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माँ ने समलैंगिक बेटे को अपना लिया लेकिन पिता ने नहीं

जब बेटे ने स्वीकार किया कि वह समलैंगिक था तो माता-पिता दोनों सकते में आ गए, लेकिन जहां माँ यह स्वीकार कर चुकी है, उसके पति ने अब तक ऐसा नहीं किया है।
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जैसा एलीना सान्याल को बताया गया

मेरे पति ललित और मैंने अपने बेटों को मुबई में पाला। मैं हाल ही में एक सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरी से सेवानिवृत्त हुई हूँ और ललित एक वैज्ञानिक के रूप में तीन वर्ष पहले सेवानिवृत्त हुए, हालांकि वे कहते हैं कि क्या एक वैज्ञानिक कभी सेवानिवृत्त हो सकता है? मेरा बड़ा बेटा मिलिंद अब 31 वर्ष का है और क्षितिज 29 वर्ष का है। वे पक्के दोस्त पहले हैं और भाई बाद में।

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मिलिंद की अपने भाई की सबसे पहली यादों में से एक टीवी के रिमोट के लिए उसके साथ झगड़ना है। दोनों यह जानते हुए बड़े हुए हैं कि वे एक दूसरे के दोस्त, विश्वासपात्र, मल्टीप्लिकेशन टेबल में प्रतिद्वंदी, और कपड़ों और अलमारी के निर्विवादित साझेदार हैं। वे एक दूसरे की राह के कांटे बन सकते थे लेकिन वे क्षण जो उन्हें एक करते थे वे मेरे और मेरे आदेशों के विरूद्ध होते थे। मेरे पति उनसे बहुत कम मिलते थे क्योंकि वे अधिकांश समय अपनी प्रयोगशाला में ही बिताते थे और जब वे घर पर होते थे, वे चुपचाप हमें देखते थे जब हम लीविंग रूम में वर्तमान समय का कुरूक्षेत्र का युद्ध करते थे।

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जब वह बदलने लगा

यह निश्चित रूप से बहुत ही स्वीकार्य कुरूक्षेत्र था, क्योंकि यह अन्य परिवारों के अन्य बच्चों के साथ भी हुआ था। दूसरा युद्ध जो हम पिछले 15 वर्षों में सामूहिक रूप से लड़ रहे थे वह अलग प्रकार और परिमाण का था। कॉलेज में जाने पर, मिलिंद ने अपने बाल बढ़ाने का निश्चय किया। आखिर वह कॉलेज था। वह ऐसी कुछ अनुमतियों के योग्य था। जब उसकी चोटी मेरी चोटी से बड़ी हो गई, ललित ने उसे बाल कटवाने का सुझाव दिया। अपनी सामान्य उत्साहपूर्ण प्रतिक्रिया के विपरीत, वह अपने पिता पर चिल्लाया कि वह इसे बढ़ाना चाहता है क्योंकि उसे लंबे बाल पसंद है! वह अचानक ताव में आ गया क्योंकि उसके दिमाग में फ्यूज़ उड़ने लगे।

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हम उस तरीके के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे जिसमें उसने लिंग समानताओं और पूर्वाग्रहों के बारे में तर्क दिए और अचानक से सभी विचारों और परंपराओं पर सवाल उठाना शुरू किया। जब उसने पुरूषों और स्त्रियों के लिए सबकुछ बराबर होने के बारे में बेसुध बोला, तब वास्तव में उसने धुंआ उगला। वह व्यग्र होकर चहलकदमी कर रहा था और मैंने देखा कि उसके कान लाल हो गए थे और उसकी कलमों से पसीना टपक रहा था। मैं उसका अनियंत्रित आवेश देखकर दंग रह गई थी। उसके सख्त एकालाप के दौरान उसने हममें से किसी ने भी नज़र नहीं मिलाई। अंत में उसने एक कांपते स्वर में कहा कि उसे स्त्रियों जैसे कपड़े पहनना पसंद है और वह रोज़ ऐसा ही करेगा। उसने हमें कहा कि फिर कभी उस पर सवाल ना उठाएं।

यह काफी स्पष्ट हो गया कि वह समलैंगिक था

क्षितिज गिटार क्लास के लिए बाहर गया हुआ था और मैंने और ललित ने एक दूसरे के सामने स्वीकार किए बिना भगवान का शुक्रिया अदा किया। यह कैसा चक्रवात था जो अभी-अभी हमारे जीवन से टकराया था? उसके हमसे टकराने की कोई भविष्यवाणी नहीं हुई थी। अगले कुछ हफ्तों में, मिलिंद ने अपनी गर्दन पर स्टोल और स्कार्फ लपेटने शुरू कर दिए। यह मध्य अक्टूबर का समय था। मैं जानती हूँ उसे ठंड नहीं लग रही थी। वह बस यह सब ज़ाहिर कर रहा था। मुझे लगा इसका एक हिस्सा विद्रोही था। यह पिछले कुछ वर्षों से उसके भीतर बंद पीड़ा और संघर्ष थे जिसे बाहर लाने का उसमें साहस नहीं था।

