता था. उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ. मैं कॉलेज जाने की जल्दी में थी और मुझे बताया गया की आज तो सारा खाना मांसाहारी ही है. मैं चावल और रखी हुई थोड़ी सी दही के साथ अपना खाना खा रही थी की मेरे ससुराल वाले मुझ पर हंसने लगे. कोई आया और उसने मेरे सामने कच्ची मछली रख दी जिसे देख कर मुझे मितली आने लगी.

बस उस दिन मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैंने अपनी सास से इस तरह की प्रताड़ना का कारण पुछा. पूरा परिवार मेरे खिलाफ खड़ा हो गया और मुझ पर चिल्लाने लगा. मुझसे कहा जाने लगा की मैं उस घर के लिए एक बुरा हादसा हूँ और अभ्रो को मुझसे बुरी पत्नी तो मिल ही नहीं सकती थी. मैं किसी भी तरह उस परिवार के लायक नहीं थी और कैसे उन्हें अपने समाज में कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है क्योंकि अभ्रों ने मुझसे शादी की.

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मुझ पर ये इलज़ाम लगाया गया की मैं तो कलकत्ता आई ही किसी अमीर बंगाली लड़के को “फंसा कर” उससे शादी करने के इरादे से थी. उन लोगों ने कहा की मेरा परिवार अनपढ़ और जाहिल है. अब मैं भी और अपमान नहीं सह सकती थी. तो जब उन लोगों ने कहा की मुझे छोड़ कर चले जाना चाहिए, तो मैंने भी वही करने की ठानी.

मैंने सामान पैक किया और जाने लगी

मैं अपने कमरे में गई और अपना सामान पैक कर जाने को तैयार हो गई. तभी अभ्रो अपने टूर से वापस आ गया. सारा परिवार उसे बताने लगा की कैसे सब कुछ मेरी ही गलती थी और मैं खुद सब छोड़ कर जा रही हूँ. अभ्रों ने न तो उनसे कोई बहस की और न मुझसे. वो बस मेरे पास शांति से आया और मुझसे कहा, “तुमने मेरा सामान क्यों नहीं पैक किया? हम दोनों साथ ही जायेंगे न?

जब उसकी माँ ने उसके इस फैसले का विरोध किया तो उसने कहा, “मैंने वचन लिया था की मैं उसकी सुरक्षा करूंगा और उसके साथ रहूंगा. अगर इस घर में उसकी न तो कोई जगह है और न कोई इज़्ज़त तो मैं भी यहाँ नहीं रह सकता हूँ. आपको ये समझना होगा.”

supportive husband hand

अब मेरे ससुराल वालों से मेरे रिश्ते बेहतर हैं और हम अलग घरों में रहते हैं. मैं वो दिन कभी नहीं भूल सकती जब अभ्रो ने अपने पूरे परिवार के सामने मेरा साथ दिए और मेरा मान रखा. उस दिन के लिए मैं उसकी हमेशा कृतज्ञ रहूंगी.

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