क्या रविन्द्रनाथ टैगोर अपनी अर्जेंटिना की म्यूज़ से प्यार करते थे?

Rabindranath Tagore

बिदेशिनी और कवि

भले ही वह रबिन्द्र संगीत को पसंद करता हो या नहीं – लेकिन लगभग हर शिक्षित बंगाली ने सुंदर, आमी चिनी गो चिनी तोमारे, आगो बिदेशिनी सुना होगा। (‘‘ओह मोहक स्त्री, मैं तुम्हें जानता हूँ, मैं तुम्हें जानता हूँ…’’), लेकिन बहुत से लोगों को पता नहीं है कि यह विक्टोरिया ओकाम्पो के नाम से अर्जेन्टिना के अभिजात वर्ग की स्त्री से संबंधित है।

रमोना विक्टोरिया एपिफेनिया रूफीना ओकाम्पो एक लेखिका, आलोचक, बुद्धिजीवी और अन्य लेखकों की चैंपियन थी। वह 1931 से 1970 तक प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका सुर की संस्थापक और संपादक भी थी, जो अपने समय का एक प्रकाशस्त्रोत थी।

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1922 में अपने तलाक के बाद, ओकाम्पो ने खुद को साहित्यिक सुकून में, अध्ययन में और लेखों का फ्रैंच से अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में डुबो दिया। इसी समय के दौरान टैगोर की गितांजली का फ्रैंच संस्करण उसके हाथ में आया और उसे उससे प्यार हो गया। उन्होंने ‘‘दि जॉय ऑफ रीडिंग टैगोर” नामक एक निबंध लिखा, जिसे 1924 में ला नासीन पत्रिका में प्रकाशित किया गया था। उस वर्ष नवंबर में, टैगोर ब्यूनस आयर्स में पहुंचे।

लगाव के दो महीने

नोबेल पुरस्कार विजेता के लिए दक्षिण अमेरिका की यात्रा बहुत ज़ोरदार साबित हुई थी और ओकाम्पो ने अपने मित्र और सचिव लियोनार्डो एल्महर्स्ट को राज़ी कर लिया कि उन्हें सैन इड्रिसो के गार्डन हाउस में रहने के लिए मना ले। टैगोर वहां दो महीने तक रहे और वे एक दूसरे के साथ गहराई से जुड़ गए।

इस खूबसूरत विदेशी बिदेशिनी ने तनहा कवि के दिल में सोई हुई भावनाओं को जगाया और वह उनकी म्यूज़ बन गई। वह ‘‘विक्टोरिया” की बंगाली समकक्ष ‘‘विजया” बन गई और उनके संबंध ने दूरी और समय का सामना किया। एक दूसरे के प्रति उनकी निष्ठा और उत्साह उनके पत्राचार में बहुत स्पष्ट रूप से दिखाई देता था।

प्यार का एक पत्राचार

ओकाम्पो ने लिखाः

“प्रिय प्रिय रविन्द्रनाथ,

होमसिकनेस की धुंध मुझमें भी है और यह तबसे मुझमें है जब 15 साल पहले तुम सैन इसिड्रो छोड़ कर गए थे, (यह कितने समय पुरानी बात लगती है, अविश्वसनीय रूप से बहुत पुरानी)। ‘मिरलरियो’ में बिताए वो दिन मेरे जीवन के सबसे सुखमयी दिनों में से एक थे। और मैं उस घर के पास या उस बगीचे में तुम्हारी याद और अपनी भीतर की मिठास के साथ यह जो ‘अब कभी नहीं’ लाता है, उसके बिना नहीं जा सकती।

तुम्हारा उस घर में होना, हर सुबह, हर दोपहर और हर रात तुम्हें देखना; तुम्हें सुनना…एक ऐसी खुशी थी जिसे मैं भूली नहीं हूँ! मैंने तुमसे प्यार किया था और अब भी तुमसे बहुत प्यार करती हूँ। उम्मीद है कि तुम्हें पता होगा।

मुझे कुछ पंक्तियां ज़रूर लिखना। अभी मैं यूरोप में हूँ, मुझे लगता है कि भारत इतना दूर नहीं है। शायद इस साल के अंत में मैं वहां जा सकूँ….अगर दुनिया यूरोपीय युद्ध से पूरी तरह परेशान ना हो। तुम्हारी विजया की ओर से प्यार!’’

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रविन्द्र ने लिखा:

“प्रिय विजया,

तुम्हारे केबलग्राम ने मुझे खुश कर दिया है। पिछले साल का लगभग यही समय था जब मैं सेन इसिड्रो में था और मुझे अब भी नीले और लाल अजीब फूलों के समूहों पर पड़ती सूबह की रोशनी याद है। अक्सर मेरे मन में खेद की पींग उठती है कि मैं तुम्हारे साथ ज़्यादा समय तक नहीं रह सका और उन सभी प्रकार के तनावों से बच नहीं सका जिन्होंने मुझे मुरझा दिया था और कमज़ोर बना दिया था…’’

इसी बीच टैगोर ने कविताओं के अपने अगले संग्रह पूरबी, जिसमें से 30 कविताएं सैन इसिड्रो में लिखी गई थीं, इसे विजया या और विशेष रूप से ‘‘बिजया के लोटस पाम्स” को समर्पित किया था। उन्होंने एक पत्र के साथ उसे एक प्रति भेजी, ‘‘मैं तुम्हें बंगाली में लिखी यह किताब भेज रहा हूँ। मैं इसे व्यक्तिगत रूप से तुम्हें देना पसंद करता। यह तुम्हें समर्पित की गई है… मुझे लगता है कि इसके लेखक की तुलना में यह तुम्हारे साथ ज़्यादा समय बिताएगी।”

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कई अटकलें

जब टैगोर ओकाम्पो से मिले, उससे पहले ही वे आमी चिनी गो चिनी लिख चुके थे। ओकाम्पो के उदार आतिथ्य और आकर्षक स्वभाव ने कवि को लगभग तत्काल जीत लिया और जल्द ही इस गीत का अनुवादित संस्करण प्रस्तुत कर दिया गया।

टेगौर और ओकाम्पो की दोस्ती कई निबंधों और कुछ फिल्मों का विषय भी रही है। क्या यह एक अफेयर था?

“प्रिय गुरूदेव, जब से आप गए हैं दिन अंतहीन हो गए हैं…’’

वे निश्चित रूप से एक दूसरे से प्यार करते थे। और इतना ही पर्याप्त होना चाहिए।

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