क्यों मैंने अपनी शादी को “खुशहाल” दिखाया

Abused woman in marriage

हाल ही में मैंने एक पूरी रात यूट्यूब पर पोस्ट किये उन वीडियोस को देख कर बितायी जिसमे कई विवाहित औरतें अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी के काले भयावह पन्नें पलट रही थी. यह वीडियो उन औरतों के थे जो या तो घरेलु हिंसा की शिकार रह चुकी हैं या फिर अब भी उस हिंसा से जूझ रहीं हैं.

सच कहूँ तो मुझे भी नहीं पता की मैं उन औरतों की कहानिया क्यों इतनी तन्मयता से सुन रही हूँ? क्यों मैंने घंटो अपनी नज़रे अपने लैपटॉप से नहीं हटाई? मगर हाँ, मुझे यह पता हैं की उस लम्हे में उनकी सिसकियों मैं बनी बातों से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं लग रहा था.

ये भी पढ़े: मैंने एक अपमानजनक विवाह को त्याग दिया लेकिन फिर भी मुझे मेरे पति की याद क्यों आती है?

हर एक आपबीती की एक अलग शुरुवात थी, एक अलग दर्द था. यहाँ तक की हर कहानी में महिला के साथ हुए गए दुर्व्यवहार की सीमा भी अलग थी और होने वाली क्षति भी अलग. मगर हर महिला का दर्द एक था और इंटरव्यू के अंत में हर एक से साक्षारकारकर्ता एक ही सवाल पूछती थी, “आपने कुछ कहा क्यों नहीं? क्यों सब कुछ सहती चली गयीं? क्यों नहीं आवाज़ उठाई?”

हाँ, अधिकांश महिलाओं ने अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार का ज़िक्र भी किसी से नहीं किया. चुपचाप बस सहती रहीं.

जब साक्षारकारकर्ता ने कहा की क्या वह शर्मिंदा थे अपने हालत या होने वाले घटनाक्रम से और इसलिए उन्होंने यह बातें किसी से बांटी नहीं तो सबने तक़रीबन अलग अलग जवाब दिए. मगर उन बहोत अलग जवाब में भी कोई ठोस वजह नहीं दिखी उनकी चुप्पी की. सच कहूँ तो किसी के पास एक तार्किक कारण नहीं दिखा की क्यों उन्होंने कभी मदद की गुहार नहीं लगाई.

Woman crying
क्या वह शर्मिंदा थे|

असल मैं मेरी ज़िन्दगी की कहानी भी इन औरतों से काफी मिलती जुलती है. मेरे माँ बाप ने मेरी शादी एक पढ़े लिखे लड़के से कराई. लड़का एक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखता था, एक अच्छी नौकरी और वेतन था–यानी हर स्तर पर शादी के लिए उत्तम. तीन महीने की बातचीत के बाद दोनों परिवारों ने हम दोनों को शादी के “अटूट बंधन” में बाँध दिया. आज भी जब शादी के दिन के शानोशौकत याद करती हूँ, तो माँ पिताजी के लिए आभार ही निकलता है. यह बात और है की शादी के दिन की चमक बस उस दिन ही थी, शादी होते ही सारे रंग बदरंग हो गए.

एक युवा दम्पति की शादीशुदा ज़िन्दगी का सफर जो शुरू हुआ उल्लास और बचपने से, बढ़ता गया नयी ज़िम्मेदारियों के साथ और फिर बदला एक खुशहाल ज़िन्दगी से एक तिरस्कृत पीड़ित जीवन में. और फिर पत्नी ने लिया फैसला आवाज़ उठाने का, खुद को निकालने का उस भयावह उम्रकैद से.

ये भी पढ़े: मेरा पति शोषण करता है और अन्तरंग होना नहीं चाहता

शादी के तीन महीने बीतते बीतते मेरे कई भ्रम टूटने लगे. मुझे समझ आने लगा था की यह इंसान, जो मेरा पति है, इसमें इसकी डिग्री के अलावा सब कुछ झूठ था– उसके परिवार की कहानी से लेकर, उसकी जीवनशैली और हमारे रिश्ते से उसकी उम्मीदों तक सब कुछ फरेब था. मगर जो मुझे सबसे ज़्यादा खटका वो था उसके संस्कारों का खोकलापन.

मैंने जिस परिवार में जन्म लिया है वहां औरतों को मात्र मज़बूत होना नहीं सिखाते, हमें प्रखर, शेरनी से भीषण होना सिखाते हैं.
मगर शादी के बाद मुझसे अलग ही अपेक्षाएं थी मेरे ससुराल की. मुझे अपने पति को देवतुल्य मानना था, उनकी हाँ में हाँ और ना में ना करना था.

