“माँ, प्लीज हमें छोड़ कर मत जाओ!”

मेरे प्यारे अनीता और अनिल,

 मैं ये कदम इसलिए नहीं उठा रही क्योंकि मैं तुम दोनों को प्यार नहीं करती या तुम दोनों के साथ नहीं रहना चाहती मगर ज़िन्दगी में कभी कभी ऐसे हालात हो जाते हैं की आपको सबके हित के लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़े की कुर्बानी देनी पड़ती है. हमारे मामले में वो बलिदान हमारे परिवार की खुशियों  का है. शायद तुम लोग मुझे कभी माफ़ नहीं कर पाओगे मगर मैं आशा करती हूँ की तुम दोनों मेरे इस फैसले के कारण समझोगे. मैं तुम दोनों को हमेशा के लिए छोड़ कर नहीं जा रही हूँ, मैं तुम्हारी माँ हूँ और ऐसा तो कभी नहीं कर सकती मगर मैं दूर जा रही हूँ.

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मैं अपने परिवार की खुशियों की आहुति इसलिए दे रही हूँ क्योंकि अगर मैं यहीं रुकी तो मैं तुमसब लोगों के लिए गहरी वेदना और दुःख का कारण बन जाऊंगी.

तुम्हारे पिता एक सभ्य इंसान हैं और मुझे पूरा विश्वास है की वो तुम दोनों का अच्छा ख्याल रखेंगे. तुम दोनों हमेशा ऐसे ही अच्छे रहना और उन्हें वैसे ही हमेशा प्यार करना जैसे अब तक करते आये हो. मुझे पता है की वो, और तुम दोनों भी, गुस्से और परेशां होंगे. मगर मत होना. ज़िन्दगी तो चलती रहती है. और ज़िन्दगी हमेशा चलती ही रहनी चाहिए.

मगर हो सके तो इस बात को स्वीकार कर लेना की मेरी ज़िन्दगी अब सुशिल अंकल के साथ है. जैसा की तुम दोनों जानते हो, वो पापा के बहुत अच्छे मित्र थे और अब वो मेरे सबसे गहरे मित्र है. जब तुम दोनों बड़े होंगे तो समझोगे की ज़िन्दगी में कुछ रिश्ते बाकी सारे रिश्तों से कहीं ऊपर और गहरे हो जाते है. मेरा और सुशिल अंकल का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. मगर ऐसा एक पल को भी मत सोचना की मैं तुम्हे प्यार नहीं करती. जो तुम्हे ऐसा कहेगा वो गलत होगा. मैं हमेशा तुम दोनों को बहुत प्यार करती आयी हूँ और करती रहूंगी. मेरी गैरमौजूदगी में तुम्हारी प्यारी मासी माँ तुम दोनों का ख्याल रखेंगी और तुम दोनों को बहुत प्यार करेंगी.

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मेरे सारे प्यार के साथ

हमेशातुम्हारी

आई

अनीता जो उस समय बस बारह वर्ष की थी, उस चिट्टी को ठीक से पढ़ भी नहीं पा रही थी. वो तो अपने बिस्तर में लेटीइंतज़ार कर रही थी की आईआएँगी और उसे स्कूल के लिए तैयार करेंगी. मगर उसे अचानक ही अपने तकिये के नीचे एक लिफाफा मिला जिसमे आई की ये चिट्टी थी. उसका भाई अनिल जिसका कल ही नौवां जन्मदिन मन था, अब भी सो रहा था. वो एक कमरे में सोते थे और और आई और पापा बगल के कमरे में.

इस चिट्टी से न सिर्फ वो एक परिवार सकते में आ गया बल्कि मासी माँ का परिवार भी अस्त व्यस्त हो गया. उनकी छोटी सी दुनिया भी इस चिट्टी से पूरी तरह हिल गई थी. और आज दस साल बाद भी उस घटना के झटके अक्सर महसूस होते हैं.

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मैं हमेशा ही रिश्तों में अब प्यार की परिभाषा समझने की कोशिश करती रहती हूँ. क्या होता है ये “प्यार”? ऐसा कैसे हो सकता है की किसी एक के लिए आपका प्रेम आपका प्रेम आपके जीवन के बाकी सारे प्यारों को बदरंग और गैरज़रूरी कर देता है. मगर कमज़ोर या मज़बूत, प्यार तो हमेशा विश्वास पर ही टिका होता है न? और क्या प्यार के साथ ज़िम्मेदारी नहीं आती? क्या ये जिम्मेदारी नहीं है जो दो व्यक्तियों को, चाहे माँ-बच्चे का रिश्ता हो या प्रेमियों का, आपस में जोड़ती है?

ये कैसा प्यार हो सकता है जो किसी को ऐसे एक दिन सब कुछ छोड़ कर जाने को मजबूर कर दे? वो कौन सी भावना हो सकती है जिसमे बह कर एक माँ अपने बच्चों को बस एक चिट्टी लिख कर, यूँ ही अपनी अपने पति के दोस्त के साथ जाने को तैयार हो सकती है?

क्या उन्हें सचमुच ऐसा लगा था की ऐसा कर वो किसी पर को एहसान कर रही थीं? ये बात और है की उन्हें पूरा विश्वास था की उनकी बहन और उनके पति आगे बढ़ कर उनके बच्चों की मदद करेंगे और इसलिए उन्होंने इतना स्वार्थी कदम उठा लिया. मगर वो इतना विश्वास कैसे कर सकती थी किसी पर भी जब बात अपने बच्चों की थी?

मगर फिर सोचो तो लगता है की क्या सचमुच वो स्वार्थी थी? क्या ये सही नहीं था की वो इस बेमानी रिश्ते से अलग हो जाएँ? वो अपने पति के साथ १३ साल से थी और क्या उन्हें बच्चों के खातिर उस शादी को और निभाना चाहिए था? मगर अगर वो रुक जाती तो किसे पता की क्या वो आगे भी दुखी ही रहतीं?

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मगर हाँ, उस एक कदम से उन्होंने ये व्यक्त कर दिया था की उन्हें पूरी उम्मीद थी की वो उस बंधन में कभी सुखी नहीं होती.

जब तक की बच्चे आत्म निर्भर नहीं हो जाते, तब तक उनके पति और बच्चे उनकी बहन के परिवार के साथ ही हो गए. आई के कदम से आहात उनके परिवार ने उनसे अपने सारे बंधन तोड़ लिए. उसने कई शहर बदले, फिर एक दिन तलाक का पेपर आया, तलाक के बाद उसने “सुशिल अंकल” से शादी करि और आज उसकी उस नयी दुनिया में उसकी एक बेटी भी है.मगर ये सब पाने के लिए उसने कितना कुछ खोया, और क्या वो सचमुच इस लायक था

हमें नहीं पता. वो नहीं बताती.

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