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मिलिंद, मेरा सबसे बड़ा बेटा, मेरे द्वारा जन्म दिया गया पहला बच्चा, जो आदर्श से भी बेहतर था, एक समलैंगिक था। जब लोगों को पता चला तब वे उसे गे और लौंडाबाज बुलाने लगे। और जल्द ही वे लोग बातें बनाने लगेंगे क्योंकि उसने आईलाइनर और लिपग्लॉस का उपयोग करना शुरू कर दिया था। वह सावधानीपूर्वक स्टोल्स से दुपट्टों पर आ गया था। जब वह अपने पैरों की उंगलियों के नाखूनों को रंगता था, वह स्नीकर या बूट पहनता था। अब वह कोल्हापुरी चप्पल पहनने लगा क्योंकि वह उसके द्वारा खरीदी गई नए ब्रांड की मैट नेल पॉलिश दिखाना चाहता था। उसे युवा लड़के पसंद थे। उसने मेरे सामने एक बार स्वीकार भी किया था कि एक पुरूष से शादी करने और उसके साथ घर बसाने का उसका सपना है।

मुझसे क्या गलती हुई?

मेरे सदमें के प्रारंभिक चरण में, मैंने इसे एक सजा के रूप में देखा और सोचा कि मुझसे क्या चूक हो गई। मैं ही क्यों? मेरा बेटा क्यों? क्या अब मुझे उसे अपना बेटा नहीं बुलाना चाहिए? क्या मुझे भगवान का शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि पड़ोसियों के बच्चों द्वारा भैया बुलाए जाने पर अब भी उसे कोई ऐतराज़ नहीं है? क्या मुझे वैष्णोदेवी से लेकर वैटिकन तक सारे भगवानों से प्रार्थना करनी चाहिए कि मेरे छोटे बेटे को इस ‘योजना’ के बदलाव से दूर रखे? मैं पूरी तरह भटक चुकी थी और इस चूक के लिए अपनी ऑफिस वाली नौकरी को दोष दे रही थी। क्या मैंने कभी संकेत नहीं पकड़े? ज़ाहिर है, वह रातों रात समलैंगिक नहीं बन गया था।

इस मामले पर ललित ने कोई चर्चा नहीं की। एक वैज्ञानिक अधिकारी की दिमाग और बुद्धि होने के बावजूद, उनका दिल कभी इस तथ्य से सामंजस्य नहीं बैठा सकता था कि उनका बेटा स्ट्रेट नहीं है, जैसा उसे होना चाहिए। पिता और पुत्र के लिए भावनात्मक दूरी, शारीरिक दूरी में बदल गई, जब मिलिंद आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चला गया।

अब मैंने इसे स्वीकार कर लिया है

आज मिलिंद अपने समलैंगिक साथी स्टीव से विवाह करके सुखी है। इस बात को एक साल से अधिक हो चुका है जब उनकी शादी में परिवार के एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर मैं और क्षितिज वहां थे। स्टीव का विस्तरित परिवार और साथी यूरोप भर से आए थे। ललित इस शादी को स्वीकार नहीं कर पाए हैं और सोचते हैं कि यह ज़्यादा दिन नहीं टिकेगी। वह चाहते भी हैं कि यह ना टिके। दूरी ने झटके को खत्म नहीं किया है। वे कैंट में रहते हैं और मिलिंद मुझे हर रोज़ फोन करता है। पिछले साल ललित के जन्मदिन पर, मिलिंद अपने पिता को शुभकामना देना चाहता था। मैं भावपूर्ण चुप्पी को 7000 किमी दूर से सुन सकती थी जब मैंने फोन पकड़ रखा था और आंखों ही आंखों में ललित से अनुरोध कर रही थी कि अपने बेटे को हेलो बोल दे। ललित अपनी कुर्सी को पहले से कहीं अधिक तेज़ हिलाते हुए बस वहां बैठे रहे।

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क्षितिज अपने भाई को समझता है। वह उस दोस्त के लिए गहराई से महसूस करता है जिसके साथ उसने मेरा गर्भ और अपने बगैर दातों वाले वर्ष साझा किए हैं। उनका बंधन समाज द्वारा निर्धारित सभी नैतिक और नीतिपरक मानकों को खारिज करता है। उन दोनों के बीच बिन बोला संपर्क सराहना किए जाने योग्य है। वह हर कीमत पर मिलिंद के साथ खड़ा है। क्षितिज उतना ही विषमलिंगी है जितना समाज पसंद करता है। उसकी एक गर्लफ्रैंड है और वे अगले वर्ष शादी करने की योजना बना रहे हैं। वह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसका भाई और स्टीव शादी के समारोह में शामिल हो। मेरे दोनों बच्चे अद्भुत इंसान हैं। वे शिक्षित, जानकार वयस्क हैं जिन्होंने अपना रास्ता खुद चुना है।

स्वीकृति सबसे बड़ा उपहार है

इतने वर्षों बाद, जब मैं उनके बचपन के वीडियो को फिर से देखती हूँ, तो मुझे अहसास होता है कि शायद माता-पिता अपने बच्चों को जो सबसे बड़ा उपहार दे सकते हैं वह है उन्हें उनके स्वाभाविक रूप में स्वीकार करना। प्यार बगैर शर्त के होना चाहिए। इसमें क्यों और लेकिन नहीं होना चाहिए। मैं यह नहीं बदल सकती कि वह कैसे सोचता है और क्या पसंद करता है, लेकिन मैं उसके निर्णयों पर अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर बदल सकती हूँ। यदि वे उसके लिए अच्छे हैं, तो वे मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।

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