रिश्ते बनाना मुश्किल है, उन्हें बनाए रखना और भी मुश्किल

एक खुशहाल शादीशुदा ज़िन्दगी के लिए मुझे यह सब करना था वरना अंजाम की ज़िम्मेदारी मेरी ही थी….
मुझे कोई राय रखने या व्यक्त करने का कोई हक़्क़ नहीं था, मुझे एक कठपुतली की तरह बस मूक रहना था. और बस यहीं से धीमी और धीमी होती गयी मेरी आवाज़. मेरी ज़िन्दगी का बस अब एक ही फ़र्ज़ था, अपने पति के जीवन को ज़्यादा से ज़्यादा सुखद और आरामदायक बनाना. इस समय तक मैंने अपनी भरपूर कोशिश कर ली थी अपनी शादी को बचाने की. अपनी शारीरिक और मानसिक चोटों के निशाँ छुपाने की कला मैंने सीख ली थी. हर गम को छुपा चेहरे पर एक खुशहाल गृहणी का मुखौटा लगाना मेरी नई आदत बन गई थी.

और फिर एक दिन मैं अपने अजन्मे बच्चे को खोने ही वाली थी, उस दिन मुझे अंदर से किसी ने झंझोरा. मेरी दुनिया उथल पुथल हो गयी थी और मैं एक ऐसे चौराहे पे थी जिसकी कोई भी राह मुझे समझ नहीं आ रही थी. उस दिन जब सब कुछ धुँधला था, एक बात थी जो बिलकुल साफ़ थी– मैं अपनी आने वाली संतान को अपनी जैसी ज़िन्दगी नहीं दूँगी.

Mother child bond
एक दिन मैं अपने अजन्मे बच्चे को खोने ही वाली थी

आज मुझे और मेरे पति को अलग हुए दो वर्ष से ज़्यादा हो गए हैं. इन वर्षों मैं हम दोनों एक बार भी नहीं मिले है और ना ही मेरे पति अब तक हमारी बेटी से मिले हैं. मैं और मेरी बिटिया मेरे माँ बाप के घर मैं रहते हैं, उसी कमरे में जिसमे मैं शादी के पहले रहती थी, सपने बुनती थी.

ये भी पढ़े: मेरा पति स्वयं को बहुत लिबरेटेड दर्शाता था लेकिन उसने मेरे जीवन के हर पहलू को नियंत्रित करने की कोशिश की

जब मैं पहली बार ससुराल छोड़ कर घर आयी, मैंने चुप्पी साध ली थी, महीनो किसी से बात नहीं की. फिर धीरे धीरे मुस्कुराने लगी, “मैं ठीक हूँ” की तसल्ली माँ बाप को देने लगी मगर आज भी मैंने किसी से अपनी शादी की व्यथा बांटी नहीं है. अपनी आपबीती किसी को नहीं बताई है. और क्योंकि मैं परिपक्व हूँ खुद को एक सक्षम स्वाभिमानी आज की नारी दिखाने मैं, कोई नहीं जानता की मैं शादी के नाम पर किन यातनाओं से गुज़री हूँ.

आज यूट्यूब पर जब मैंने उन औरतों की कहानी सुनी, उनके शब्द महसूस किये, मैंने जाना की क्यों मैं आज तक अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पायी. उनकी कहानी सुनते सुनते शायद मुझे अपनी कहानी का सार भी मिल गया. मेरी व्यावहिक जीवन में आये उस तूफ़ान की ज़िम्मेदार शायद कहीं मैं भी थी. मैंने कभी आवाज़ ही नहीं उठाई. कभी कोई सीमाएं नहीं बाँधी और टूटने दिया जो भी टूट रहा था. फिर वह चाहे मेरा आत्म विश्वास हो या मेरी पहचान.

असल में हम भारतीय स्त्रियां इतनी उमीदों और अपेक्षाओं के बेड़ियों में बंधे होते हैं की हम अपनी असली पहचान, अपनी पसंद नापसंद सब उन उमीदों के हवन में स्वाहा कर देते हैं. हमें कैसा बनना है की पशोपेश में हम क्या हैं, यह कहीं पीछे छूट जाता है. हम पति को खुश करने की होड़ में कब पत्नी से दासी, या उससे भी बदतर, बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं होता.

आज जब मैं अपने ऊपर बीती बातों को याद करती हूँ, तो खुद को अपराधी मानती हूँ. और कभी कभी तो यह मानने से भी इंकार करती हूँ की सचमुच वह मेरी ज़िन्दगी का ही एक हिस्सा था,

Speak out on hands
अपने ऊपर बीती बातों को याद करती हूँ

आज यह सब लिखते हुए मुझे किसी आलोचना या सांत्वना की अपेक्षा नहीं है. मगर हाँ, आज जब मैं खुद को और बेहतर समझ रही हूँ, उम्मीद है मैं अपने अतीत की यह डोर छोड़ आगे चलने को तैयार हो पाऊंगी. आखिर ज़िंदगी जटिल सही, मगर है तो मेरी. और जो कल था, मेरा आज यकीनन उससे बेहतर है.

भारत में वैवाहिक बलात्कार की गंभीर सच्चाई

मेरे पति मुझे महत्त्वहीन महसूस करवाते हैं

Spread the love
Tags:

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

This website uses cookies to ensure you get the best experience on our website.